संस्करण: 18  जून-2012

फीकी पड़ गई अन्ना वाणी

? महेश परिमल

                 पने साथियों के विवादास्पद बयानों के कारण और अपनी बेबसी के कारण अन्ना की आवाज में अब लोगों में जोश भरने का दम नहीं रहा। टीम के सदस्यों द्वारा समय-समय पर सीधे प्रधानमंत्री को निशाना बनाया जा रहा है। पहले प्रशांत भूषण ने प्रधानमंत्री को शिखंडी कहा, अब हाल ही में किरण बेदी ने प्रधानमंत्री को धृतराष्ट्र कहा है। ऐसे ही बयानों से पूरी टीम की छवि धूमिल हो रही है। अधिक समय नहीं हुआ है,जब लोग अन्ना टोपी पहनकर गर्व महसूस करते थे। पर अब बार-बार बदलते बयान के कारण लोग अब उन्हें उतनी प्राथमिकता नहीं देते। इसके साथ ही अब उनके साथ बाबा रामदेव भी जुड़ गए हैं और पहले दिन से ही उनमें विवाद होना शुरू हो गया है। ऐसे में दोनों ही अपनी ढपली-अपना राग अलाप रहे हैं। दो अलग-अलग मुद्दों पर भला एक मंच से लड़ाई कैसे लड़ी जा सकती है? एक म्यान में भला दो तलवारें रह भी सकती हैं? बाबा रामदेव पहले भी अपने आंदोलन के लिए प्रभावशाली नहीं थे, अभी भी नहीं हैं। अन्ना के साथ जुड़कर उन्होंने अन्ना की साख को भी दांव पर लगा दिया है। प्रसिध्दि की चाह बाबा रामदेव को अन्ना के करीब ले आई है। पर वे यह भूल गए हैं कि उनकी योग वाली सोच में केवल दवाइयाँ और योगासन वाली क्रियाएं हैं। उनकी अपनी कोई ऐसी विचारधारा नहीं है, जिसके बल पर वे आगे बढ़ सकते हैं। वैसे भी पिछले साल जिस तरह से उन्होंने महिलाओं के कपड़े पहनकर अपने इज्जत बचाई थी, उससे यह सिध्द हो जाता है कि समय आने पर वे पलटी मारने में नहीं हिचकेंगे।

                स्वयं अन्ना हजारे भी कम विवादास्पद नहीं हैं। कभी वे अपने साथियों के बयानों का समर्थन करते हैं, तो कभी कहते हैं कि मैंने ऐसा नहीं कहा। प्रधानमंत्री पर जब टीम द्वारा कटाक्ष किया गया,तो पहले उन्होंने कुछ नहीं कहा,बात जब बिगडने लगी,तो उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री बेदाग हैं। ऐसा लगता है कि आजकल प्रधानमंत्री के खिलाफ कुछ भी बोलना एक फैशन ही हो गया है। कोई भी कभी भी उन पर कटाक्ष करता रहता है। पर हमारे मौनी बाबा का मौन टूटता ही नहीं है। कुछ दिनों पहले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री की तुलना निर्मल बाबा से कर दी। अब भाजपा से यह कैसे पूछा जाए कि आखिर संजय जोशी की क्या गलती थी कि उन्हें कार्यकारिणी से भी हटा दिया गया? भविष्य में मोदी चाहें तो किसी को भी हटा सकते हैं। ऐसा भाजपाध्यक्ष नीतिन गडकरी के रवैए से लगता है। बाबा रामदेव को चरणस्पर्श प्रणाम करते भाजपाध्यक्ष को टीवी पर कई बार दिखाया गया। तय है कि भाजपा को बाबा का और बाबा को भाजपा का साथ चाहिए। आखिर बाबा भी तो केंद्र के निशाने पर हैं ही।

                प्रधानमंत्री को शिखंडी कहने वाली अन्ना टीम को यह भी याद रखना होगा कि शिखंडी ने पांडव को लाभ दिलाया था। भीष्म को मारना सहज नहीं था, परंतु शिखंडी के सामने आने से उसने हथियार डाल दिया, अर्जुन ने इस स्थिति का लाभ उठाया। वैसे देखा जाए, तो शिखंडी महाभारत का बहुत ही महत्वपूर्ण पात्र था। उसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। अन्ना यह भूल गए हैं कि उन्हें भी रातों-रात लोकप्रियता मिली थी। देखते ही देखते वे भी युवाओं के आदर्श बन गए थे। लोगों ने उनमें सत्य एवं निष्ठा जैसे किसी तत्व के दर्शन किए थे। तभी तो अन्ना केप पहनकर स्वयं को गौरवान्वित समझते भी थे। भ्रष्टाचार के खिलफ अन्ना ने जो मुहिम छेड़ी,उसका हिस्सा बनकर लोगों ने स्वयं को भीड़ से अलग माना। अन्ना के रूप में वे सब देश में फैले भ्रष्टाचार को मिटाने वाली एक रोशनी के रूप में देख रहे थे। उनके सगत में किसी ने कोई कमी नहीं रखी। लोग तो शाम को मोमबत्ती जुलूस निकालकर स्वयं को अन्ना से जोड़ रहे थे। पर आज हालात बदल गए हैं। अब लोग अन्ना एवं उनकी टीम को शंका की दष्टि से देख रहे हैं। टीम अन्ना में अब पहले जैसी गंभीरता भी दिखाई नहीं देती। छोटी-छोटी बातों पर उलझना,गलत बयानबाजी करना, देश की संसद पर हमला बोलना, प्रधानमंत्री पर कटाक्ष करना, इन सबसे ऐसा लगा कि ये टीम अब भटक गई है। टीम पर भी कई आरोप लगे। उन आरोपों को गलत ठहराने के बजाए टीम अन्ना ने अपने तेवर और तीखे कर लिए। केंद्र सरकार के अलावा अब नागरिक भी जान गए कि अब अन्ना के आंदोलनों को कोई समर्थन नहीं देगा। इसलिए अब उनकी तमाम घोषणाओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। जब वह अपने ही लोगों को शांत नहीं कर पा रही है, तो फिर देश के लोगों को किस तरह से शांत कर पाएगी?

                टीम अन्ना ने एक ज्वलंत मुद्दे पर अपनी लड़ाई शुरू की थी। लोगों ने उनमें गांधी का चेहरा देखा, उन पर विश्वास किया। पर इस विश्वास का फल यह मिला कि आज अन्ना के किसी भी बयान पर अधिक समय तक विश्वास नहीं किया जा सकता। क्या पता दूसरे ही पल उसका खंडन आ जाए। जब तक टीम अन्ना दूसरों का सम्मान करना नहीं सीखेगी,तब तक उनका भी सम्मान नहीं होगा,यह तय है। काले धन की वापसी बाबा का मुद्दा हो सकता है, लोकपाल से उसका कोई वास्ता नहीं है। फिर दोनों का साथ-साथ होना किस बात का परिचायक है? अन्ना के पास अपनी विचारधारा है, पर बाबा के पास अपनी क्या विचारधारा है?  योग से रोग तो दूर हो सकते हैं, पर योग से राजनीति के रोग को दूर करना बहुत मुश्किल है। योग से अच्छे विचारों का प्रादुर्भाव हो सकता है, पर राजनीति की बजबजाती गंदगी को दूर करना योग के वश में नहीं है। बाबा योग की राजनीति को भले ही अच्छी तरह से समझते हों, पर राजनीति के योग को समझना उनके लिए मुश्किल है। टीम अन्ना से हाथ मिलाकर वे अपनी छवि को स्वच्छ नहीं कर सकते। टीम अन्ना को भी यह समझना होगा कि अपनी विचारधारा में बाबा की विचारधारा को शामिल न करे। टीम अन्ना के प्रमुख अन्ना हजारे ही हैं, उन्हें बिना विश्वास में लिए ऐसा बयान सामने न लाया जाए, जिससे उनकी छवि धूमिल हो। अन्ना के सहयोगी केवल सहयोगी हैं, यह सच है, पर वे जनप्रतिनिधि नहीं हैं। जनता का शुभ चिंतक होना और जनता का प्रतिनिधि होने में अंतर है। वे सुझाव दे सकते हैं, पर सुझाव को कानून के रूप में नहीं ला सकते। इस बात का अंदाजा अन्ना टीम को होना चाहिए।

   ? महेश परिमल