संस्करण: 18  जून-2012

सहारा तलाशती अमरबेलें

?  विवेकानंद

                मरबेल को यदि सहारा न मिले तो उसका जीवन संकट में पड़ जाता है। लेकिन यह बहुत विनाशकारी लता है, जिस पेड़ का सहारा लेती है, उसे सुखाने में कोई कसर बाकी नहीं रखती है, अमरबेल पौधे को बढने नहीं देती, फूलने नहीं देती,फलने नहीं देती। इसलिए बेहद उपयोगी होने के बावजूद इसे हर पेड़ सहारा नहीं देता अधिकांशत बबूल, कीकर, बेर यानि कांटों वाले पौधों पर ही यह परवान चढ़ती है।

                भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ चल रहे आंदोलनों की गति भी यही है। निर्विवाद रूप से दोनों ही आंदोलन जनकल्याणकारी हैं, दोनों की सफलता के लिए न केवल पूरा देश कामना करता है बल्कि शुरूआत में हजारों लोग भी इन आदोलनों से जुड़े, लेकिन इनका कोई आधार दिखाई नहीं देता। समाजसेवी अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के यह आंदोलन आज उस स्थिति में पहुंच गए हैं जहां इन्हें सहारे की जरूरत महसूस होने लगी है। जनता धीरे-धीरे छंटती जा रही है, अब बस बचे-खुचे समर्थकों के सहारे ही आंदोलन की श्वसन क्रिया चलने का अहसास हो रहा है। ऐसे में यदि दोनों को परस्पर आसरा न मिला तो इनका स्वमेव अंत हो जाना तय है। लेकिन मजबूरी है कि जब तक चल रहा है तब तक नाम और नेतृत्व किसका चले...दोनों में इसे लेकर खींचतान चल रही है और यह भय बैठा हुआ है अंतर्मन में कि कहीं सहारा देने वाला दूसरे के अस्तित्व को ही न निगल जाए। अविश्वास की खाई और श्रेय लेने की गगनगामी महत्वाकांक्षा ने दोनों को भयभीत कर रखा है। इसलिए जरूरी और मजबूरी के बीच आंदोलनों को आगे बढ़ाने के जो उपक्रम हो रहे हैं वे दो अच्छे विचारों को खत्म करने की ओर बढ़ रहे हैं। हालात यह हो गए हैं कि अन्ना जिन लोगों को भ्रष्ट करार दे रहे हैं बाबा रामदेव उन्हीं लोगों को राजा हरिश्चंद्र घोषित कर रहे हैं, ताकि उनका सहारा मिल जाए। अन्ना शरद पवार और मुलायम सिंह को भ्रष्ट करार देते हैं,यहां तक कि शरद पवार के साथ अभद्रता होने पर कहते हैं...बस एक... दूसरी ओर बाबा कहते हैं उनका गलत कामों से कोई लेना देना नहीं है। यानि ईमानदारी का पैमाना यह है कि हमारी सहायता करो, हमारे साथ रहो, फिर चाहे जो भी करते रहो आप ईमानदार हो। जनता के विश्वास पर यह गंभीर गहरी चोट है।

                   जब अन्ना हजारे जी ने पहली बार अनशन का ऐलान किया था तब मैंने कहा था कि इस आंदोलन की सफलता और असफलता दोनों में ही नुकसान है। सफलता में नुकसान यह है कि देश की सवा अरब आबादी के नुमाइंदों पर एक आदमी हंटर लेकर बैठ जाएगा और सरकार उसकी दहशत के साए में काम करेगी। दूसरी बात हमारी राजनीति अभी भी इतनी परिपक्व नहीं दिखाई देती जो आगे-पीछे सोचकर एक दूसरे पर आरोप लगाए, राजनीतिक लाभ के लिए विपक्ष द्वारा अनर्गल आरोप लगाना हमारी राजनीतिक परंपरा बनती जा रही है, ऐसे में प्रधानमंत्री यदि लोकपाल बिल के दायरे में होता है तो वह कटपुतली की तरह हो जाएगा। आरोप लगते ही उसे यह चिंता सताने लगेगी कि लोकपाल महोदय कब प्रथम दृष्टया आरोपों को सही मान लें और उसे पद से हटना पड़े। हालांकि कई बातें हैं जिन पर सरकार, विपक्ष और अन्ना हजारे जी में सहमति बन चुकी है, अब जो लोकपाल लटका पड़ा है वह सत्ता और विपक्ष का आपसी मामला है। और असफलता का नुकसान यह होगा कि आम आदमी फिर कभी किसी जनकल्याणकारी उद्देश्य से उठी आवाज के पीछे नहीं चलेगा। और दुर्भाग्य देखिए आंदोलन की मौत वे ही लोग करने पर उतारू हैं जिन्होंने इसे आरंभ किया था, ऐसे में जनता अब किस पर विश्वास करेगी और किसकी आवाज पर उठ खड़ी होगी। सरकारी दमन से यदि आंदोलन दम तोड़ता तो भी समाजसेवकों पर भरोसे की गुंजाईश रहती लेकिन...

               दूसरी ओर बाबा रामदेव का आंदोलन है, जो बेशक अच्छा है लेकिन इसके जन्म लेने के पीछे बदले औरर् ईष्या की भावना है। बाबा रामदेव को अगर अन्ना के मंच पर मनचाहा सम्मान मिल गया होता, बाबा रामदेव यदि लोकपाल बिल को लेकर बनी सरकार और टीम अन्ना की संयुक्त कमेटी में शामिल हो गए होते तो रामलीला मैदान में झूठ बोलकर न बैठते और कालेधन को लेकर उनका अभियान जोर न पकड़ता। बाबा ने जब अन्ना हजारे के पीछे खड़ी जनता को देखा तो उन्हेंर् ईष्या होने लगी उन्होंने पहले संयुक्त समिति के सदस्यों में भूषण पिता पुत्र के होने पर सवाल उठाए, जब आलोचना हुई तो बदल गए और कालेधन का झंडा लेकर निकल पड़े अलग राह पर, जो अन्ना से बिल्कुल अलग थी। बाबा के साथ एक सबसे बड़ा धनात्मक पहलू यह था कि बाबा को किसी स्थान पर बैठने के लिए जनता की जरूरत नहीं थी। योग शिविर के नाम पर योग प्रेमी बंधु रामलीला मैदान पहुंचे थे। इसलिए यह संख्या जंतर-मंतर पर हुए अन्ना के अनशन जैसी तो नहीं दिखी, लेकिन मुंबई में जब अन्ना हजारे के अनशन में कोई नहीं आया और अन्ना को दो दिन पहले ही अनशन खत्म करना पड़ा तब उन्हें बाबा की इस युति का ख्याल जरूर आया। अन्ना को समझ आ गया कि बाबा के साथ यह घटना कभी नहीं होगी, उनके साथ हमेशा लोग दिखते रहेंगे भले ही वे जंतर-मंतर पर जुटे लोगों के बराबर न हों लेकिन उन्हें सन्नाटे का सामना नहीं करना पड़ेगा। अन्ना की यही जरूरत उन्हें पतंजली योग पीठ तक खींच ले गई। बाबा का पलड़ा भारी था, इसलिए बाबा ने अपने हिसाब से प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की और संयुक्त रूप से आंदोलन चलाने की घोषणा कर दी। इस बात में अरविंद केजरीवाल को क्या आपत्ति होनी चाहिए? संयुक्त रूप से चलने वाला आंदोलन बेशक मजबूत ही होता, समर्थकों की संख्या दोगुनी होती, सरकार पर दबाव दोगुना होता। लेकिन उन्हें आपत्ति थी तो श्रेय की। केजरीवाल श्रेय नहीं बांटना चाहते। केजरीवाल की यह प्रवृत्ति बाबा भांप गए इसलिए दिल्ली में उन्होंने 3 जून को जो आंशिक अनशन किया था उसमें वे अपने समर्थकों को ही साथ लेकर आए थे, और मंच पर जब केजरीवाल ने नेताओं का नाम लेकर तालियां बजवाना चाहीं तो बाबा ने ब्रेक लगा दिया। यह बाबा का इशारा था कि बाबू आपकी मर्जी यहां नहीं चलेगी। लेकिन बाबा यह भी जानते हैं सरकार अन्ना हजारे के मुकाबले उन्हें सम्मान नहीं देगी और आम आदमी में अन्ना हजारे की जो छवि है वह वे कभी नहीं बना पाएंगे, इसलिए वे भी अन्ना के साथ जुड़े रहना चाहते हैं। यानि अपने-अपने आंदोलनों को जिंदा रखने के लिए दोनों का एक दूसरे की जरूरत सिद्दत से महसूस हो रही है लेकिन एक दूसरे पर भरोसा नहीं है। दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि आंदोलनों को आगे बढ़ाने की जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है उससे आंदोलन अपने अंत की ओर अग्रसर हो रहे हैं, एक ऐसा अंत जिसमें किसी के हाथ कुछ भी नहीं आएगा।

                अन्ना हजारे की टीम जैसा लोकपाल चाहती है, उन शर्तों और नियमों के साथ बिल कोई भी सरकार नहीं लाएगी। यदि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव पूरी ताकत लगाकर कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में कामयाब रहे तो भी आने वाली पार्टी यानि विपक्षी दल केवल वही संशोधन करेंगे जो वे अभी राज्यसभा में चाहते हैं, न कि वे जो अन्ना हजारे चाहते हैं। यानि यदि वास्तव में अन्ना अपनी पुरानी शर्तों नियमों वाला लोकपाल चाहते हैं तो उन्हें आने वाली नई सरकार के खिलाफ भी आंदोलन करना होगा। यदि नहीं करते हैं तो यह मान लिया जाएगा कि उनका उद्देश्य लोकपाल नहीं बल्कि कांग्रेस को सरकार से बाहर करना था, जैसा कि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह पहले ही आशंका जता चुके हैं। यदि ऐसा हुआ तो अन्ना हजारे की लोकप्रियता को जबरदस्त धक्का लगेगा और उनके दामन पर एक पार्टी का प्रचारक होने का दाग भी लग जाएगा। बाबा रामदेव के साथ भी यही स्थिति बनेगी। क्योंकि कालेधन को लाने की एक कानूनी प्रक्रिया है, जिस पर सरकार लगातार आगे बढ़ रही है, कई देशों से संधियां समझौते हो रही हैं, कालेधन की जानकारी आ रही है। आने वाली सरकार भी विदेश नीति के तहत उन्हीं शर्तों का पालन करेगी जिसका मौजूदा सरकार कर रही है। यानि सीधे जाकर कोई भी कालाधन लाने वाला नहीं है, जैसा कि प्रणब मुखर्जी ने संसद में कहा था कि सेना भेजकर कालाधन नहीं लाया जा सकता। अत बाबा रामदेव को भी नई सरकार के खिलाफ फिर आंदोलन करना होगा। जब इन तथ्यों के प्रकाश में देखते हैं तो लगता है कि इन आंदोलनों की पटकथा एकता कपूर के सीरियलों की तरह है जिनका कोई अंत समझ में नहीं आता। जिनमें रोज क्लाइमेक्स होता है और रोज आगे बढ़ते दिखते हैं और एक दिना बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे इनका अंत हो जाता है। जब तक चलना है एक दूसरे का सहारा लेकर चलना होगा अन्यथा एक दिन ऐसा आएगा जब केवल पांच आदमी अन्ना के पीछे होंगे और कुछ योग करते लोग बाबा रामदेव के पीछे। ऐसी स्थिति इसलिए नहीं बनेगी कि लोग भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लेंगे और कालेधन को भूल जाएंगे बल्कि इसलिए दूर हो जाएंगे क्योंकि उन्हें इसका कोई अंत नहीं दिखेगा। ऐसे कई मौके आए जब दोनों के पास अपने आंदोलनों को सम्मानजनक तरीके से खत्म करने का मौका था। सरकार लोकपाल बनाने पर राजी थी, उस पर काम भी चल रहा था, लेकिन अन्ना हजारे की टीम इस बीच न केवल सरकार को कोसती रही बल्कि बेकार के धरना प्रदर्शन कर सरकार के खिलाफ अनावश्यक जहर उगलती रही। या यूं कहें की मीडिया के मिल रहे सहयोग को देखते हुए टीम अन्ना अति उत्साह में यह सब कर गई। जिद यह थी कि जैसा हम चाहते हैं वैसा ही बिल लाओ। एक तरह से सरकार नाम की संस्था को चुनौती दी जा रही थी कि आप कुछ भी नहीं हैं, हम जैसा चाहेंगे आपको चलना होगा। बेशक लोकतंत्र में अंतिम शक्तिपुंज जनता ही है, लेकिन इसका यह अभिप्राय कतई नहीं कि सरकार का कोई अस्तित्व ही नहीं है। संसद से लेकर नेताओं तक अरविंद केजरीवाल ने ऊल-जलूल बयान दिए, अरविंद ने पूरी तरह यह साबित करने का प्रयास किया कि उनके अलावा देश में केवल वही ईमानदार हैं जो उनका साथ दे रहे हैं या उनके काम से खुश हैं, जो विरोध कर रहे हैं बे वेईमान हैं। जबकि सही यह होता कि सरकार का लोकपाल बनने देते, उसका अमल में आने देते, इसके बाद जरूरत पडने पर सरकार पर पुनरू दबाव बनाया जाता और संशोधन करा लिए जाते। जनता जिस काम के लिए आगे बढ़ी थी वह कुछ कदम तो अपने आप को आगे पाती, लेकिन टीम अन्ना की जिद में जनता आज भी वहीं खड़ी है जहां लोकपाल को लेकर 42 साल पहले खड़ी थी। यही हाल रामदेव का रहा। रामदेव ने कालेधन का मुद्दा उठाया, सरकार ने उन्हें सिर आंखों पर बैठा लिया। कालेधन के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई, हसन अली जैसा टैक्स चोर गिरफ्त में आया। अंतराष्ट्रीय संधियां हुईं, फिलहाल आयकर अफसरों की तैनाती विदेशों में की जा रही है। निश्चित रूप से यह कोई महान काम सरकार नहीं कर रही है, लेकिन कुछ कर रही है। पर बाबा चाहते हैं कि जाओ और कालाधन ले आओ। बाबा ने यदि सरकार को झुकाने की बजाए सरकार के प्रयासों को परखने की कोशिश की होती तो उनके आंदोलन की शाख भी रह जाती और जिस प्रकार अनावश्यक बयानबाजियां हुईं वे भी न होतीं। सरकार अपना काम करती, जो गलत हो रहा होता उसके लिए विपक्ष था वह अपनी भूमिका निभाता। इन सबसे जुदा दोनों ने मिलकर सरकार को झुकाने का प्रयास किया। सरकार कितना झुकी और क्या नफा-नुकसान उसके खाते में आएगा इसका फैसला दो साल बात हो जाएगा। लेकिन दो साल बाद स्थितियां बदलेंगीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। और इसी गारंटी न होने से यह गारंटी है कि जनता भविष्य में इस तरह के आंदोलनों में अपना वक्त जाया नहीं करेगी। जिसकी झलकआज से दिखने लगी है। छुट्टी के दिन जुटी भीड़ को कब तक अपना समर्थक बताकर काम चलाएंगे।

? विवेकानंद