संस्करण: 18  जून-2012

क्या भारत का संविधान

एक लॉग-बुक है?

 

? के.एस.चलम

               सा कहा जा रहा है कि प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधी केन्द्र (एन.सी.टी.सी.) के मामले में दिल्ली में हाल ही में हुई मुख्यमंत्रियों की बैठक में कुछ मुख्यमंत्रियों ने देश संघीय ढाँचे में अपनी शिकायतों के मद्देनजर संविधान की समीक्षा की माँग उठाई। पदोन्नतियों में आरक्षण पर दिये अपने ताजा फैसले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजनीतिक वर्ग से तथा प्रधानमंत्री से संविधान के अनुच्छेद 16(4) में संशोधन करने की अपील की है, जो एक दशक में तीसरी बार है। इस प्रकार की कार्यवाहियाँ हमें निराश करती है क्योंकि संविधान के मूल्यों को बरकरार रखने वाले लोगों ने ही संविधान के प्रति अपने आदर में कमी दिखाई है।

                 भारत का संवैधानिक इतिहास दर्शाता है कि हमने उसका किस तरह विकास किया और उसे नवंबर 1949 में संविधान सभा ने अंगीकृत किया। देश का संघीय ढाँचा 1935के एक्ट में पहले से ही मौजूद था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ.बी.आर.अंबेडकर एक ऐसे अकेले व्यक्ति थे जो उस समय संघीय ढाँचे की समीक्षा करने की समुचित योग्यता रखते थे क्योंकि उन्होने एक जाने-माने अर्थशास्त्री के मार्गदर्शन में संघीय वित्त विषय पर पी.एच.डी. की थी।

               यहाँ तक कि उनके मार्गदर्शक बी.एन. राव भी ऐसे अर्थशास्त्री नही थे जैसे कि बी.आर. अंबेडकर। क्योंकि अंबेडकर न सिर्फ संघीय ढाँचे के अंतर्गत आर्थिक मुद्दों से निपटने में समर्थ थे बल्कि उसके ढाँचे और विचारधारा की भी उन्हे चिन्ता थी। अंबेडकर अपने समस्त लेखन में भारत को यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया कहा करते थे जो देश की संघीय प्रकृति को दर्शाता है।

               इस संबन्ध में संघीय संरचना में किसी को यहाँ-वहाँ असंगति लग सकती है जिसकी समीक्षा की जरूरत नही है। मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन,राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक आदि ऐसे मंच है जहाँ पर कोई समझदार और गंभीर गृह मंत्री इस मुद्दे पर विचार करें तो ऐसे मुद्दों का हल निकाला जा सकता है किन्तु संविधान की समीक्षा नही।

               संविधान को सामान्यत: कानून के द्वारा संगठित राजनीतिक वर्ग के एक फ्रेमवर्क की भॉति परिभाषित किया जाता है जिसमें विधि द्वारा बनाई गई स्थाई संस्थायें सुनिश्चित अधिकारों के साथ काम करती है। सर्वोच्च न्यायालय पूर्व में भी अपने निर्णयों में इसी प्रकार संविधान के मौलिक ढाँचों का चित्रण कर चुका है।

               यद्यपि शिवशंकर जैसे कानून के विद्वान और प्रशासक ऐसे निर्णयों पर मठाधिपतियों और उच्चवर्ग के प्रति झुकाव के कारण बहुत गंभीर असहमति प्रकट कर चुके है, तथ्यों से पता चलता है कि अब हम इन्ही व्यवस्थाओं का अनुसरण कर रहे है।

               वास्तव में संविधान की प्रस्तावना और उसके सामाजिक दृष्टिकोण पर विचार किये बगैर उसकी संरचना पर एकांगी दृष्टिकोण कुछ समय से लगभग सैध्दान्तिक चर्चा का विषय बन गया है। वह इस संदर्भ में कि संविधान में निहित सामाजिक अनुच्छेद के इतिहास पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।

               संविधान के निर्माण में निश्चित शर्तों और आरक्षण के प्रावधान किये बगैर यह देश 1 जनवरी 1950 को कथित राष्ट्र के रूप में नही उभर सकता था। यहाँ गाँधीजी और बी.आर. अंबेडकर  के बीच 1932 में हुये समझौते तथा 1951 में संविधान के अनुच्छेद 15 (4) में संशोधन का संदर्भ लेना प्रासंगिक होगा जो दक्षिण भारत में जाति आधारित आरक्षण को लेकर हुये आंदोलन के कारण करने पड़े।

                 संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 में अल्पसंख्यकों के लिये किये गये विशेष प्रावधानों को भी देश के गंभीर मुद्दे के रूप में देखा जा सकता है। यह ऐसे विकासशील राष्ट्र के लिये बहुत ही जरूरी था जो अपने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में अनेक विभाजनों और असमानताओं के साथ उभर रहा है। हमें इन विशेष प्रावधानों को अल्पसंख्यकों (कमजोर वर्ग) और बहुसंख्यकों या शासक वर्ग के बीच एक सामाजिक समझौते की भाँति लेना चाहिये। यदि इन समझौतों का आदर नही किया गया, तो हमारे इस एकीकृत राष्ट्र की इमारत कभी भी धराशाही हो सकती है।

               सर्वोच्च न्यायालय के दूरदर्शी न्यायाधीशों ने स्वतंत्रता के बाद के रचनात्मक वर्षों में संविधान में अपने व्यापक अनुभव, ज्ञान और देश के भविष्य को ध्यान में रखते हुये निष्पक्ष रूप से निर्णय देने में गहरी समझ दिखाई।

                कानूनी शिक्षा के गिरते स्तर, प्रशिक्षण और भर्ती की दोषपूर्ण प्रक्रियाओं के कारण अब ऐसे लोगों को ढूॅढ पाना मुश्किल है। आज उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ उन लोगों में से की जाती है जो कम से कम 10 वर्षों तक उच्च न्यायालय में वकील रहे हो या दो या दो से अधिक ऐसे न्यायालयों में उसने इतने समय तक वकालत की हो अथवा 10 वर्षों तक न्यायिक अधिकारी रहा हो।

               एक आकलन के अनुसार 67 प्रतिशत न्यायाधीश अधिवक्ता वर्ग से आते है। इनमें से कुछ अपनी क्षमताओं के सीमित प्रदर्शन के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय की कुर्सियों पर कब्जा कर लेते है। अन्यथा देश में सामाजिक न्याय व्यवस्था, विशेषकर जाति आधारित आरक्षण के संबन्धा में हो रही उथल-पुथल को हम कैसे समझते?

                न्यायमूर्ति ओ.चिन्नप्पा रेड्डी आज भी अपने निर्णयों में विचारों की अनुकरणीय स्पष्टता और निर्णयों में सामाजिक अभिप्राय के लिये आज भी सम्मानपूर्वक याद किये जाते है। हम उनके 1985 के निर्णय ''के.सी. वसन्तकुमार वि. कर्नाटक सरकार'' का संदर्भ ले सकते है जो पदोन्नतियों में आरक्षण को लेकर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित हाल के निर्णय में प्रासंगिक है।

                 उन्होने कहा --''जब कभी आरक्षण की बात होती है तो विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के होठों पर बहुत निपुणता होती है। ऐसा लगता है कि यदि कुल आरक्षण 50प्रतिशत से अधिक हो गया तो उनकी निपुणता को क्षति पंहुच जायेगी। ऐसा प्रतीत होता है कि यदि बैकलॉग की नीति को अपनाया गया तो वे बुरी तरह प्रभावित होंगे। किन्तु सच इससे अलग है। सच यह है कि सिविल सेवा कोई स्वर्ग नही है और यह जरूरी नही है कि चुने हुये वर्गों में से ऊॅंची उपाधियाँ प्राप्त लोग कुशलता के प्रतिमान हों। ऐसी पूर्वधारणाओं का समर्थन करने के लिये न तो कोई सांख्यिकीय आधार है और न ही विशेषज्ञों के प्रमाण। हम जो कहना चाहते है उसका मतलब सिर्फ यह है कि ऐसे ऊॅंचे पदों पर बैठे किसी भी व्यक्ति को आवश्यकता से अधिक नकचढ़ा होने की जरूरत नही है। आज सभी स्तरों पर और सभी वर्गों में केन्द्र और राज्य सरकारों की 1.90 करोड़ सरकारी नौकरियों में से अनुसूचित जाति के लोगों के पास मात्र 15 प्रतिशत नौकरियाँ है। (जबकि उनकी जनसंख्या 17 प्रतिशत है) इसका मतलब यह है कि अनुसूचित जाति के लोगों के हिस्से में 28.5 लाख नौकरियाँ है जो अनुसूचित जाति के कुल आबादी 20.4 करोड़ का मात्र 0.0139 प्रतिशत है। (यदि कुल आबादी से इसकी तुलना की जाये तो यह बहुत ही खराब स्थिति होगी।)

               यद्यपि इससे निश्चित ही वर्ग के अंदर वर्ग का निर्माण होगा किन्तु यह व्यवस्था को किस प्रकार प्रभावित करता है। क्या अन्य उच्च जातियों की भॉति शिक्षा के माध्यम से इस वर्ग का कोई भी व्यक्ति तय लक्ष्यों तक पंहुच सकता है? इसलिये, अनुच्छेद 335 जो 1950 में अनुसूचित जाति के संदर्भ में बनाया गया था, व्यर्थ प्रतीत होता है और कानूनी दावपेंचों से बचने के लिये इसे रद्द कर देने की जरूरत है।

               अब यह एक चलन बन गया है कि इस वर्ग का नौकरियों में उचित प्रतिनिधित्व नही है। यह सिध्द करने के लिये ऑंकड़ों के प्रमाण दिये जायें। यह नागराज (2006)और हाल ही में उत्तरप्रदेश में पदोन्नतियों के मामले में पारित सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में हुआ है। वास्तव में राष्ट्रीय जनजाति आयोग को सरकार के समक्ष यह रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी कि ग्रुप डी की नौकरियों को छोड़कर इस वर्ग का नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नही है।

                यह सामान्य ज्ञान की बात है कि सरकारी विभाग संवैधानिक संस्थाओं जैसे लोकसेवा आयोग आदि से परामर्श करके केडर की संख्या तैयार करते है और पदों को चिन्हित करते है। यह ऑंकड़ों और संपूर्ण तंत्र के अलग-अलग स्तरों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर होता है। यह विचित्र बात है कि बिना समझे या प्रक्रिया की जाँच किये बगैर किसी अन्य संवैधानिक संस्था के अधिकारों को छीनने का प्रयास हो रहा है। यह हमारी न्याय व्यवस्था के लिये शुभ संकेत नही है। ऐसे क्रियाकलाप राजनीतिक वर्ग को अपना रूतबा दिखाने के लिये संविधान में संशोधान करने हेतु बहकायेगा।    

? के.एस.चलम