संस्करण: 18  जून-2012

हमारे वक्त में मैकबेथ !

आखिर प्रचारक संजय जोशी से जनाब मोदी इतना डरते क्यों हैं ?

? सुभाष गाताड़े

                हान नाटककार शेक्सपियर की एक चर्चित रचना है 'मैकबेथ।' प्रस्तुत नाटक एक स्कॉटिश सेनापति मैकबेथ की जबरदस्त सत्तापिपासा, राजा बनने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए उसकी तैयारी, यहां तक कि अपने कहे जानेवाले लोगों को भी बली बनाने की उसकी कोशिशें और इस काम में उसे सहयोग प्रदान करती उसकी पत्नी लेडी मैकबेथ के इर्दगिर्द घुमता है। राजा बनने के लिए आमादा मैकबेथ स्काटलंण्ड के न्यायप्रिय राजा डंकन की भी हत्या कर देता है। नाटक एक टै्रजेडी है जिसमें अन्तत: लेडी मैकबेथ आत्महत्या कर लेती है तो मैकबेथ जान को हाथ धो बैठता है।

                ध्यान रहे कि जिस तरह शेक्सपियर की तमाम कालजयी रचनाएं या उनके पात्र हमारे अपने समय में भी रूपक के तौर पर इस्तेमाल होते हैं, वही स्थिति मैकबेथ की भी है। सियासी उठापटक की जो स्याह दुनिया हैं, इस सन्दर्भ में हम अक्सर इसका जिक्र सुनते रहते हैं।

               इसे विचित्र संयोग कहा जा सकता है कि 'गुजरात के शेर' तथा अन्य तमाम अन्य उपाधियों से अपने अनुयायियों द्वारा सम्बोधित किए जानेवाले सूबे के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के कोप का शिकार हुए संघ के प्रचारक संजय जोशी को जब पहली दफा पार्टी की तमाम जिम्मेदारियों से मुक्त किया गया था -जब उनके जैसे शख्स के किसी महिला के साथ सहवास करते हुए तैयार सीडी भाजपा के अधिवेशन में बांट दी गयी थी - उन दिनों हम लोगों ने संघ के साहित्य में भी मैकबेथ एवं लेडी मैकबेथ का जिक्र पढ़ा था। प्रस्तुत विवादास्पद सीडी गुजरात पुलिस के जवानों द्वारा ही भाजपा के उपरोक्त अधिवेशन में पहुंचायी गयी थी।

                 दरअसल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक हिस्से में आज भी यही समझा जाता है कि प्रस्तुत सीडी को तैयार करने के पीछे 'परिवारजनों' का ही हाथ था, जो संजय जोशी के बढ़ते कद से परेशान थे। यह अकारण नहीं था कि संघ के 'थिंक टैंक' कहे जानेवाले जनाब एम जी वैद्य ने उन दिनों 'तरूण भारत' अख़बार के अपने कॉलम में 'मैकबेथ' एवं 'लेडी मैकबेथ' को चेतावनी दे डाली थी और कहा था कि अगर लोग आमादा हो जाएं तो 'जवाबी कार्रवाई' भी हो सकती है। कई कारकों के चलते सीडी प्रसंग के पीछे सन्देह की सुई हिन्दू हृदय सम्राट कहे जानेवाले इस शख्स एवं उनकी एक मंत्रिमंडलीय सहयोगिनी पर ही केन्द्रित थी। मामला आगे बढ़ता देख कर उन दिनों संघ के श्रेष्ठताक्रम में नम्बर दो पर स्थित मोहन भागवत ने मध्यस्थता की थी और 'युध्दविराम' करवाया था। अनुशासन के बाहरी आवरण के नीचे संघ परिवार की तमाम गतिविधियां चलती हैं, उसमें एक दूसरे को निपटाने के लिए ऐसे कुछ अन्य 'सीडी प्रसंगों' को भी देखा जा सकता है, मगर फिलवक्त उसकी चर्चा मुल्तवी करना उचित होगा।

                 अब जबकि एक वक्त के अपने सहयोगी प्रचारक रहे संजय जोशी को पार्टी की तमाम जिम्मेदारियों से 'स्वेच्छा' से मुक्त कराने के अपने मिशन में जनाब मोदी कामयाबी मिली है और 2014 में पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर 'पोस्टर ब्यॉय' बनने के सपने भी साकार होते दिख रहे हैं, तब यह पूछा जाना लाजिमी है कि आखिर विगत छह साल से सीडी काण्ड से जनित 'दागों' को मिटाने में ही मुब्तिला रहे जनाब संजय जोशी नरेन्द्र मोदी के लिए इतने डर एवं आतंक का विषय क्यों बने हुए हैं। क्या इसकी वजह प्रतिशोध की वह भावना है जिसका सिलसिला इन दोनों प्रचारकों के बीच दस साल पहले ही शुरू हुआ था या ऐसी कुछ अन्य बातें हैं जिसका राज खुल जाने का डर मोदी को लगता है।

                  एक बात जिसका जिक्र सभी जगह आया है वह है मोदी की कार्यशैली में अन्तर्निहित निरंकुशता, जिसमें वह उनसे थोड़ीसी भी असहमति रखनेवाले पर नकेल डालते या उसे हाशिये पर डालते दिखते हैं। अगर आज की तारीख में गुजरात भाजपा या सूबे का संघ परिवार मोदी का समानार्थी बनता दिखता है,तो इसके पीछे उनकी यही असमावेशी कार्यशैली है। 'आतंकवाद के खिलाफ युध्द' के दिनों में जार्ज बुश के सौजन्य से एक जुमला बहुत प्रचलित हुआ था 'या तो आप हमारे साथ हैं या आप हमारे दुश्मन हैं।'जनाब नरेन्द्र मोदी इसी जुमले को हर स्तर पर कार्यान्वित करते दिखते हैं।

                  और उनके इस निरंकुश रवैये का बड़ा कहर उनके अपने संगठन पर भी पड़ा है। अगर हम 2002 के जनसंहार के दिनों में उनकी भूमिका से लेकर अब 'विकास पुरूष' में उनके रूपान्तरण की यात्रा का देखें तो खुद संघ-भाजपा के अन्दर ही ऐसे तमाम रथी-महारथी मिलते हैं जो अब 'भूतपूर्व' हो गए हैं, जिनको उन्होंने या तो बिल्कुल किनारे लगा दिया या बिल्कुल प्रभावहीन कर दिया। फिर चाहे संघ परिवार के विभिन्न आनुषंगिक संगठनों से जुड़े नेता हों या संगठन हों। विश्व हिन्दू परिषद के जयदीप पटेल हों या प्रवीण तोगड़िया हों, पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल, सुरेश मेहता रहें हों या गुजरात का भारतीय किसान संघ या खुद गुजरात का संघ नेतृत्व,सभी को मोदी की इस कार्यशैली का 'स्वाद' चखना पड़ा है। 2002 के जनसंहार में अपनी भूमिका को लेकर आरोपों का सामना कर रहे जयदीप पटेल को मोदी के खिलाफ एसएमएस भेजने की मुहिम चलाने के लिए जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। याद रहे कि पिछले विधानसभा चुनावों के वक्त (2007) पटेल समुदाय से ताल्लुक रखनेवाले तोगड़िया ने कैसी हुंकार भरी थी, जिन्हें यह भ्रम था कि मोदी को राजगद्दी दिलाने में उनकी अहम भूमिका है और वह चाहे तो खुदभी उस पद पर आसीन हो सकते हैं। केशुभाई पटेल एण्ड कम्पनी ने जो उन दिनों मज़मा लगाया था,उसमें भाषण देने भी वह पहुंचे थे। मगर मामला अन्तत:मोदी के हक में ही सेटल हो गया। संघ नेतृत्व के आदेश पर तोगड़िया लगभग राज्य के बाहर कर दिए गए, यहां तक कि जब अशोक सिंघल की वृध्दावस्था के चलते विश्व हिन्दु परिषद का जिम्मा सम्भालने की बारी आयी तो संघ ने वहां किसी अन्य को बिठा दिया और तोगड़िया हाथ मलते ही रह गए।

                वैसे संगठन के अन्दर राजनीतिक विरोधियों से निपटने में मोदी की यही कार्यशैली हरेन पांडया प्रसंग में भी दिखाई देती है। कभी मोदी के करीबी रहे हरेन पांडया, उन लोगों में शुमार थे जिन्होंने 2002 के जनसंहार की जांच के लिए बने नागरिक आयोग के समक्ष जाकर गवाही दी थी। न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर,न्यायमूर्ति पी बी सावन्त एवं न्यायमूर्ति होसबेट सुरेश की त्रायी के नेतृत्ववाले उपरोक्त आयोग ने तमाम पीड़ितों एवं प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात की थी। चन्द हजार पन्नों की इस रिपोर्ट के निष्कर्ष में इन न्यायमूर्तियों ने साफ लिखा था कि इसमें जितनी गवाहियां सामने आयी हैं या जितने तथ्य उजागर हुए हैं, उसके आधार पर मोदी एवं उनके करीबियों पर दंगों को भड़काने या उस दौरान अपनी भूमिका न निभाने के लिए मुकदमा कायम हो सकता है। इस आयोग को हरेन पांडया ने बताया था कि किस तरह गोधरा में साबरमती एक्स्प्रेस में यात्रियों के जल मरने की घटना की रात मोदी के आवास पर हुई बैठक में उन्होंने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वह अगले तीन दिन तक कोई कार्रवाई न करें और लोगों को अपने गुस्से को उतारने का मौका दें।

                प्रस्तुत गवाही के कुछ माह बाद ही हरेन पांडया की हत्या हुई थी, जिसको लेकर आज तक रहस्य बना हुआ है। इस मामले में गिरतार कई लोग जिन पर पुलिस ने उपरोक्त हत्याकाण्ड में शामिल होने के आरोप लगाए थे, जिन्दगी के बेशकीमती साल जेल की सलाखों के पीछे बीता कर कुछ माह पहले जेल से बाइज्जत रिहा कर दिए गए हैं। 'तहलका' पत्रिका ने इस हत्याकाण्ड पर पेश अपने लेख में बताया था कि कौन तत्व इस हत्या के पीछे थे। वैसे हरेन पांडया के अपने पिताजी विठ्ठलभाई पांडया अपने मरते दम तक यही मानते रहे थे कि उनके बेटे की हत्या के पीछे 'मोदी का हाथ' रहा है।

                 मोदी की इस 'विजययात्रा' को लेकर लिखे अपने लेख में शोमा चौधरी बिल्कुल ठीक लिखती हैं कि हिन्दुत्व के एकमात्र पोस्टर ब्वॉय बनने का यह एक ऐसा मौका रहा है, जब खुद मोदी ने अपने पैरों पर गोली मार दी है। संघ प्रचारक संजय जोशी को किनारे लगाने में भले ही फौरी तौर पर बाजी मोदी के हाथ लगी हो, मगर आनेवाले महिनों में यह कई अन्य गुल खिलानेवाला है। नब्बे के दशक में गुजरात में भाजपा के सत्तारोहण में पर्दे के पीछे से केन्द्रीय भूमिका निभानेवाले संजय जोशी के प्रति खुद संघ परिवार के अन्दर सहानुभूति बढ़ रही है,जो निश्चित तौर पर 'प्रधानमंत्री' पद के लिए मुन्तज़िर नरेन्द्र मोदी के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

                 यह अलग बात है कि सर्वोच्च पद पर विराजमान होने की ललक से अभी से दौड़ पड़े नरेन्द्र मोदी की बाधा दौड़ तो अभी शुरू ही हुई है।उन्हें यह समझना होगा कि अभी रास्तें में तमाम गड्डे हैं,फिर चाहे गुजरात के विधानसभा के चुनाव हों,अदालत के मित्रा राजू रामचन्द्रन द्वारा उन पर मुकदमा कायम करने की सिफारिश्त रही हो या सूबे में अंजाम दिए गए फर्जी मुठभेड़ों की हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई की तरफ से बढ़ती जांच मसला हो।

? सुभाष गाताड़े