संस्करण: 18  जून-2012

मुसलमानों का घटता प्रतिनिधित्व : राष्ट्रव्यापी चिंतन आवश्यक

? एल.एस.हरदेनिया

               न्यायपालिका की राय भले कुछ भी हो अल्पसंख्यकों को सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व देना हमारे देश की एक ऐसी समस्या है जिसका हल उच्चतम प्राथमिकता देकर ढूंढा जाना चाहिए। 

               अभी हाल में आंध्रप्रदेश के हाईकोर्ट ने मुसलमानों को दिये गये आरक्षण को संविधान विरोधी बताते हुए आंध्रप्रदेश सरकार द्वारा दिये गये आरक्षण को रद्द कर दिया है। यदि किसी देश में सभी वर्गों,सभी धर्मों के मानने वालों, विभिन्न भाषाओं को बोलने वालों को  प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता है तो उस देश में प्रजातंत्र पर हमेशा खतरे की तलवार लटकी रहती है। इस समय हमारे देश में अल्पसंख्यकों,विशेषकर मुसलमानों की स्थिति जहां तक प्रतिनिधित्व का सवाल है काफी चिंता जनक है। 

               एक समय था जब अमरीका में लोकप्रिय नारा था '' No taxation without representation '' ''हमारे प्रतिनिधित्व के बिना हम टेक्स नहीं देंगे।'' अमरीका में नीग्रो समुदाय को काफी हिकारत से देखा जाता था। इसके चलते एक ऐसा समय भी आया जब नीग्रो यह कहने लगे थे कि हम अमरीका के प्रति वफादार क्यों रहें। आखिर अमरीका हमको देता क्या है। अमरीका में नीग्रो को गुलाम रखकर रखा जाता था। जिस गोरे के पास जितनी बड़ी संख्या में गुलाम (नीग्रो) रहते थे समाज में उसकी उतनी ही प्रतिष्ठा रहती थी। अमरीका ने अपनी इस गलती को स्वीकारा और अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गुलामी प्रथा को समाप्त किया। अमरीका में नीग्रो की स्थिति में सतत सुधार होता गया और एक दिन ऐसा आया जब एक काला व्यक्ति (ओबामा) अमरीका का राष्ट्रपति बना।

                अमरीका में सभी क्षेत्रों में धीरे-धीरे नीग्रो का प्रतिनिधित्व बढ़ता गया परंतु हमारे देश में स्थिति इसके ठीक विपरीत है। आजादी के बाद के वर्षों में हमारे देश की लोकसभा और विधान सभाओं में मुसलमानों समेत अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व अच्छा खासा था परंतु धीरे-धीरे स्थिति बदलती गयी और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कम होता गया। अब तो स्थिति और गंभीर हो गई है। मध्यप्रदेश का ही उदाहरण लें। इस समय मध्यप्रदेश की विधानसभा में एक ही मुस्लिम विधायक है। पहले मध्यप्रदेश लोकसभा से और राज्यसभा में भी एक से ज्यादा मुस्लिम सदस्य हुआ करते थे। मध्यप्रदेश की मंत्रिपरिषद में भी मुसलमान सदस्य हुआ करते थे अब तो याद नही पड़ता कि मध्यप्रदेश की मंत्रिपरिषद में कब से कोई मुस्लिम मंत्री नहीं है। दिग्विजय सिंह ने अपने कार्यकाल में दो मुसलमानों को मंत्री बनाया था चूंकि वे विधायक नहीं थे अत: वे दोनों 6 महीने ही मंत्री रह सके थे।   

                लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा के अतिरिक्त प्रशासन के क्षेत्र में भी मुसलमानों की स्थिति नगण्य है। प्रमुख सचिव, सचिव, विभाग प्रमुखों को ही ले तो मुसलमानों का प्रतिनिधित्व लगभग न के बराबर है। मध्यप्रदेश शासन की 2012 की डायरी के अनुसार एक ही मुसलमान प्रमुख सचिव के पद पर है जबकि सचिव के पद पर एक ही मुसलमान है। दो मुसलमान अवर सचिव के पद पर हैं। विभागाध्यक्ष के पद पर एक भी मुसलमान नहीं है।

               आयोगों में मात्र अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष मुसलमान हैं। इस आयोग में दो मुस्लिम अधिकारी हैं। इसके अतिरिक्त वक्फ बोर्ड और मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष मुसलमान हैं। न्यायपालिका के क्षेत्र में एक ही मुसलमान हाईकोर्ट के जज हैं। इसके अतिरिक्त औद्योगिक न्यायालय में भी एक ही मुसलमान है। न्यायपालिका और कार्यपालिका में प्रदेश में अल्पसंख्यक की जनसंख्या के अनुपातमें प्रतिनिधित्व न के बराबर है परंतु विधायिका का हाल तो एकदम खस्ता है। 230 की सदस्य संख्या वाली विधानसभा में एक ही सदस्य मुसलमान है। वह भी भोपाल के मुस्लिम बहुल इलाके से चुना गया है। अब तो राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों को उम्मीदवार भी नहीं बनाती हैं। इसके अलावा एक भी जिला पंचायत का अध्यक्ष मुसलमान नहीं है और एक भी नगर निगम का मेयर मुसलमान नहीं है।

               जिस तरह की स्थिति मध्यप्रदेश में हैं कमोबेश वैसी स्थिति अन्य राज्यों में भी है। इस स्थिति में सुधार करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी चिंतन की आवश्यकता है।

              इस समय जब भी अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की बात होती है तो वह शिक्षण संस्थाओं और सरकारी नौकरियों तक सीमित रहती है। जन प्रतिनिधि संस्थाओं में आरक्षण की बात इस समय विचार का विषय नहीं बन पाया है। परंतु मेरी मान्यता है कि इस पर भी विचार आवयक है। इस जिम्मेदारी को या तो राजनीतिक पार्टियां निभायें या संविधान में आवश्यक संशोधन कर आबादी के अनुसार प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान किया जाना चाहिए। इस समय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को संसद और विधान सभाओं में आरक्षण दिया गया है। यह आरक्षण इन दोनों वर्गों के सामाजिक पिछडेपन के मद्देनजर दिया गया है। इसी तरह का पिछड़ापन मुसलमानों में भी है। उस तथ्य के मद्देनजर आवश्यक कार्यवाही की जानी चाहिए। जब भी मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की बात होती है उसका सबसे ज्यादा विरोध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठन करते हैं। न सिर्फ प्रतिनिधित्व यदि इनके हित में कोई कल्याणकारी कदम उठाया जाता है तो संघ परिवार उसे तुष्टिकरण बताता है। सच्चर कमेटी ने मुसलमानों के कल्याण के लिए अनेक सुझाव दिये हैं पंरतु संघ परिवार ने उसे भी तुष्टिकरण बताया। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने तो विधानसभा में साफ-साफ कहा कि किसी मध्यप्रदेश में किसी हालत में सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर अमल नहीं किया जाएगा क्योंकि उनकी राय में सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर अमल करने से देश का एक और विभाजन होगा। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिह चौहान संघ के वफादार स्वयंसेवक रहे हैं। संघ की प्रारंभ से मान्यता रही है कि मुसलमान भारत में रह तो सकते हैं परंतु दोयम देर्जे के नागरिक की हैसियत से। संघ ने अभी तक अपने इस रवैये को नहीं त्यागा है इसलिए वह चाहे सच्चर कमेटी की सिफारिशों के अमल की बात हो या रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों पर अमल की संघ परिवार पूरी ताकत से उसका विरोध करता है। दु:ख की बात है संघ के इस रवैये का विरोध उतने दमखम से नहीं किया जाता है।

                

? एल.एस.हरदेनिया