संस्करण: 18 जुलाई- 2011

 नारी की निरीहता का प्रमाण है यह गीत 'मुन्नी बदनाम हुई,

डार्लिंग तेरे लिए'

? राजेन्द्र जोशी

               भारतीय समाज ने सदा से ही नारी जाति को निरीह और दोयम दर्जें का समझा है। कविताओं में, कथा-कहानियों में, भाषणों में और यहां तक कि शासकीय योजनाओं में नारी के महत्व को ममता की मूर्ति बताया जाता हैं, किंतु जमीनी हकीकत से तो यही सिध्द होता है कि 'अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,आंचल में है दूध और आंखों में पानी।' नारियों पर अत्याचारों की इतनी अधिक घटनाएं बढ़ती जा रही हैं कि ऐसा कोई दिन नहीं होता जिस दिन भारी अत्याचारों की खबरों की मीडिया में सुर्खियां नहीं बनती। सामाजिक और पारिवारिक नाते-रिश्तों में तो नारी-जीवन दबा-कुचलासा हो ही गया है किंतु यदि साहस दिखाकर कहीं कहीं कोई नारी खुलकर किन्ही क्षेत्रों में उतर आती है तो वहां भी पुरुष नज़रे उस पर कुछ इस तरह से पड़ती रहती है, जैसे वह कोई उपभोग की वस्तु है। नारियों का सड़कों पर चलना,बाजारों में घूमना,यात्राऐं करना गहने पहनना जैसी दिनचर्या न तो सुरक्षित है और न ही उन्हें अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए कहीं से ठोस संरक्षण ही प्राप्त है। फिल्मों में,टेलिविजन के सीरियलों की कहानियों में अक्सर यह देखने को मिलता है कि 'नारी का जीवन ही प्रताड़नाओं का भंडार है। फिल्मी कहानियों में समाज में नारियों के प्रति जो मानसिकता बन गई है उसका जीता-जागता स्वरूप देखने को मिलता रहता है। सदियों से नारी ने अत्याचारों की चक्की में पिस-पिसकर इतनी ज्यादा यातनाऐं भोगी हैं कि वह स्वयं हताश,निराश और बेबश सी होती चली आ रही है। ताकतवर पुरुषों के आगे सदा से ही वह अपना लोहा मानती चली आ रही है। पुरुष को इतना हक है कि वह किसी स्त्री से प्रेम संबंध स्थापित कर अपनी मूंछ पर ताव दे सकता है किंतु ऐसे संबंधों की चर्चा सार्वजनिक हो जाने पर पुरुष नहीं बल्कि स्त्री को ही बदनामी झेलनी पड़ती है। फिल्म 'दबंग'के इस गीत में 'मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए' इस गीत में 'मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए' इस बात का प्रमाण है कि नारी ने स्वयं मान लिया है कि किसी जालिम की हरकतों से बदनामी तो नारी की ही होती है। आखिर यह प्रश्न उठता है कि नारी अकेली ही क्यों ? पुरुष को भी बदनामी मिलना चाहिए।

               ऐसे ढेरों उदाहरण समाज में आये दिन देखने को मिल जाते हैं जिसमें यह हकीकत खुलकर सामने आ जाती है कि नारी को किसी पुरुष से प्रेम करने का उतना अधिकार नहीं है जितना कि जालिम पुरुषों को होता है। समाज की इस परंपरागत सोच के खिलाफ आज की नारी बड़े ही साहस के साथ मैदान में कूदकर आगे आती दिख रही हैं। इस गीत में  नारी के साहस और सोच को बड़ी ही ताकत के साथ पेश किया गया है। प्यार किया तो डरना क्या' प्यार किया कोई चोरी नहीं की। आज नारियों में इसी हौसले से आगे बढ़ने की जरूरत हे जहां परंपरागत सोच के खिलाफ नारी को इस बुलंदी से बढ़ते जाना है-पर्दा नहीं जब कोई खुदा से,बंदों से पर्दा करना क्या। आज नारी यदि बुलंद हौसले से सामने आकर सेवा या किसी भी सार्वजनिक क्षेत्रों में आगे आती है तो उसका क्या हश्र होता है इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं। कामकाजी महिलाओं पर घट रहे दिन पर दिन प्रताड़ना किये जाने की घटनाओं से न तो वह अपने कार्य स्थलों पर सुरक्षित है और न ही वह अपने घर के अंदर दरिंदों की हरकतों से।

               नारी उत्पीड़न के मामलों में अक्सर आम लोग सरकारी नीतियों और उसमें ढीले प्रशासन को ही कोसते रहते हैं किंतु उन्हें अपने समाज की नारी के प्रति बेहूदगी के बर्ताव पर भी ध्यान देना होगा और नारी के आंचल की सुरक्षा के लिए समाज में जन जागृति के प्रति सचेत रहना होगा।

               एक तरफ जब नारी को पुरुष के साथ समानता का दर्जा देने की बात की जाती है, वहीं दूसरी तरफ नारी के प्रति परंपरागत रूढ़ीवादिता का नजरिया भी इस प्रगतिशील युग में अभिशाप बना हुआ है। नारी का चरित्र कतिपय दबंगं की वल्गर हरकतों से आज भी मुक्त नहीं हो पाया है। सार्वजनिक रूप से उस पर फब्तियां कसना, मजाक उड़ाना और उसकी अस्मिता के साथ खिलवाड़ करना जैसे कतिपय दुराचरणों को झेलते हुए हालांकि नारी-हृदय जिस तरह से लाचार बना हुआ है वह आज के समाज की अंदरुनी सच्चाई है जो समाज के विद्रुप चरित्र की पहचान बन गया है। सुशील और शीलवान नारिया जब 'शीला की जवानी' जैसे गीत सुनती हैं तो वे इसे नारी-समाज के प्रति घोर अपमान ही समझती हैं। यदि कोई नारी अपने जीवन की विडंबनाओं के खिलाफ उठकर अपने प्रति हो रहे सामाजिक अपमान का प्रतिकार करती है, तो उनकी खिल्लियां उड़ाकर उन्हें हतोत्साहित कर दिया जाता है। समाज इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ सकता-'औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया'-जब दिल चाहा मचला-कुचला'...।

               नारी आज पुरुषों साथ कंधा से कंधा मिलाकर रूढ़िवादी विडंबनाओं से जूझ रही है,ऐसे दौर में उसकी खिल्लियां उड़ाना,फब्तियां कसना,उसका शोषण करना जैसी हरकतों के खिलाफ समाज को भारतीय नारियों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व और उसकी मर्यादाओं का सम्मान करते रहने की जरूरत है, क्योंकि आज की नारी समाज और परिवारों का भविष्य संवार रही है और अपने भीतर इतनी ताकत पैदा कर रही है कि वह विडंबनाओं का प्रतिकार कर सके। समाज की कांटेदार डालियं में नारी एक खिलते हुए गुलाब की तरह सामाजिक वातावरण को सुंदर और खुशबूदार बनाने के लिए नियति की तरफ से एक नायाब तोहफा है। 


? राजेन्द्र जोशी