संस्करण: 18 जुलाई- 2011

उ.प्र.भाजपा-बाड़ ही खेत चरने पर आमादा

? सुनील अमर

               उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव नजदीक आ गये हैं, राजनीतिक दलों की गतिविधियों से ऐसा लगने लगा है फिर भी राज्य में मौजूद दोनों राष्ट्रीय दल -काँग्रेस और भाजपा, में अभी वह तेजी नहीं दिख रही है जो राज्य स्तरीय बसपा और सपा में है। इन दोनों दलों ने तो अपने संभावित प्रत्याशियों की सूची भी लगभग पूरी कर ली है,जबकि कॉग्रेस और भाजपा ने अभी शुरुआत ही नहीं की है। जैसा कि सभी जानते हैं,आंतरिक अनुशासन के मामले में भाजपा कॉग्रेस का मुकाबला नहीं कर सकती इसलिए भाजपा की तरफ से प्रत्याशियों की घोषणा और उस पर होने वाले संभावित गृह युध्द की मीमांसा अभी से होने लगी है। हमेशा की अपेक्षा इसके इस बार ज्यादा संगीन होने की संभावना व्यक्त की जा रही है क्योंकि पार्टी की प्रदेश इकाई में इस बार न सिर्फ बड़े नेताओं की भरमार हो गई है बल्कि तमाम बड़े और वरिष्ठ नेताओं के पुत्र-पुत्रियों में भी टिकट हासिल करने की होड़ सी लग गई है। इसकी चर्चा करने पर सांगठनिक अनुभव रखने वाले वरिष्ठ भाजपा नेताओं के चेहरे पर परेशानी के लक्षण साफ-साफ दिखने लगते हैं।

               बीते एक दो वर्षों में प्रदेश में जो भी चुनाव या उपचुनाव हुए उनमें भाजपा की हालत बहुत खराब रही है। इसे एक वाक्य में इस तरह समझा जा सकता है कि प्रदेष में नवगठित और मुस्लिम संगठन के तौर पर पहचान बनाने वाली पीस पार्टी तथा कई निर्दलियों से भी भाजपा प्रत्याशी इन चुनावों में पीछे रहे हैं। ऐसा उन क्षेत्रों में भी हुआ जो भाजपा के दिग्गजों के लिए सुरक्षित माने जाते थे। अभी साल भर भी नहीं हुआ जब जिला पंचायत अध्यक्ष के स्थानीय निकाय चुनाव में प्रदेश के 70 जिलों में से सिर्र्फ एक जिले में ही भाजपा प्रत्याशी जीत सका था। जाहिर है कि इससे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। यही कारण था कि संगठन की ढ़ीली चूड़ियों को कसने के फेर में राष्ट्रीय नेतृत्व ने प्रदेश इकाई को बड़े-बड़े नेताओं और असंख्य पदाधिकारियों से भर दिया। प्रदेश अधयक्ष, तीन प्रदेश प्रभारी, पूर्व प्रदेश अधयक्षों की एक कोर कमेटी, चुनाव तैयारियों को मॉनीटर करने के लिए पॉच वरिष्ठ नेताओं की एक कमेटी तथा चुनाव प्रभारी और विशेष चुनाव प्रभारी! अब नेता से लेकर कार्यकर्ता तक के लिए यह एक अबूझ पहेली कि इसमें से सबसे बड़ा और शक्तिमान कौन है। इसमें ताजा आमद वाली सुश्री उमा भारती, योगी आदित्य नाथ, वरुण गाँधी और पूर्व बजरंगी विनय कटियार जैसों का जिक्र जानबूझकर छोड़ दिया गया है क्योंकि ये सब तो प्रदेश में रहेंगें ही।

               उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए यहाँ तमाम बड़े नेताओं का होना भी एक समस्या ही है। अब इन बड़े नेताओं के पुत्रों व पुत्रियों ने भी प्रदेश की राजनीति में हाथ आजमाने की शुरुआत कर दी है और ऐसा प्रत्येक बड़ा नेता चाह रहा है कि उसकी संतान को किसी दमदार सीट का टिकट मिल जाय! अब यह चाह कोढ़ में खाज वाली ऐसी स्थिति को चरितार्थ कर रही है जिससे निपटना पार्टी नेतृत्व के लिए आसान नहीं होगा। मसलन- पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अधयक्ष तथा प्रदेश के विशेष चुनाव प्रभारी राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह हैं। इनके लिए कई सीटों पर सर्वेक्षण हो रहा है कि यह कहाँ से जीत सकते हैं। चर्चा है कि गौतमबुध्द नगर, वाराणसी और लखनऊ में से किसी एक या एकाधिक पर इन्हें टिकट मिल सकता है। श्री पंकज सिंह वैसे भी प्रदेश संगठन में मंत्री हैं। दूसरे बड़े नेता सांसद लालजी टंडन हैं जिनके पुत्र गोपाल टंडन हैं। माना जाता है कि श्री लालजी टंडन श्री अटल बिहारी वाजपेयी के कृपापात्र हैं। ये जब लखनऊ से सांसद बने तो इनके द्वारा रिक्त विधानसभा सीट लखनऊ पश्चिमी पर इनके पुत्र ने अपनी दावेदारी जताते हुए टिकट मॉगा लेकिन वह नहीं मिला। अब 2012 के चुनाव में ये फिर दावेदार हैं।

               एक दूसरे बड़े नेता सत्यदेव सिंह हैं। श्री सिंह न सिर्फ वरिष्ठ हैं बल्कि मौजूदा प्रदेश संगठन में प्रवक्ता भी हैं। अयोधया से सटे जनपद गोण्डा को काटकर बनाये गये जनपद बलरामपुर से श्री सिंह सांसद हुआ करते थे। इस प्रकार इनकी राजनीतिक कर्मभूमि गोण्डा और बलरामपुर ही है। श्री सिंह के पुत्र वैभव सिंह हैं और विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं लेकिन बलरामपुर या गोण्डा से नहीं बल्कि किसी जिताऊ सीट से और इस क्रम में इनकी निगाह लखनऊ पूर्वी सीट पर है। यह सीट भाजपा की मजबूत सीटों में से है। एक अन्य वरिष्ठ नेता पूर्व सांसद रामबख्श वर्मा हैं जो अपने बेटे आलोक वर्मा के लिए कन्नौज से टिकट चाहते हैं। इसी प्रकार पूर्व संगठन मंत्री, पूर्व विधान परिषद सदस्य तथा वर्तमान में राष्ट्रीय कार्य समिति के सदस्य प्रो. रामजी सिंह हैं जो अपने लाड़ले अरिजित सिंह को जनपद मउ से टिकट दिलवाना चाहते हैं।

               इसी प्रकार प्रदेश सरकार में कई बार मंत्री रह चुकी वरिष्ठ नेता व मौजूदा प्रदेश महामंत्री श्रीमती प्रेमलता कटियार हैं जो अपनी पुत्री नीलिमा कटियार के लिए कानपुर से टिकट चाहती हैं। एक समय के दिग्गज रहे स्व. रामप्रकाश त्रिपाठी की पुत्री सुश्री अर्चना पाण्डे हैं जो छिबरामऊ से एक अदद टिकट की ख्वाहिशमंद हैं। यह सूची अभी और भी लम्बी होगी और जितनी लम्बी होगी उतना ही पार्टी का चुनावी और अनुशासनात्मक ढ़ाँचा बिगड़ेगा। इससे तमाम लोग नाराज होंगें और आयाराम-गयाराम का खेल चालू होगा। इन दिक्कतों के साथ-साथ प्रदेष के बनते-बिगड़ते राजनीतिक समीकरण भी हैं जिनसे पार पाने के लिए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व माथापच्ची कर रहा है। असल में बसपा की अद्भुत मजबूती और कॉग्रेस के दमदार उभार ने भाजपा के साथ-साथ सपा को भी चिंतित कर रखा है। इन पँक्तियों के लेखक का शुरु से ही यह मत रहा है कि सपा और भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब भी इनमें से एक का भला होगा तो दूसरे को प्रतिक्रियास्वरुप फायदा हो ही जाएगा।

               उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब से भाजपा का अवसान हो रहा है ठीक तभी से सपा का ग्राफ भी गिरावट पर है। इन दोनों पार्टियों को सबसे ज्यादा नुकसान कॉग्रेस से दिख रहा है। बसपा संस्थापक स्व.कांशीराम का सिध्दान्त ही था कि कॉग्रेस की मजबूती बसपा के लिए खतरे की घंटी होगी। इस प्रकार आज उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और भाजपा के लिए कॉग्रेस एक चुनौती है। भाजपा की पकड़ अपने पितृ संगठन जनसंघ के समय से ही ज्यादातर शहरी मतदाताओं पर ही रही है। वो तो बाद में अयोध्या आंदोलन के दौरान भाजपा का विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ। अब भाजपा नेतृत्व यह सोचकर चिन्तित है कि राहुल गॉधी की सक्रियता से कहीं शहरी मतदाता कॉग्रेस की तरफ न मुड़ जाय। बीते लोकसभा चुनाव के बाद राजनीतिक विश्लेषकों ने यह राय व्यक्त की थी कि पिछड़े वर्ग के मतदाताओं का झुकाव कॉग्रेस की तरफ हुआ है। भाजपा के स्वर्णिम दिनों में यह वर्ग अच्छी तादाद में भाजपा से जुड़ा था। इसी वर्ग को साधने के लिए ही उमा भारती को लाया गया है। इस प्रकार उत्तर प्रदेश में एक विचित्र संयोग यह हो गया है कि देश के दोनों राष्ट्रीय दलों ने यहॉ की चुनावी कमान जिन्हें सौंप रखी है वे न सिर्फ मध्य प्रदेश के हैं बल्कि वहॉ के पूर्व मुख्यमंत्री भी रहे हैं यानी कि कॉग्रेस के दिग्विजय सिंह और भाजपा की उमा भारती! 

               भाजपा से जहॉ अपेक्षा यह थी कि वह मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में अपने लिए कोई समीकरण तलाश कर नेताओं और कार्यकर्ताओं को आश्वस्त करे, वहॉ उसके बड़े नेता अपने और अपनी संतानों के राजनीतिक भविष्य को आश्वस्त करने में ही अपनी सारी ऊर्जा लगा रहे हैं। इससे पार्टी में निचले स्तर पर हताशा जनक संदेश जा रहे हैं। पार्टी के निष्ठावान और समर्पित नेता व कार्यकर्ता खिन्न हैं लेकिन वे करें ही क्या जब बाड़ ही खेत चरने पर आमादा है।


? सुनील अमर