संस्करण: 18 जुलाई- 2011

खुले में सड़ता अनाज और

संवेदनहीन सरकार

? जाहिद खान

               हमारे मुल्क में बीते कुछ सालों से हुक्मरानों की जैसे यह परिपाटी ही बन गई है कि, वह अपनी गल्तियों से कभी कोई सबक नहीं लेते। एक बार वह जो गलती कर देते हैं, उसे सुधारने की बजाय बार-बार दोहराते हैं। गुजिश्ता साल ही हमारी सर्वोच्च अदालत ने मुल्क भर में अनाज की बर्बादी पर सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए आदेश दिया था कि हर एक सूबे में पर्याप्त क्षमता वाले भंडारगृह बनें, जिससे आइंदा अनाज खुले में न सड़ता रहे। पूरा एक साल बीत गया, लेकिन हालात ज्यों के त्यों बने हुए हैं। बरसात के शुरू होते ही एक बार फिर मुल्क के अलग-अलग हिस्सों से अनाज की बर्बादी की खबरें आनी लगी हैं। मध्यप्रदेश में भी शिवराज सरकार द्वारा खरीदा गया लाखों टन गेहूं सुरक्षित भंडारण नहीं होने के चलते खुले में पड़ा हुआ है। खुले में रखे होने का ही नतीजा है कि अब यह गेहूं आहिस्ता-आहिस्ता सड़ने लगा है। जबलपुर हाई कोर्ट ने हाल ही में, सूबे में गेहूं की इस बेशुमार बर्बादी का संज्ञान लेते हुए केन्द्र व राज्य सरकार दोनों से ही इसकी वजह पूछी है। और दोनों सरकारों से 3 हते में जबाव देने को कहा है।

                गौरतलब है कि जबलपुर जिले के अमित कुमार प्यासी की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जबलपुर हाई कोर्ट ने यह सवाल किया। याचिका के मुताबिक पूरे सूबे में फिलवक्त 18 लाख मीट्रिक टन गेहूं खुले में पड़ा है। जो आहिस्ता-आहिस्ता बर्बाद होकर नालियों में जा रहा है। सरकार उसे रोकने की राह में कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। जाहिर है,यह शिवराज सरकार की गंभीर लापरवाही है। और ऐंसा कोई पहली बार नहीं है, जब व्यवस्था की बदइंतजामी के चलते हजारों टन अनाज सड़ गया हो,बल्कि यह कहानी सूबे में हर साल एक ही तरह से दोहराई जाती है। सूबे में बीते साल ही 10हजार टन गेहूं यूं ही बर्बाद होकर नालियों में बह गया था। जब पानी सिर से ऊपर हो गया और सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई, तब जाकर कुछ हालात सुधारे। वरना, गरीबों के हक का और भी ज्यादा अनाज बर्बाद हो जाता।

               दरअसल, मधयप्रदेश में इस मर्तबा हुआ यूं कि, यहां गेहूं का लक्ष्य से ज्यादा उत्पादन हुआ। लक्ष्य से ज्यादा उत्पादन होने के अनुमान के बाद भी सूबाई सरकार ने बारदाने और भंडारण का जरूरी बंदोबस्त नहीं किया। तिस पर कोढ़ में खाज यह बात हुई कि सरकार को समर्थन मूल्य पर 47 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदना था, लेकिन उसने खरीदा 49 लाख मीट्रिक टन। यानी, लक्ष्य से 2 लाख मीट्रिक टन ज्यादा। जबकि, सूबे के अंदर गोदामों की भंडारण क्षमता सिर्फ 24 लाख मीट्रिक टन है। जिसका नतीजा यह निकला कि लाखों टन अनाज भंडारण बंदोबस्त न होने की वजह से खुले आसमान के नीचे आ गया। अलबत्ता, सरकार ने कुछ अस्थाई कैंप भी लगाए, लेकिन फिर भी वह पूरे अनाज को सही तरह से कवर नहीं कर पाई। मौजूदा पसमंजर यह है कि सूबे के दो दर्जन जिलों में अभी भी लाखों टन अनाज पन्नियों और तिरपालों के भरोसे रखा हुआ है।

               एक तरफ अनाज खुले में पड़ा सड़ रहा है, तो दूजी तरफ राज्य भंडार निगम ने अपने ज्यादातर गोदाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों को किराए पर दे रखे हैं। निगम गरीबों के हक के दो वक्त के निवाले की कीमत पर इन निजि कंपनियों से किराया व कमीशन वसूलने में लगा हुआ है। निगम की इस मुनाफाखोरी की वजह से लाखों टन अनाज सुरक्षित नहीं रह पा रहा है। जब यह बात अदालत के संज्ञान में लाई गई और मीडिया में लगातार इसकी खबरें आईं, तब जाकर सरकार जागी और अब उसने सामुदायिक भवनों, निजि गोदामों, धर्मशाला, पंचायत भवनों आदि में जबर्दस्ती भंडारण शुरू कर दिया है। अपनी गल्तियों को छुपाने के लिए सरकार और प्रशासन दोनों ही लीपापोती करने में लग गई है। कई जिलों में भीगा गेहूं सुखाने की बजाय गीला ही भंडारण कर दिया गया है, जो कि अब शायद ही खाने के लायक रह जाए। आलम यह है कि बारिश में सीहोर, हरदा, श्योपुर, सागर, जबलपुर समेत आधा दर्जन जिलों में बड़े पैमाने पर गेहूं का नुक्सान हो गया है। शिवराज सरकार इस बार न सिर्फ गेहूं के सुरक्षित भंडारण न कर पाने के चलते कठघरे में है, बल्कि गेहूं खरीदी में भी उस पर भ्रष्टाचार के इल्जाम लगे हैं। सूबे में इस मर्तबा समर्थन मूल्य पर गेहूं की रिकॉर्ड खरीदी की गई है और इसी खरीदी में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार किया गया। अधिकारियों,व्यापारियों व बिचौलियों की मिलीभगत से उत्तरप्रदेश,महाराष्ट्र और राजस्थान में सस्ता गेहूं खरीद कर उसे सूबे के सरकारी खरीद केन्द्रों पर ज्यादा कीमत में बेचा गया। एक अनुमान के मुताबिक यह बेजा खरीद-फरोख्त कर संबंधित अफसरों व व्यापारियों ने दो सौ रूपया प्रति क्विंटल मुनाफा कमाया। जबकि, समर्थन मूल्य और उस पर 100 रूपए प्रति क्विंटल बोनस पर यह खरीद केवल मधयप्रदेश के किसानों से ही की जानी थी। यही नहीं,गेहूं के लिए बारदाना खरीदने और परिवहन के नाम पर भी बड़े पैमाने पर घोटाला हुआ। अभी हाल ही में यह बात मधयप्रदेश विधानसभा में भी उठी। गेहूं की खरीद और भंडारण में हुई धांधलियों व भ्रष्टाचार पर विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने राज्य सरकार को जमकर घेरा।

               कुल मिलाकर, सूबे में गेहूं खरीद में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों और भंडारण में साफ-साफ लापरवाही बरतने के बाद भी शिवराज सरकार अपनी गल्तियों को मानने को तैयार नहीं है। हाई कोर्ट के सरकार से जबाव तलब के बाद भी खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्री पारस जैन अपनी सरकार का बचाव कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में खुले में सड़ रहे अनाज की तस्वीरें आने के बाद भी वे दावा कर रहे हैं कि सूबे में अनाज का सुरक्षित भंडारण किया गया है। यही नहीं, उन्हें गेहूं खरीदी में भी कोई भ्रष्टाचार नहीं दिखलाई देता। भ्रष्टाचार में गले तक डूबी शिवराज सरकार की संवेदनहीनता का यह एक छोटा सा नमूना भर है कि खाने के अनाज जैसे महत्वपूर्ण मसले पर भी वह जरा सा संजीदा नहीं है।


? जाहिद खान