संस्करण: 18 जुलाई- 2011

शिवराज की स्वीकारोक्ति

? महेश बाग़ी

               कठोपनिषद् में कहा गया है कि सच्चाई को सौ तालों में भी जड़ दिया जाए, तो भी वह एक न एक दिन बाहर आ ही जाती हे, यह वचन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चरितार्थ करते नज़र आ रहे हैं। हाल ही में उन्होंने कहा कि प्रदेश में जनता को उनके हक़ मिलने में देरी हो रही है। लोक कल्याण शिविर, अंत्योदय मेले, लोक सेवा गारंटी अधिनियम और जन सुनवाई जैसी सरकारी कोशिशों के बाद भी शिवराज उपरोक्त बयान दे रहे हैं, तो उन्हीं से पूछा जाना चाहिए कि फिर सरकार क्या कर रही है ?जनता को उनके हक़ मिलने में हो रही देरी के लिए कौन ज़िम्मेदार है और उनके खिलाफ कोई क़दम क्यों नहीं उठाया जा रहा है ?क्या एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार के मुखिया का इस तरह का ग़ैर जिम्मेदाराना बयान यह साबित नहीं करता कि शासन-प्रशासन तंत्र विफल हो गया है।

               इसमें कोई दो राय नहीं कि शिवराज सरकार ने लाड़ली लक्ष्मी, मुख्यमंत्री कन्यादान, अटल बाल आरोग्य मिशन जैसी कई कल्याणकारी योजनाएं लागू की हैं, किंतु क्या सिर्फ़ योजनाएं बना देने भर से सरकार के कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है ? योजना बनाने के बाद यह देखा जाना चाहिए कि उनका क्रियान्वयन भी हो रहा है या नहीं। इसी के साथ इस पर भी नज़र रखी जानी चाहिए कि कहीं अपात्र लोग तो योजनाओं का लाभ नहीं उठा रहे हैं या नौकरशाही काग़जी खानापूर्ति तो नहीं कर रही है। इसे प्रदेशवासियों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जनकल्याणकारी योजनाएं लागू करने का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार इन योजनाओं कही सहीं ढंग से मॉनीटरिंग नहीं कर पाई। इसी का नतीजा हुआ कि या तो अपात्र लोग लाभान्वित हो गए या नौकरशाहों ने कागज़ी खानापूर्ति कर योजनाओं का बंटाढार कर दिया। इसी कारण जननी सुरक्षा योजना का लाभ महिलाओं को नहीं मिल पा रहा है और वे अस्पताल परिसर में बच्चों को जन्म देने को मजबूर हैं। लाड़लियों का मामा और जननियों का भाई कहलाने वाले मुख्यमंत्री के काफिले के लिए रास्ता रोके जाने के कारण एक महिला ने सड़क पर ही प्रसव कर दिया।

               अटल बाल आरोग्य मिशन की हालत यह है कि कुपोषण के मामले में प्रदेश लगातार पिछड़ता जा रहा है। इस मामले में अंतराष्ट्रीय स्तर पर बदनामी झेलने के बावजूद पोषण आहार कार्यक्रम की ख़ामियां नहीं सुधारी जा सकी हैं। जिस नंदी फाउंडेशन पर पोषण आहार की ज़िम्मेदारी है, उसके आहार में छपकली, कॉकरोच, कीड़े-इल्लियां निकलने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इस तरह के पचासों मामले प्रकाश में आने के बाद सरकार ने उक्त संस्था के विरुध्द कोई क़दम उठाने की बजाय निकायकर्ताओं को ही फंसा डाला। नंदी फाउंडेशन के प्रति सरकार की सहानुभूति का कारण यह बताया जाता है कि यह संस्था दक्षिण भारत के एक वरिष्ठ भाजपा नेता की है। इसीलिए सरकार कोई क़दम नहीं उठा रही है। ऐसे में यह सवाल सहज ही उठाया जा सकता है कि क्या अपने एक नेता को उपकृत करने के लिए प्रदेशभर के नौनिहालों की जान ख़तरे में डालना कहां तक जायज़ है ?

               मुख्यमंत्री कन्यादान योजना की हालत यह है कि इसमें बाल विवाह तक करवा दिए गए और नौकरशाहों ने कन्यादान में नकली जेवर तक चढ़ा दिए। ताज्जुब है कि यह सब जानकारी मय सबूत के सामने आने के बावजूद किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया गया। ऐसे में कार्रवाई की बात तो दूर की कौड़ी है। सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि बग़ैर भेंट चढ़ाए कोई काम नहीं होता। यद्यपि लोक सेवा गारंटी अधिनियम लागू कर सरकार ने हरेक काम की समय सीमा तय कर दी है,मगर इसका पालन हो रहा है या नहीं यह देखने वाला कोई नहीं है। यही हाल जन सुनवाई का भी है। लोग बार-बार शिकायतें लेकर आ रहे हैं,पर प्रशासन अपने ही ढर्रे पर चल रहा है, प्रशासन तंत्र पर सरकार का कोई नियंत्रण न होने के कारण प्रदेश में अपराधों का ग्राफ़ तेज़ी से बढ़ता जा रहा है। हत्या, अपहरण, लूट, डकैती जैसी वारदातों की ख़बरें रोज़ आ रही है और प्रशासन लीपापोती में जुटा है। भोपाल में मणप्पुरम गोल्ड में डकैती के मामले में भी पुलिस का स्याह चेहरा उजागर हो चुका है, जिसमें पुलिस ने निर्दोष युवकों को आरोपी बना कर जेल भिजवा दिया था,जबकि यह डकैती सिमी के गुर्गों की करतूत थी। यदि सिमी के ये गुर्गे एटीएस की गिरफ्त में नहीं आते, तो निर्दोष जेल में ही सड़ते रहते।

               मुख्यमंत्री का यह कथन भी घोर आपत्तिजनक है कि जनता को उसका हक़ दिलाना इतना आसान नहीं है, मगर हम कोई न कोई रास्ता निकालना जानते हैं। अरे भाई, जब रास्ता निकालना जानते हैं, तो साढ़े पांच साल से हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे हैं ? किसने आपके हाथ बांध रखे हैं ? क्या इससे यह साबित नहीं होता कि मुख्यमंत्री या तो लाचार हैं या उनमें इच्छाशक्ति की कमी है। लोकतंत्र में जनता को उसका हक़ दिलाना हर सरकार की ज़िम्मेदारी होती है और जब सरकार का मुखिया ही लाचार दिखाई दे तो जनता का भगवान ही मालिक है। ऐसी लचर व्यवस्था के लिए सिर्फ़ प्रशासन को दोषी ठहराना ग़लत है। दोषी तो मंत्री और विधायकगण भी हैं, जिन्हें अपने अपने स्वार्थों के आगे जनहित नज़र ही नहीं आते हैं। इन सबकी जवाबदेही तय कर उनसे जवाब मांगा जाना चाहिए और संतोषजनक जवाब न मिलने पर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए। इसी में प्रदेश और यहां की जनता की भलाई है। यदि सरकार इस मामले में और कोताही बरतती है तो जनता उसे बाहर का रास्ता दिखाने से नहीं चूकेगी।


? महेश बाग़ी