संस्करण: 18 जुलाई- 2011

नकली दवा, असली मौत

क्या मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ इस धन्धे के अहम केन्द्र बने हैं ?

? सुभाष गाताड़े

               क्या सूबा मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ नकली दवाओं के वितरण के अहम मुकाम बने हैं। और आम लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने के इस काम में स्वास्थ्य विभाग के अफसरों एवं दवा कम्पनियों की आपसी सांठगांठ के सबूतों की तरफ हुक्मरानों ने अपनी आंखें मूंदी हुई हैं ? इसे संयोग कहें या नकली दवाओं के बढ़ते नेटवर्क का नतीजा कि भोपाल स्थित ड्रग लैबोरेटरी और कोलकाता स्थित केन्द्रीय औषधि प्रयोगशाला की लगभग एकही समय प्रकाशित रिपोर्टें इसी बात को प्रमाणित करती दिखती हैं कि इस धन्धे ने अपने हाथ पांव किस तरह इन इलाकों में पसारे हैं। मुख्यत:मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ पर केन्द्रित ये रिपोर्टें बताती हैं कि इन क्षेत्रों में नकली दवाओं की आपूर्ति आठ राज्यों में स्थित दवा कम्पनियों से की जा रही थी, जिनका सबसे बड़ा हिस्सा मध्यप्रदेश की फैक्टरियों में बन रहा था।

               अब जहां तक मधयप्रदेश का सवाल है तो ड्रग लैबोरेटरी के अधिकारियों ने पिछले साल भोपाल के सरकारी अस्पतालों का औचक निरीक्षण करकई प्रमुख दवाइयों की सैम्पलिंग की थी। सैंपल की जांच के बाद इस जांच रिपोर्ट को खाद्य और औषधि प्रशासन के कंट्रोलर के पास भेजा गया था। इस सैंपल की जांच किए जाने पर कई दवाइयां अमानक पायी गयीं तथा कई अन्य गड़बड़ियों का खुलासा भी हुआ। इसी किस्म का हाल छत्तीसगढ़ का भी था, जहां जांच के लिए कोलकाता की प्रयोगशाला में 57 सैंपल भेजे गए थे जबकि जांच के दौरान 27 दवाएं घटियां पायी गयीं। सूबे के डिप्टी कंट्रोलर ने स्पष्ट बताया कि राज्य में पहली दफा इतनी बड़ी संख्या में घटिया और नकली दवाओं के कारोबार का पता चला है। इनमें से कई दवाइयों की स्थिति यह थी कि उसके रैपर व शीशियों पर मानक कुछ लिखे गए थे, जबकि वास्तव में वह कुछ अन्य थीं।

               इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि दोनों ही राज्यों में भाजपा की हुकूमत कायम है, जहां कई नौकरशाह भ्रष्ट आचरण में लिप्त पकड़े गए हैं, यह सोचना मासूमियत की पराकाष्ठा होगी कि दवा के नाम पर मौत बेचने के इस धंधो से संगठन के शीर्षस्थ नेताओं की सहमति प्राप्त नहीं होगी। वैसे तथ्य यही बताते हैं कि पूरे देश में नकली दवाओं के कारोबार में उछाल आया है।

             याद रहे कि नकली दवाओं के बढ़ते कारोबार पर रोक लगाने के मकसद से स्वास्थ्य मंत्रालय ने पिछले साल एक अभिनव योजना का खाका तैयार किया था। प्रस्तुत योजना के तहत ऐसे जागरूक लोग/'विसलब्लोअर्स'जो नकली दवाओं के उत्पादन एवम उसके बिक्रय के बारे में सरकारी एजेंसियों को आगाह कर दें उन्हें 25 लाख रूपए तक का इनाम मिल सकता है। इसके तहत न केवल नकली दवाओं बल्कि नकली सौंदर्य प्रसाधानों एवम चिकित्सकीय उपकरणों को भी शामिल किया गया था। प्रगतिशील गठबन्धन सरकार की पिछली पारी (2004-2009) के आखरी दिनों में नकली दवाइयों पर अंकुश लगाने के लिए कुछ सख्त कदमों की घोषणा भी की थी। इसके अन्तर्गत नकली दवाओं के व्यापार या उनके निर्माण में लगे लोगों को दस साल जेल की सज़ा से लेकर उम्र कैद के प्रावधान भी पेश किए गए थे। अभी यह समाचार उपलब्ध नहीं है कि कितने लोग इसके चलते दण्डित हो सके।

               इस सिलसिले में कनाडा विश्वविद्यालय के इम्युनोलोजिस्ट प्रोफेसर अमिर अट्टारन की अगुआई में गठित अर्थशास्त्रियों और अन्य अनुसन्धानकर्ताओं की टीम -जिसमें अमेरिका तथा ब्रिटेन के विशेषज्ञ भी शामिल थे -ने भारत के दवा उद्योग के बारे में अपने निष्कर्षों को लगभग दो साल पहले लोगों तक सांझा किया था। 'जर्नल पब्लिक लाइब्रेरी आफ साइन्स' में प्रकाशित उनके निष्कर्षों के मुताबिक छह साल पहले सरकारी पैनल द्वारा मामले की जांच किए जाने तथा इसे सत्वर सुधारने के लिए कदम उठाने की सिफारिश करने के बावजूद भारत के मरीजों को आज भी घटिया किस्म की दवाइयों का सेवन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। (द टेलिग्राफ, 31 जुलाई 2009)

               अपने इस विस्तृत अध्ययन में अट्टारन की अगुआई में बनी इस अन्तरराष्ट्रीय टीम ने दिल्ली और चेन्नई की दुकानों से 281 किस्म के दवाइयों के सैम्पल जुलाई 2008 से मार्च 2009 के बीच इकट्ठा किए और उन पर अपना अध्ययन किया। इस अन्तरराष्ट्रीय रिसर्च टीम ने देखा कि टीबी,मलेरिया और अन्य संक्रमणों में इस्तेमाल किए जानेवाली विभिन्न दवाइयां उन परीक्षणों में असफल हुई जब उनके औषधशास्त्रीय घटकों का आकलन किया जा रहा था। दिल्ली से खरीदे गए 12 फीसदी सैम्पल और चेन्नई से खरीदे गए 5 फीसदी सैम्पल एक या दो परीक्षणों में फेल हुए। प्रोफेसर अट्टरन का कहना था कि सैम्पलसाइज छोटा होने के बावजूद यह दिखता है कि स्वास्थ्य के लिए उसके गम्भीर नतीजे हो सकते हैं। अगर असफलता दर 2फीसदी भी हो तो उसका अर्थ निकलता है कि भारत में उन दवाइयों को खरीदनेवाले हजारों लोगों के लिए वह बेकार साबित होंगी। अध्ययन में यह बात भी सामने आयी कि घटिया किस्म की दवाइयों का संकेन्द्रण कुछ खास इलाकों या ऐसे वातावरण में जहां अधिक सख्त नियंत्रण न हो, वहां अधिक दिखता है।

               आज से सात साल पहले कौन्सिल आफ साइन्टिफिक एण्ड इण्डस्ट्रीयल रिसर्च के तत्कालीन मुखिया आर माशलेकर की अगुआई में हुए अध्ययन में यह बात साफ उजागर हुई थी घरेलू दवाइयों के बाजार में घटिया किस्म की लगभग आठ से दस फीसदी दवाइयां उपलब्ध हैं। इसमें यह सिफारिश भी की गयी थी कि वर्ष 2006तक जरूरी कदम उठाएं जाएं। सेन्ट्रल ड्रग स्टैण्डर्ड कन्ट्रोल संगठन -जिसे यह जिम्मा है कि दवाइयों की गुणवत्ता को नियंत्रित करे - के मुताबिक भी यह आंकड़ा सात फीसदी के करीब बैठता है। विभिन्न राज्यों में इनके द्वारा अंजाम दिए जानेवाले दवा परीक्षणों में यह बात सामने आयी थी। दूसरी तरफ,टाईम्स आफ टाईम्स इस सिलसिले में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक अकेला हिन्दोस्तान लगभग 35 फीसदी नकली दवाओं के कारोबार में संलिप्त है। (5 नवम्बर 2009)

               वैसे नकली दवाओं या सबस्टेण्डर्ड दवाओं को लेकर जो बहस चलती है, इसके दो ऐसे आयाम हैं, जो अक्सर समूची बहस में अनदेखे रह जाते है,जिन पर हमें गौर करते रहना चाहिए। उसका एक पहलू पश्चिमी देशों की मिल्कियतवाली विशाल बहुदेशीय दवा कम्पनियां बनाम भारत के बाजार से सम्बधित है तथा इसका दूसरा पहलू देश के अन्दर बड़ी दवा कम्पनियां बनाम छोटी दवा कम्पनियों के आपसी विवाद से भी ताल्लुक रखता है।

               उदाहरण के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक निकाय 'इण्टरनेशनल मेडिकल प्राडक्टस एण्टी काउण्टरफिटिंग टास्कफोर्स में वर्ष 2008-2009 में नकली दवाइयों को लेकर जो बहस चली उसकी भारत में एक तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। नकली/जाली दवाइयों की जिस नयी परिभाषा की बात वहां चल रही थी उसकी व्याख्या यहां इस ढंग से की गयी कि यह एक तरह से पश्चिमी देशों और विशाल दवा कम्पनियों द्वारा जेनेरिक उत्पादकों (प्रजातिगत उत्पादकों) से जिस प्रतियोगिता का सामना करना पड़ रहा है उसे दबाने की कोशिश है।

               दूसरी तरफ, मुल्क के अन्दर छोटे दवा उत्पादकों की यह शिकायत रहती है कि उद्योगपतियों के संगठन 'कान्फेडरेशन आफ इण्डियन इण्डस्ट्रीज' का यही एजेण्डा है कि बड़े उत्पादकों को पर भरोसा कायम हो यही कोशिश की जाए ताकि उनकी निर्यात क्षमता बढ़ती रहे। उनका यह कहना होता है कि जब उद्योगपतियों की जमातें 'मरीजों के लिए खतरा' की बात जब करती है तो उनकी असली चिन्ता 'मुनाफे के लिए खतरे' को लेकर होती है।


? सुभाष गाताड़े