संस्करण: 18 जुलाई- 2011

पृथक तेलंगाना राज्य: 

सारा खेल हैदराबाद को लेकर

? डॉ. महेश परिमल

               पृथक तेलंगाना के मुद्दे पर सरकार की बेरुखी समस्या को और अधिक विकराल बना रही है। सरकार का रवैया ऐसा ही रहा, तो संभव है कि राज्य में खूनी क्रांति शुरू हो जाए। तब सरकार को शायद होश आए। तब शायद सरकार इस धारणा से मुक्त हो पाएगी कि समस्याओं को इतना अधिक लटकाओ या टालो, जिससे उसका समाधान हो जाए। इसके पहले नरसिम्हा राव सरकार में भी ऐसा ही होता था। यह सरकार उससे दो कदम आगे चलकर समस्याओं को लटकाने में ही अपनी भलाई समझती है। पृथक तेलंगाना का मामला सरकार की इसी बेरुखी का नतीजा है। इसके पीछे हैदराबाद ही है, जो इस समय आईटी का प्रमुख केंद्र है।

 

               कई बार ऐसा होता है कि जिसे हम साधारण बीमारी समझते हैं, वह बाद में विकराल रूप धारण कर लेती है, ठीक यही स्थिति पृथक तेलंगाना राज्य को लेकर है। सरकार इसे अभी तक गंभीरता से नहीं ले रही है। इस मामले पर सरकार की नीति टालमटोल की रही है। इस नीति के कारण ही पृथक तेलंगाना राज्य के लिए दबाब बढ़ा है। तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेता के. चंद्रशेखर ने पृथक तेलंगाना राज्य के लिए वर्षों से आंदोलन चला रहे हैं।  पूर्व में जब इन्होंने आमरण अनशन शुरू किया था, तब सरकार की हालत की खराब हो गई थी। बड़ी मुश्किल से सरकार ने उनका उपवास तुड़वाया। इसके लिए सरकार ने उन्हें वचन दिया कि इस बारे में शीघ्र ही सर्वसम्मति से विचार किया जाएगा। पर सरकार अपना वचन भूल गई। जब आंधा्र प्रदेश जलने लगा, तब सरकार को अपनी भूल का अहसास हुआ। इस दौरान सरकार द्वारा श्री.ष्ण आयोग का गठन किया गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कई सुझाव दिए, पर सरकार ने पूरे 6माह तक उस पर कोई धयान नहीं दिया। वास्तव में आयोग की रिपोर्ट से सरकार उलझन में पड़ गई। इसी कारण पृथक तेलंगाना की समस्या और अधिक उलझ गई। श्री.ष्झज्ञ आयोग ने अपने सुझाव में सरदार वल्लभ भाई पटेल का उल्लेख करते हुए कहा है कि वास्तविकता की उपेक्षा करना मूर्खता है। यदि सच्चाई का सामना न किया जाए, तो उससे कटुता बढ़ती है। आयोग की इस चेतावनी की अवहेलना करते हुए सरकार कुछ करने के बजाए कुछ होने की प्रतीक्षा करने लगी। अपनी रिपोर्ट में जस्टिस श्री.ष्ण ने यह भी उल्लेख किया कि आंध्र प्रदेश को अखंडित रखना तमाम दलों की सर्वसम्मति से तेलंगाना के विकास के लिए एक स्वायत्ता काउंसिल की रचना की जाए। इस सुझाव पर सरकार यदि गंभीर होती, तो इस मामले पर सर्वदलीय बैठक का आयोजन करती, पर वह ऐसा कर नहीं पाई। पृथक तेलंगाना राज्य के मामले पर सरकार ने अपनी जवाबदारी से हाथ खड़े कर दिए। कुछ आरोप न लगे, इसलिए प्रदेश कांग्रेस कमेटी को तेलंगाना राष्ट्र समिति के साथ बातचीत की जवाबदारी सौंप दी। अब प्रदेश कांग्रेस भी क्या करे, पृथक तेलंगाना की माँग को जनता का इतना अधिक समर्थन प्राप्त है कि वह चाहकर भी कुछ अलग नहीं कर सकती, न ही किसी प्रकार की सौदेबाजी कर सकती है। वह तो यहाँ तक विवश है कि पृथक तेलंगाना के मामले पर अपने ही विधायकों को इस्तीफे से रोक नहीं सकती।

 

               आंध्रप्रदेश की सारी प्रजा पृथक तेलंगाना राज्य की माँग कर रही है, यह बात भी नहीं है। हकीकत में यह हैदराबाद को लेकर लड़ी जाने वाली लड़ाई है। यह शहर आज देश की आईटी राजधानी माना जाता है। अधिकांश हैदराबादी यही चाहते हैं कि अखंड आंध्रप्रदेश की स्थापना होनी चाहिए। पृथक तेलंगाना राज्य के समर्थकों की नजर हैदराबाद की आई टी इंडस्ट्राज और उससे होने वाली आय है। इस कमाई का उपयोग वे तेलंगाना के पिछड़े क्षेत्रों को समृध्द करने में करना चाहते हैं। दसूरी ओर आईटी उद्योग को इससे कोई मतलब नहीं है। वह तटस्थ रहना चाहता है। यह इस बात से ही स्पष्ट हो जाता है कि जब पृथक तेलंगाना राज्य के मुद्दे पर दो दिन के बंद का आह्वान किया गया, तब 90 प्रतिशत आईटी कंपनियाँ इसमें शामिल नहीं हुई। दो दिनों के बंद के दौरान इंफोसिस, जीई, महिंद्रा, सत्यम्, एडीपी और इंफोटेक जैसी कंपनियों का काम जारी था। उनके 99 प्रतिशत कर्मचारी काम पर उपस्थित थे। हैदराबाद की आईटी कंपनियों के कर्मचारियों ने इंफर्मेशन टेक्नालॉजी का इस्तेमाल करते हुए बंद से बचने के रास्ते खोज लिए थे। बड़ी आईटी कंपनियों द्वारा अपने कर्मचारियों को ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था कर दी थी। यानी पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद रहने के बाद भी उनके कर्मचारी काम पर हाजिर रहे। इसके पहले भी जब इस मामले पर बंद का आह्वान किया गया था, तब जो कुछ हुआ, उससे सबक लेकर पुलिस ने आईटी उद्योग के लिए अलग से व्यवस्था की। जब भी कंपनियों के किसी वाहन को भीड़ रोक लेती, तुरंत ही इसकी सूचना पुलिस को आज के आधुनिक माधयमों से मिल जाती, पुलिस के समय पर पहुँचने से किसी तरह का व्यवधान नहीं आता। आईटी कंपनियाँ राजनैतिक स्थिरता चाहती हैं, उन्हें स्थिरता नहीं मिली, तो वे सभी अन्य राज्यों में जाने की हिम्मत रखती हैं। इससे राज्य को जो झटका लगेगा, उससे शायद सरकार पूरी तरह से वाकिफ नहीं है। याद करें, जब संयुक्त मुंबई राज्य में से जब गुजरात और महाराष्ट्र अलग राज्य बनाए गए, तब मुंबई शहर को लेकर काफी तनातनी हुई थी। महाराष्ट्र के लोगों ने श्आमची मुंबईय को लेकर एक तरह से युध्द ही छेड़ दिया था। इस युध्द में 105 लोग शहीद हुए थे। उसके बाद मुंबई महाराष्ट्र की हो गई। तत्कालीन मुंबई राज्य के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई ने मुंबई को केंद्र शासित प्रदेश बनाने की दरख्वास्त कर उसे दोनों राज्यों की राजधानी बनाने का सुझाव दिया था। पर इस सुझाव को नहीं माना गया। इधर केंद्र सरकार भी कुछ इस तरह से सोच रही है कि हैदराबाद को दो राज्यों की राजधानी बना दिया जाए। केंद्र के इस विचार को पृथक तेलंगाना राज्य की माँग करने वाली तेलंगाना राष्ट्र समिति शायद ही स्वीकार करे। चाहे कुछ भी हो, तेलंगाना राज्य की मामला निपटाने के पहले हैदराबाद के बारे में सोचना होगा, तभी इस समस्या का समाधान हो पाएगा।

 

               अलग तेलंगाना राज्य के समर्थन में कांग्रेस के 45 विधायकों और 10 सांसदों ने अपने इस्तीफे देकर दबाव बनाया है। पर हैदराबाद के कांग्रेसी सांसदों ने अभी तक इस्तीफे नहीं दिए हैं। इससे उनके विचारों की कुछ तो भनक मिल ही जाती है। जाहिर है कि वे नहीं चाहते कि अलग राज्य बनने पर हैदराबाद को किसी तरह का नुकसान हो। यदि हैदराबाद को दस वर्ष के लिए दोनों राज्यों की राजधानी का रूप दिया जाए, तो समस्या का समाधान कुछ हद तक हो सकता है। इस दौरान हैदराबाद की आवक को दोनों राज्यों में समान रूप से बाँट दिया जाए। इस दौरान आंध्रप्रदेश की नई राजधानी तैयार कर ली जाए। इसके लिए सभी दलों को मनाना अनिवार्य है। जस तरह से पृथक तेलंगाना राज्य के समर्थन में इस्तीफे दिए गए हैं, उसी तरह विरोध में भी इस्तीफे दिए जा सकते हैं। ऐसे में आंध्र प्रदेश विधानसभा भंग कर वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। यदि आंध्र प्रदेश में किसी और का शासन होता, तो कब का वहाँ राष्ट्रपति शासन लग गया होता। यहाँ तो पूरी जद्दोजहद कांग्रेस सरकार को बचाने की है। इसलिए इस काम में लगातार विलंब होता जा रहा है। इसी विलंबनीति के चलते भविष्य में पृथक तेलंगाना राज्य की माँग पूरे देश की समस्या बन सकती है।


? डॉ. महेश परिमल