संस्करण: 18 जुलाई- 2011

सलवा जुडुम बना सब पर जुल्म

? एल.एस.हरदेनिया

               सलवा जुडुम संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के हालिया आदेश ने यह सिध्द कर दिया है कि आतंकवाद का मुकाबला प्रति-आतंकवाद या हिंसा का मुकाबला प्रतिहिंसा से नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में छत्तीसगढ़ सरकार से यह कहा है कि वह उसके द्वारा नियुक्त स्पेशल पुलिस आफिसर्स (एसपीओ) को दिए गए हथियार वापिस ले ले। सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ सरकार की निंदा करते हुए कहा है कि उसने लगभग अशिक्षित व अप्रशिक्षित व्यक्तियों को नक्सलियों से मुकाबला करने के लिए निुयक्त कर दिया है।

               सलवा जुडुम, गोंडी आदिवासी शब्द है जिसका अर्थ होता है सामूहिक शाँति मार्च। इसका प्रारंभ सन् 2005 में एक आंदोलन के रूप में हुआ था। उद्देश्य था नक्सलवादियों या माओवादियों से मुकाबला करने में आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना। इसका कार्यक्षेत्र बस्तर जिला था। बस्तर, अविभाजित मध्यप्रदेश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। बस्तर के गर्भ में अपार नैसर्गिक संपदा है। बस्तर में इतनी बड़ी मात्रा में लौह अयस्क उपलब्ध है, जिससे दर्जनों इस्पात कारखानों के लिए कच्चा माल उपलब्ध हो सकता है। बस्तर के आदिवासी, सदियों से शोषण के शिकार रहे हैं। अभी भी बस्तर में कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ के निवासी लगभग निर्वस्त्र रहते हैं। बस्तर की सीमा आंध्रप्रदेश और उड़ीसा से लगी हुई है। वैसे तो नक्सलवाद का जन्म पश्चिमी बंगाल में हुआ था परंतु थोड़े समय में ही बस्तर, नक्सलियों का प्रमुख कार्यक्षेत्र बन गया था। मूल रूप से जितने नक्सलवादी पैदा हुए वे आंध्र और बंगाल से आये। आंध्र के नक्सलवादियों के लिए बस्तर एक प्रमुख शरणस्थली बन गया था। बस्तर का क्षेत्रफल केरल के बराबर है। बस्तर में कभी भी सक्षम प्रशासन स्थापित नहीं हो पाया। उसके लिए भारी-भरकम बजट की आवश्यकता थी।

               सन् 2000 में मध्यप्रदेश का विभाजन हो गया और छत्तीसगढ़ एक पृथक राज्य बन गया। पृथक राज्य बनते छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या ने गंभीर रूप धारण कर लिया। प्रशासनिक सुविधा के उध्देश्य से बस्तर को 3 जिलों में विभाजित कर दिया गया। इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ा और नक्सलवाद की चुनौती बढ़ती गईं। जब यह महसूस हुआ कि केवल पुलिस और प्रशासन के भरोसे नक्सलियों का मुकालबला करना संभव नहीं होगा तब सलवा जुडुम की स्थापना की गई।  

               सन् 2005 में सलवा जुडुम की स्थापना के पूर्व कम्यूनिस्ट नेता और बाद में कांग्रेस विधायक महेन्द्र कर्मा ने सन् 1991 में ''जन जागरण अभियान'' प्रारंभ किया था। इस आंदोलन में मुख्य रूप से व्यापारी शामिल हुए थे। यह अभियान असफल हो गया और इसके नेताओं को अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस का सहारा लेना पड़ा। इसके बाद राज्य सरकार ने टाटा और एस्सार उद्योग घरानों से समझौता किया। इस समझौते के अन्तर्गत यह आश्वासन दिया गया कि बस्तर क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहतर की जायेगी जिससे औद्योगिक गतिविधियों निर्बाध रूप से चल सकें। आदिवासियों को विशेष पुलिस अधिकारी बनाने के अतिरिक्त, सलवा जुडुम के अन्तर्गत आदिवासियों को उनके गाँवों से हटाकर विशेष रूप से निर्मित कैम्पों में बसाया जाने लगा। धीरे-धीरे सलवा जुडुम भी हिंसक रूप लेने लगा। सलवा जुडुम के स्वयंसेवकों और स्थानीय लोगों के बीच झगड़े के मामले भी सामने आए। यह आरोपित है कि सलवा जुडुम ने 644 गाँवों को उजाड़ दिया जिससे इन गाँवों में बसने वाले तीन लाख से ज्यादा आदिवासियों को अपना घर छोड़ना पड़ा। शनै: शनै: नक्सलियों और सलवा जुडुम के कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष की घटनायें बढ़ती गईं। इस संघर्ष के कारण भी लगभग 1.50लाख आदिवासियों को अपना घर छोड़ना पड़ा। जब से सलवा जुडुम की स्थापना हुई है तब से नक्सलियों ने 800 लागों की हत्या की है, जिनमें लगभग 300 सुरक्षा कर्मी और 98 सलवा जुडुम के अन्तर्गत नियुक्त विशेष पुलिस अधिकारी  शामिल हैं। एक समय ऐसा आया जब नक्सली, सलवा जुडुम से जुड़े सुरक्षाकर्मियों को विशेष रूप से अपना निशाना बनाने लगे। भारी संख्या में सलवा जुडुम से जुडे आदिवासी कैम्पों में शरण लेने लगे। इन कैम्पों पर सलवा जुडुम का पूरी तरह से नियंत्रण था। कैम्पों के भीतर से तरह-तरह की घटनाओं की खबरें आने लगीं। कैम्पों में बलात्कार की घटनायें होने लगीं। इससे जलवा जुडुम के प्रभाव में कमी आई। बड़ी संख्या में आदिवासी कैम्पों को छोड़ने लगे। एक समय था जब कैम्पों में रहने वाले आदिवासियों की संख्या पचास हजार  थी जो दो वर्षों में घटकर 13 हजार रह गई।

               इस बीच सलवा जुडुम की गतिविधियों की चर्चा पूरे देश में होने लगी। मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले अनेक संगठनों ने सलवा जुडुम की गतिविधियों के विरूध्द आवाज उठाना शुरू किया । धीरे-धीरे यह बात साफ होती गई कि सलवा जुडुम आंदोलन ने स्थानीय आदिवासियों को नक्सलियों के विरूध्द एकजुट करने के स्थान पर उन्हें बुरी तरह से बांट दिया। आम आदिवासी पर दुहरी मार पड़ने लगी। एक तरफ उसे सलवा जुडुम और दूसरी ओर नक्सलियों की ज्यादतियों का सामना करना पड़ा। इससे पूरे बस्तर क्षेत्र में असंतोष भड़कने लगा। सलवा जुडुम के बारे में यह कहा गया कि उसमें बच्चों की नियुक्ति भी की जाने लगी है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, 12 हजार से ज्यादा बच्चों को सलवा जुडुम में नियुक्त किया गया। स्पष्ट रूप से ऐसा करना बाल संरक्षण कानून के विरूध्द है।

               वैसे बार-बार यह बताने का प्रयास किया जाता रहा है कि सलवा जुडुम एक स्वस्फूर्त आंदोलन है जिससे सरकार का कुछ लेना नहीं है पंरतु यह दावा खोखला है। सर्वोच्च न्यायालय ने अप्रैल 2008 में छत्तीसगढ़ सरकार को यह आदेश दिया था कि वह सलवा जुडुम को किसी भी प्रकार की सहायता देना बंद कर दे। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी राय प्रगट की कि कानून और व्यवस्था कायम रखने का उत्तरदायित्व साधारण नागरिक को नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि इस अधिकार को पाकर वह किसी की भी हत्या कर सकता है। इससे समाज में पूरी तरह अराजकता फैल सकती है।

               छत्तीसगढ़ सरकार सलवा जुडुम को समर्थन देने के आरोप को बेबुनियाद बताती रही है परंतु पहली बार दिसंबर 2008में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उसने यह स्वीकार किया कि सलवा जुडुम और सुरक्षा कर्मियों ने मिलकर अनेक लोगों के घरों को जलाया है और उनकी संपत्ति लूटी है। परंतु सरकार ने सलवा जुडुम के विशेष पुलिस अधिकारियों द्वारा किसी की हत्या किए जाने के आरोप गलत बताया। एक समय ऐसा आया जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने स्वीकार किया कि सलवा जुडुम आंदोलन अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल रहा है। इस स्वीकारोक्ति के बाद भी सलवा जुडुम के अन्तर्गत नियुक्त विशेष पुलिस अधिकारियों के पास अभी भी सरकारी हथियार हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 5 जुलाई के फैसले में स्पष्ट कहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार को इनसे हथियार वापिस ले लेने चाहिए।

               ऐसी खबर है कि इनसे हथियार वापिस लेना एक कठिन कार्य साबित होगा। विशेष पुलिस अधिकारियों की संख्या 5 हजार से ज्यादा है। इन सबको प्रारंभ में 1500 रू. प्रति माह मिलता था जो सन् 2008 में बढ़ाकर रूपये 1800 कर दिया गया था। इन अधिकारियों में, जो सभी आदिवासी है, पहले से ही असंतोष है क्योंकि उन्हें आश्वासन दिया गया था कि उन्हें कुछ समय के बाद पुलिस में भर्ती कर लिया जायेगा। चूंकि एक भी मामले में ऐसा नहीं किया गया इसलिए असंतोष स्वाभाविक है।

               यदि इनसे हथियार ले लिए जाते हैं और इन्हें पुलिस का सीधा संरक्षण प्राप्त नहीं रहता तो वे कभी भी नक्सलियों आक्रोश के शिकार हो सकते हैं। इस स्थिति से छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार कैसे निपटेगी, यह भविष्य ही बतायेगा। 


? एल.एस.हरदेनिया