संस्करण: 18फरवरी-2008

सुभाष बोस के विचारों के प्रचार के लिये महाअभियान
  एल.एस.हरदेनिया

 सुभाष चंद्र बोस के कृतित्व और व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं से आम लोगों को अवगत कराने के लिए एक राष्ट्रीय अभियान शीघ्र ही प्रारंभ होने वाला है। इस अभियान को सफल बनाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समिति का गठन किया जा चुका है। सुभाष चंद्र बोस के राजनीतिक जीवन में एक नया मोड़ लाने में मधयप्रदेश की एक विशिष्ट भूमिका रही है। मधयप्रदेश के एक प्रमुख शहर जबलपुर के पास स्थित एक स्थान पर 1939 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का एक महाधिवेशन हुआ था। इस अधिवेशन में संपन्न कार्यवाही ने बोस के जीवन की काया पलट कर दी थी। इस अधिवेशन के पूर्व तक वे काँग्रेस की विचारधारा व संगठन के अन्य हिस्से थे। परंतु त्रिपुरी कांग्रेस में उनके साथ जो व्यवहार किया गया उससे उन्होंने काँग्रेस का परंपरागत रास्ता छोड़ दिया।

1939 में कांग्रेस के अधयक्ष पद के चुनाव में सुभाष चंद्र बोस की भारी भरकम जीत हुई थी। सुभाष की उम्मीदवारी का विरोध स्वयं महात्मा गांधी ने किया था। गांधी जी के समर्थन से डॉ. पट्टाभि सीतारमैया ने सुभाष बोस के खिलाफ चुनाव लड़ा था। गांधी जी के समर्थन के बावज़ूद पट्टाभि सीतारमैया ने सुभाष बोस के खिलाफ चुनाव लड़ा था। गांधी जी के समर्थन के बावज़ूद पट्टाभि सीतारमैया की हार हुई थी। उस समय गांधी जी ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था ''डॉ. सीतारमैया की हार मेरी हार है।'' त्रिपुरी में संपन्न चुनाव के बारे में टिप्पणी करते हुए सुभाष चन्द्र बोस ने लिखा है ''मेरे और गांधीवादियों के बीच मतभेद काफ़ी बढ़ गए थे, भले ही आम लोगों को दिखाई न पड़ते हों। अत: जनवरी 1939 के कंग्रेस के अधयक्ष के चुनाव के समय गांधीवादियों ने और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मेरा डटकर विरोध किया। किन्तु मैं फिर भी काफ़ी अच्छे बहुमत से कांग्रेस अधयक्ष का चुनाव जीत गया। 1923-24 के बाद यह पहला अवसर था जब महात्मा गांधी ने सार्वजनिक रूप से मात खाई थी और अपने साप्ताहिक पत्र ''हरिजन'' में उन्होंने इसे अपनी हार स्वीकार किया। इस चुनाव में यह बात साफ़ हो गई कि महात्मा गांधी और पं. नेहरू दोनों के खुले विरोधा के बावज़ूद सारे देश में मुझको कितना व्यापक और प्रभावशाली समर्थन प्राप्त था।''

मार्च 1939 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ और मैंने उसका सभापतित्व किया तो यह स्पष्ट प्रस्ताव किया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को तुरंत ब्रिटिश सरकार को भारत को छह महीने के भीतर स्वतंत्रता दे देने का अल्टीमेटम दे देना चाहिए और साथ ही राष्ट्रीय संघर्ष की तैयारी करनी चाहिए। इस प्रस्ताव का गांधीवादियों ने और पं. नेहरु ने विरोधा किया और इसे अस्वीकार कर दिया। इस प्रकार एक ऐसी स्थिति आ गई कि यद्यपि मैं कांग्रेस का अधयक्ष था लेकिन मेरा नेतृत्व संगठन को मान्य नहीं हुआ। और बड़ी बात यह थी कि जहाँ तक हो सकता है हर मौके पर गांधीवादी गुट अधयक्ष का विरोधा करने से न चूकता, और मेरे लिए काम करना ही असंभव हो गया। परिणामस्वरूप कांग्रेस के भीतर पूर्णत: गतिरोध पैदा हो गया। अब इस गतिरोधा को दूर करने के दो ही उपाय थे-या तो गांधाीवादी अपनी इस अडंगेबाज़ी की नीति को छोड़ दें या अधयक्ष पूरी तरह गांधीवादियों के सामने आत्मसमर्पण कर दे। कोई समझौता हो जाए इसके लिए महात्मा गांधी और मेरी सीधी बातचीत हुई लेकिन वह बेकार रही।इसका कोई नतीजा नहीं निकला। कांग्रेस के विधाान के अनुसार अधयक्ष को आगामी साल के लिए कार्यकारिणी नियुक्त करने का अधिाकार होता है लेकिन यह स्पष्ट था कि गांधीवादियों की इच्छानुसार कार्यकारिणी नहीं बनाई गई तो वे बराबर अड़गेबाज़ी करते रहेंगे। और कांग्रेस के भीतर उनकी स्थिति ऐसी थी कि यदि वे रुकावटें डालने की ठान लेते तो वास्तव में अधयक्ष का स्वतंत्र रूप से काम करना असंभव था।

''महात्मा गांधी के साथ मेरी वार्ता हुई उससे यह स्पष्ट हो गया कि एक तरफ गांधीवादी लोग मेरे नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे और दूसरी तरफ मैं कठपुतली अधयक्ष बने रहने को तैयार नहीं था। अत: कांग्रेस के अधयक्ष पद से त्यागपत्र दे देने के सिवा मेरे पास कोई चारा नहीं था। 29 अप्रैल, 1939 को मैंने यही किया और फौरन ही एक अग्रगामी और प्रगतिशील पार्टी बनाई ताकि समूचे वामपक्ष को एक झंडे तले संगठित किया जा सके। इस पार्टी का नाम था फारवर्ड ब्लॉक। फारवर्ड ब्लॉक का पहला अधयक्ष मैं बना और उपाधयक्ष (अब कार्यकारी अधयक्ष) बने पंजाब के सरदार शार्दूल सिंह कवीशर।''

सुभाष चन्द्र बोस के अनुयायी की यह मान्यता है कि वर्तमान में उनकी विचारधारा की प्रासंगिकता पहिले से भी ज्यादा है। सुभाष बोस की समाजवाद व धार्मनिरपेक्षता में गहरी आस्था थी। वे भविष्य के भारत के सच्चे स्वप्न दृष्टा थे।  आज जब भारत और भारत के समान तीसरी दुनिया के अनेक देश भूमंडलीकरण की चपेट में है, जब भूमंडलीकरण और बाजारवाद के कारण ऐसी स्थितियां निर्मित हो गई हैं जब अमीर और अमीर और गरीब और गरीब हो रहे हैं उस समय देश को सही रास्ते पर लाने का एक मात्र उपाय समाजवाद को अपनाना है। इस संबंध में सुभाष चन्द्र बोस के विचार बिल्कुल स्पष्ट थे। स्वतंत्र भारत का आर्थिक नक्शा कैसा हो इसकी योजना बनाने के लिए कांग्रेस अधयक्ष की हैसियत से सुभाष बोस ने एक विशेष समिति गठित की थी। जवाहरलाल नेहरू को इस समिति का अधयक्ष बनाया गया था। भारत के ढांचे के बारे में चिन्तन करते हुए सुभाष चन्द्र बोस ने लिखा था : ''विचारणीय प्रश्न यह उठता है कि भारत में गांधीवाद का भविष्य क्या होगा ? कभी-कभी यह भी कहा जाता है कि गांधाीवाद कम्युनिज्म का विकल्प है, किन्तु यह विचार त्रुटिपूर्ण है। गांधीजी ने देश और संसार को अहिंसक असहयोग का नया तरीका अवश्य सिखाया है किन्तु वह कम्युनिज्म की तरह देश या मानवमात्र के समान समाज की पुर्नरचना का कोई कार्यक्रम पेश नहीं कर पाए हैं। कम्युनिज्म का विकल्प समाज की पुर्नरचना का कोई विकल्प ही हो सकता है।'' सुभाष के उग्र राजनीतिक विचार कांग्रेस के भीतर सक्रिय पूंजीपतियों, जमींदारों, सूदखोरों को अहितकर लगे क्योंकि आज़ादी को वे अपनी आर्थिक के लिए इस्तेमाल करने के छिपे मकसद से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए थे।

इस तरह यह स्पष्ट है कि सुभाष बोस आज़ाद भारत की आर्थिक नींव समाजवाद पर रखना चाहते थे। सुभाष बोस ने इस बात की भविष्यवाणी की थी कि आगे चलकर विश्व में अमरीका का एकछत्र प्रभाव कायम होगा। उन्होंने लगभग 1944 में विदेश से गांधीजी के नाम खुले पत्र में विस्तार से क्रमवार कहा कि ''भविष्य में ब्रिटेन अमरीका की छत्र छाया में आ जाएगा।'' नेताजी की भविष्यवाणी पूर्ण रुप से सही सिध्द हुई। अमरीका द्वितीय विश्वयुध्द की समाप्ति के बाद सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति बनकर उभरा।

सुभाष बोस की धार्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबध्दता सौ प्रतिशत थी। वे अल्पसंख्यकों के विकास को देश के विकास के लिए आवश्यक मानते थे। उनकी स्पष्ट राय थी कि अल्पसंख्यकों के विकास को दरकिनार कर हम कभी भी साम्प्रदायिक सद्भाव एवं सौहार्द को प्राप्त नहीं कर सकते

सुभाष चन्द्र बोस के इन विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए हरिपुरा से त्रिपुरी के लिए एक विशाल यात्रा का आयोजन किया जा रहा है। यह जत्था 10 मार्च को जबलपुर पहुंचेगा। इस यात्रा का नाम ''चेतना यात्रा'' रखा गया है। जबलपुर पहुंचने के बाद यह यात्रा उस स्थल पर पहुंचेगी जहां त्रिपुरी कांग्रेस हुई थी। उस स्थान पर विशाल सभा का आयोजन किया जाएगा। सभी तैयारियों का लेखा-जोखा लेने के लिए 10 फरवरी को जबलपुर में एक बैठक आयोजित की गई थी। बैठक पश्चिमी बंगाल के कृषि मंत्री निरेन डे की उपस्थिति में संपन्न हुई। बैठक में यह तय किया गया कि त्रिपुरी कांग्रेस के स्थान पर सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। 11 मार्च को जबलपुर में ही भूमंडलीकरण और साम्राज्यवाद के विरुध्द एक अन्तराष्ट्रीय सम्मेलन होगा जिसमें अनेक विदेशी प्रतिनिधि भी भाग लेंगे।

एल.एस.हरदेनिया