संस्करण: 18फरवरी-2008

महिलाओं के हक़ की आवाज़
   महेश बाग़ी

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं के हक़ में एक बेहद महत्वपूर्ण फ़ैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने एक प्रकरण में यह व्यवस्था दी है कि अगर कोई व्यक्ति एक पत्नी के होते दूसरी औरत को भी रख लेता है और लंबे समय तक उसके साथ रहता है तो ऐसी औरत को रखैल नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की पत्नी का दर्ज़ा दिया जाए। इतना ही नहीं, न्यायालय ने यह व्यवस्था भी दी है कि दूसरी पत्नी से जन्मीं संतान को भी नाजायज़ नहीं माना जाए यानी उसे भी उस व्यक्ति की संतान माना जाए। भारतीय समाज के कचराघर में पड़े दो असहाय प्राणियों के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय का यह फ़ैसला दूरगामी साबित होगा, जिससे समाज में अनैतिकता की भी रोकथाम होगी। इसलिए इस फ़ैसले का स्वागत किया जाना चाहिए।

इस तरह के सैकड़ों उदाहरण सामने आते हैं, जब व्यक्ति एक पत्नी के रहते दूसरी औरत को अलग घर देकर उसके साथ समय बिताने लगता है। उस व्यक्ति को पति या दोस्त मानकर चल रही औरत को बहुत समय बाद इस सच्चाई का सामना करना पड़ता है कि वास्तव में वह उस व्यक्ति की पत्नी नहीं, बल्कि रखैल है। जिस व्यक्ति में वह पति के दर्शन कर उसकी पूजा करती चली आती है, वही व्यक्ति उससे जायज़ हक़ छीन कर उसके सिर पर रखैल का लेबल चस्पा कर देता है। वह लाख कोशिश करती है कि उसे पत्नी का दर्ज़ा मिल जाए, लेकिन पति तो पति, समाज भी उस पर चस्पा रखैल के लेबल को हटाने में दिलचस्पी नहीं दिखाता है। वह औरत रखैल का कलंक झेल कर समाज में अपमानित जीवन जीने को अभिशप्त कर दी जाती है। इस तरह के अधिकांश मामलों में औरत ही धोखे की शिकार होती है, जबकि इसमें उसकी अपनी कोई ग़लती नहीं होती है। अगर वह औरत धाखेबाज़ व्यक्ति से किसी तरह पिंड छुड़ाकर कोई नया आसरा भी ढूंढ़ना चाहे, तब भी रखैल शब्द उसका पीछा नहीं छोड़ता है। नतीजतन वह उस सामाजिक सम्मान से वंचित रह जाती है, जिसकी वह वास्तविक हक़दार है।

दुर्भाग्य से अगर रखैल कही जाने वाली औरत किसी संतान को जन्म देती है तो उसे भी उसके अधिकार से बेदख़ल कर उसके सिर पर नाजायज़ शब्द मढ़ दिया जाता है। एक पुरुष द्वारा किसी औरत को धोखा देकर शारीरिक सम्बंध बनाने के परिणामस्वरूप उत्पन्न संतान का क्या दोष कि उसे नाजायज़ कहा जाए ? इस तरह के मामलों में बच्चे उस अपराधा की सज़ा भोगते हैं, जो उन्होंने किया ही नहीं और उन पर अवैध संतान का अभिशाप नत्थी कर दिया जाता हैं भारतीय दकियानूसी समाज यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि दो लोगों की परस्पर सहमति से जन्मी संतान नाजायज़ नहीं, बल्कि जायज़ है। सच पूछा जाए तो उसे भी वे सारे अधिकार मिलना चाहिए, जो वैध कही जाने वाली संतानों को प्राप्त है। जिस भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि जहाँ स्त्री का सम्मान होता है, वहाँ देवता वास करते हैं, उसी भारतीय समाज में दूसरी औरत और उसकी संतान के प्रति दोयम दर्जे का व्यवहार यह दर्शाता है कि भारतीय समाज अब भी पितृ-सत्ता की मानसिकता से ग्रस्त है और स्त्री अब भी भोग्या के रूप में ही मानी जाती है। कहने को आज की औरत ने बहुत प्रगति कर ली है और लगभग हर क्षेत्र में वह मर्दों के कंधो से कंधा मिला कर चल रही है। इसके बावज़ूद सच्चाई यह भी है कि औरत आज भी अठारहवीं सदी की मानसिकता में जी रही है। औरत भले ही 'हाउस वाइफ़' हो या कामकाजी, घर-बच्चों की सारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उसी पर थोपी जाती है। ऐसे में अगर कोई औरत दूसरी पत्नी बनी औरत को भी अब पत्नी और उसकी संतान को वैधा कहलाने का अधिकार है। उम्मीद की जाना चाहिए कि सर्वोच्च न्यायालय के इस साहसिक फ़ैसले के मद्देनज़र उन हज़ारों-लाखों महिलाओं को भी उनका वाजिब हक़ हासिल होगा। साथ ही महिला को धोखा देकर रखैल बनाने की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लग सकेगा। अब तक पुरुष इस मानसिकता में औरत पर अत्याचार करता आ रहा था कि दूसरी औरत उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती, लेकिन अब वह ऐसा करने से पहले दस बार सोचेगा। इस फ़ैसले का एक लाभ यह भी होगा कि समाज में अनैतिकता को बढ़ावा देने की कुत्सित प्रवृत्ति पर रोक लगेगी और औरत अपने हक़ को पाकर रहेगी। इसलिए इस फ़ैसले का दिल खोल कर स्वागत किया जाना चाहिए।

महेश बाग़ी