संस्करण: 18फरवरी-2008

महिला-शिक्षण संस्थाओं में पुरूषों की नियुक्ति क्यों ?
  (संदर्भ : पाटण महिला महाविद्यालय में शिक्षकों द्वारा यौन शोषण काण्ड)
   डॉ. गीता गुप्त

  ऐसे अनेक प्रकरण प्रकाश में आये हैं जिनमें गुरु-शिष्य सम्बन्धो के कलंकित होने की बात है। शिक्षा-जगत् में ऐसी घटनाएँ आम होती जा रही हैं। दो दशक पूर्व उत्तर-प्रदश में एक विश्वविद्यालय के प्राधयापक बिना विवाह किये एक प्राधयापिका के साथ रहने लगे थे। तब यह बहुत बड़ी घटना मानी गयी, जिसे दूर-दर्शन पर भी दिखाया गया था। लगभग उसी दौरान छत्तीसगढ़ के एक कॉलेज की प्राधयापिका ने अपने एक विद्यार्थी से विवाह किया, तब भी समाज में उसकी इतनी व्यापक प्रतिक्रिया हुई कि उच्च शिक्षा विभाग द्वारा उक्त प्राधयापिका को उस शहर से अन्यत्र स्थानान्तरित करने के लिए बाधय होना पड़ा। हाल के वर्षों में बिहार के विवाहित प्रोफ़ेसर मटुकनाथ और उनकी शोधछात्रा का खुल्लम-खुल्ला प्रेम-प्रसंग मीडिया और समाज में बहुत चर्चित हुआ। अनुचित, अवैध सम्बन्धों की एक दूषित परम्परा और शिक्षण-संस्थाओं में विकसित हो रही है, वह घोर चिन्ताजनक है। प्रतिदिन समाचार-पत्रों में कहीं-न-कहीं शिक्षकों द्वारा छात्राओं के यौन शोषण के समाचार सुर्ख़ियों में होते हैं। अब जनता ऐसी घटनाओं को मूक रहकर सहने की अभ्यस्त हो गयी है, वह कोई दमदार प्रतिक्रिया नहीं करती।

हाल ही में उत्तर गुजरात के पाटण शहर के सरकारी महिला प्राइमरी टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज के छ: शिक्षकों को एक दलित छात्रा के साथ दुष्कर्म के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। यह मामला छात्रा के गर्भवती होने पर प्रकाश में आया हैं छात्रा के कथनानुसार, कॉलेज की आन्तरिक मूल्यांकन की परीक्षाओं में अंक देने के बहाने छात्राओं का यौन शोषण किया जा रहा था। यह सिलसिला लगभग दो वर्ष से जारी था और छात्राओं द्वारा सुनियोजित ढंग से इस घटना का पर्दाफ़ाश किया गया। आरोपी शिक्षकों के कॉलेज आते ही छात्राओं ने उन्हें पीटना आरम्भ कर दिया। इसकी सूचना मिलते ही लोगों की भीड़ एकत्र हो गयी। स्थानीय लोगों ने कॉलेज में तोड़-फोड़ की। छात्र-संगठनों एवं राजनीतिक संगठनों ने शहर बन्द की घोषणा की।

यह काण्ड सचमुच भयावह है। बताया जाता है कि इसमें कॉलेज के शिक्षकों के साथ कर्मचारी भी शामिल थे। 31 दिसम्बर से 12 जनवरी तक पाटण तहसील के किंबुआ ग्राम में आयोजित इंटर्नशिप शिविर के दौरान छात्रा से किये जा रहे सामूहिक दुष्कर्म का अन्य भयभीत छात्राओं ने विरोधा नहीं किया। हैवानियत के बाद छात्रा को जबरन गर्भ निरोधाक गोलियाँ खिलायी गयीं और कड़ी ठण्ड में कमरे के बाहर धाकेल दिया गया। छात्राओं के अनुसार, शिक्षक बाक़ायदा पर्ची उछालकर दुष्कर्म हेतु अपनी बारी तय करते थे और उक्त छात्रा के साथ ग्यारह बार सामूहिक बलात्कार किया गया जिसकी एक शिक्षक ने अश्लील सीडी भी तैयार की है। यह सम्पूर्ण घटनाक्रम हिलाकर रख देने वाला है। पीड़ित छात्रा के पिता ने अपराधियों को फ़ाँसी की सज़ा देने की माँग की है।

इस प्रकरण में कॉलेज-प्रमुख ने संस्थान के निर्ज़न में होने का हवाला देते हुए कहा है कि-'यदि यह कॉलेज शहर के बीच होता तो इस तरह की घटना नहीं होती।' यह तर्क गले के नीचे इसलिए नहीं उतरता कि शिक्षक को तो छात्रा हर हाल में उपलब्धा होती कॉलेज निर्जन या भीड़भाड़ वाली जगह पर होने से कोई अन्तर नहीं पड़ता।

बहरहाल, इस काण्ड ने पूरे शिक्षक वर्ग को शर्मसार कर दिया है। यही नहीं, समाज और व्यवस्था के सामने कई ज्वलंत प्रश्न उभरकर सामने आये हैं जिनका तत्काल समाधान अनिवार्य है अन्यथा शिक्षण-संस्थानों में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहेगी। गम्भीरता से सोचें तो यह मात्र एक दलित छात्रा के यौन-उत्पीड़न का मामला नहीं है। यह एक महिला महाविद्यालय के पुरुष शिक्षकों द्वारा किये गये घोर निन्दनीय पाशविक कृत्य का ऐसा प्रकरण है, जिससे जुड़े तमाम बिन्दुओं पर गुजरात ही नहीं अपितु सम्पूर्ण प्रदेशों के शिक्षामंत्रियों, राजनेताओं और शिक्षाधिकारियों का धयान आकृष्ट होना चाहिए और ऐसी घटनाओं को रोकने हेतु तत्काल सख्त क़दम उठाया जाना चाहिए।

सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि यदि महिलाओं के लिए अलग शिक्षण/ प्रशिक्षण संस्थान निर्मित किये गये हैं तो इसका कोई तो औचित्य होगा ? फिर महिला शिक्षण संस्थानों में महिलाओं की बजाय पुरुष शिक्षकों की नियुक्ति क्यों कर दी जाती है ? क्या शिक्षिकाओं का अकाल है ?

यह सौ फ़ीसदी सच है कि आज इक्कीसवीं सदी में भी अधिकतर माता-पिता अपनी पुत्रियों को कन्या विद्यालयों/महाविद्यालयों में इसलिए प्रवेश दिलवाते हैं ताकि वे स्वयं निश्चिन्त रह सकें। वे सोचते हैं कि महिला-संस्थानों में सिर्फ़ महिलाएँ ही शिक्षिका होंगी और लड़कियों को अधययन के साथ-साथ अपने  व्यक्तित्व के विकास हेतु स्वतन्त्र किन्तु मर्यादित, स्वस्थ परिवेश सुलभ होगा। पहले, सचमुच ऐसा ही होता था किन्तु अब तो महिला-संस्थान नाम मात्र को रह गये हैं। गुजरात का तो पता नहीं लेकिन मधय-प्रदेश के कन्या विद्यालयों/महाविद्यालयों में पुरुष शिक्षकों की भरमार है।

राजधानी भोपाल के कन्या विद्यालयों/महाविद्यालयों में अनेक पुरुष अधयापक पदस्थ हैं। मधय-प्रदेश में भी महिला प्रशिक्षण संस्थान के एक अधयापक के विरुध्द यौन-उत्पीड़न का मामला प्रकाश में आया था, किन्तु दु:ख की बात यह है कि किसी भी राजनेता, शिक्षा-मंत्री या शिक्षाधिाकारी का धयान इस ओर नहीं जाता कि आख़िर महिला महाविद्यालयों में पुरुषों को पदस्थ करने का औचित्य क्या है ? एक महिला महाविद्यालय की प्राचार्या तो हमेशा इसी बात के लिए चिन्तित रहती थीं कि उनके यहाँ पदस्थ संस्कृत विषय के एकमात्र शिक्षक को छात्राओं को पढ़ाने के लिए कोई एकान्त कमरे की बजाय भीड़भाड़ वाले हिस्से में ही कक्ष आबंटित हो, ताकि कोई अप्रिय घटना न घटे।

विद्यालय से महाविद्यालय में पढ़ने आयी युवा होती किशोरियों का विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण स्वाभाविक माना जाता है। ऐसे में माता-पिता तो उन्हें कन्या महाविद्यालयों में प्रवेश दिलाकर निश्चिन्त हो जाते हैं परन्तु कन्या महाविद्यालय में प्रवेश के बावजूद जब छात्राओं का वास्ता शिक्षकों से पड़ता है, तो वे उनकी ओर सहज ही अधिक आकृष्ट होती हैं। वे शिक्षिकाओं की तुलना में शिक्षकों को अधिक महत्व देती हैं।

आजकल संविदा नियुक्ति की परम्परा के कारण भी अक्सर कमउम्र युवक महिला महाविद्यालयों में नियुक्ति पा लेते हैं। प्राय: छात्राएँ कहती पायी जाती हैं कि शोख़, चंचल स्वभाव की छात्राएँ शिक्षकों से घुल-मिलकर, उन्हें प्रभावित करके अधिक अंक पाने में सफल हो जाती हैं। प्रायोगिक विषयों में इस सम्भावना को नकारा भी नहीं जा सकता। यहाँ इस कथन का आशय यह है कि जब कन्याओं के लिए अलग शिक्षण/प्रशिक्षण संस्थान बनाये ही गये हैं तो उनमें शिक्षण हेतु पुरुषों की बजाय मात्र महिलाओं की नियुक्ति का प्रावधाान क्यों नहीं है ? किसी विषय-विशेष में यदि शिक्षिका सुलभ न हो, तब तो उस विषय के शिक्षण हेतु पुरुष की नियुक्ति की बात समझ में आती है। पर सामान्यत: ऐसा देखने में नहीं आता है।

यह भी सत्य है कि महिलाएँ अपने संस्थानों में पुरुषों की नियुक्ति से असहज अनुभव करती हैं और कई बार उनके द्वारा प्रताड़ित होते हुए भी मौन रहने के लिए बाधय होती हैं। यदि वे आवाज़ उठायें भी,तो कोई सुनवाई नहीं होती। राज्य और राष्ट्रीय महिला आयोग सिर्फ़ हाथी के दांत की तरह हैं क्योंकि उनके पास अपने निर्णयों को लागू करवाने का अधिाकार नहीं है। भोपाल के एक महाविद्यालय की प्राधयापिका ने अपने साथी प्राधयापक पर यौन-उत्पीड़न का आरोप लगाया था किन्तु मानवाधिकार आयोग द्वारा मामले की पुष्टि के बाद दण्ड निधर्रित किये जाने के बावज़ूद कुछ नहीं हो सका। महिला हिंसा क़ानून में भी अभी कई पेंच हैं।

यह सर्वविदित है कि पुरुष महिला की वरिष्ठता का सम्मान नहीं करते और महिला-संस्थान में पदस्थ होकर भी महिला को दबाने की भरसक चेष्टा करते हैं।ऐसे में अव्यक्त तनाव से घिरी महिलाएँ स्वतन्त्रता और सहजता का अनुभव नहीं कर पातीं। कभी-कभी तो छोटी-सी बात विकराल रूप धारण कर लेती है। उत्पीड़न मानसिक हो या शारीरिक-दोनों ही त्रासद हैं। दिनोंदिन प्रदूषित सामाजिक परिवेश में यदि शिक्षण-संस्थान भी शामिल हो गये तो लड़कियों का भविष्य क्या होगा ? वे आज भी कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं किन्तु कन्या विद्यालयों/महाविद्यालयों में शासन द्वारा कुछ कठोर नियम अपनाकर  उनके आत्मसम्मान की रक्षा सुनिश्चित की जा सकती है जैसे-

1. कन्या शिक्षण/प्रशिक्षण संस्थानों में सिर्फ़ शिक्षिकाओं की ही नियुक्ति हो। तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद  पर भी स्त्रियाँ ही नियुक्त की जाएँ।

2. महिला शिक्षण संस्थानों से तत्काल सभी पुरुषों को स्थानान्तरित किया जाए और भविष्य में वहाँ कोई भी पुरुष पदस्थ न हो सके, क़ानूनन ऐसा प्रावधान किया जाए।

3. एक शिकायत निवारण समिति हो-जिसके समक्ष छात्राएँ नि:संकोच अपनी समस्या व्यक्त करके समाधान पा सकें। एक शिकायत-पेटी भी रखी जाए जिसमें बिना नामोल्लेख के भी छात्राएँ अपनी शिकायत कर सकें।

4. शिकायत निवारण समिति में सिर्फ़ महिलाएँ हों। समिति कागज़ी न होकर यथार्थ में क्रियाशील हो। प्रत्येक शिकायत पर तत्काल कार्रवाई हो।

5. शिक्षक-अभिभावक-योजना लागू की जाये। इसमें प्रत्येक शिक्षिका कुछ छात्राओं की अभिभावक नियुक्त हो, जो व्यक्तिगत रूप से उन छात्राओं की कठिनाइयाँ जान सके और उनके निराकरण हेतु हरसम्भव प्रयास करे।

6. सभी छात्राओं के लिए गणवेश अनिवार्य हो। इससे उनमें एकता, समानता, अनुशासन, मर्यादा और एक विशिष्ट भाव-बोधा उत्पन्न होगा।

7. उच्च शिक्षा के पाठयक्रम में भी नैतिक शिक्षा का समावेश हो।

8. छात्राएँ अत्यधिक महत्वाकांक्षी न हों। उनका आचरण संयमित और वेशभूषा शालीन हो। इसके लिए माता-पिताओं को भी समय-समय पर शिक्षण संस्थाओं में जाकर जानकारी लेना अनिवार्य किया जाये।

राज्य-सरकारें यदि सचमुच महिलाओं की हितैषी हैं तो ऊपर सुझाये गये उपायों को उन्हें दृढ़तापूर्वक लागू करना चाहिए। साथ ही यौन-शोषण के अपराधियों को अंग-भंग या फाँसी जैसा कठोरतम दण्ड शीघ्र दिया जाना चाहिए ताकि दूसरों को नसीहत मिल सके।

एक बात और, छात्राओं को भी संयमित और शिष्ट होना चाहिए; उन्हें किसी भी प्रकार की उच्छृंखलता को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। पाटण में जो भी घटा, दो वर्ष तक छात्राएँ क्यों सहती रहीं ? उन्हें अपने माता-पिता को विश्वास में लेकर तत्काल क़दम नहीं उठाना चाहिए था ? क्या उनके लिए आत्मसम्मान से बढ़कर परीक्षा के अंक हो सकते हैं ? तमाम माता-पिताओं के लिए यह घटना एक चेतावनी है कि वे अपनी बेटियों से ऐसा बर्ताव करें कि वे उनसे कोई बात न छिपायें और सर्वथा मर्यादित व अनुशासित रहकर अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकें।

डॉ. गीता गुप्त