संस्करण: 18फरवरी-2008

 महाराष्ट्र में गैर मराठी लोगों पर हमले समय चयन के संकेत
   वीरेन्द्र जैन

 

महाराष्ट्र में राज ठाकरे के हथकण्डे पर प्रतिक्रिया देने में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के घोषित प्रत्याशी लालकृष्ण आडवाणी को एक सप्ताह से अधिक का समय लगा। ये वहीं आडवाणी हैं जिन्होंने गुजरात में हुये मुसलमानों के नरसंहार पर मोदी का बचाव करते हुये उसका औचित्य सिध्द करने के लिए कहा था कि गुजरात में हिंसा इसलिए हुयी क्योंकि गोधारा में साबरमती एक्सप्रैस की छह नम्बर बोगी में लगी आगजनी की तत्कालीन विपक्ष ने तुरंत निंदा नहीं की थी। क्या आडवाणीजी मुंबई से गैर मराठी लोगों के बहिष्कृत किये जाने के बयानों से असामाजिक तत्वों द्वारा की गयी हिंसा पर अपनी प्रतिक्रिया में हुयी देरी पर कुछ कहना चाहेंगे? पर वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि उनकी राजनीति वैसी साफसुथरी राजनीति नहीं है जिसमें आत्मलोचना करते हुये अपने निर्णयों की भूलों को स्वीकार कर क्षमा मांगी जाती है।

   राज ठाकरे के बयान का समय अनेक पेंच उत्पन्न करता है। उन्होंने जो कुछ भी कहा है वह ना तो उनकी नव निर्माण सेना की कोई नयी अनुभूति का परिणाम है और ना ही उनके शब्दों में ही कोई ऐसा नयापन है जो बाल ठाकरे द्वारा पैंतीस साल पहले छोड़े गये शगूफे से कुछ भिन्न हो जिसे वे मौका देखकर अनेक बार दुहरा कर अनेक लोगों को दुह चुके हैं। पर राज ठाकरे ने अपना बयान जिस समय दिया है वह पूरे देश में लोकसभा चुनावों की तैयारी प्रारम्भ होने का समय है। सबसे आगे रहने वाली चुनावी पार्टी भाजपा जो यूपीए सरकार के सत्ताग्रहण के साथ ही मघ्याविधि चुनाव का राग अलापने लगी थी, ने अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार भी तय कर दिया है और अपने बचे खुचे पिछलग्गुओं से उस पर सहमति की मुहर भी लगवा ली है। उसने चुनाव के लिए उन सीटों को चिन्हित भी कर लिया जिन पर कभी उनका उम्मीदवार जीत दर्ज करा चंका है (वैसे ये बात अलग है कि उन्हीं सारी ही सीटों पर वे कभी ना कभी हार भी चुके हैं।) वामपंथी गैर भाजपा गैर काँग्रेसवाद के नाम पर तीसरे मोर्चे के गठन का प्रस्ताव लाये हैं जिस पर समाजवादी पार्टी और तेलगूदेशम जैसी बड़ी पार्टियों ने काफी उत्साह दिखाया है। काँगेस ने अपने संगठन को चुस्त दुरस्त करने के लिए उसकी ओवरहालिंग की है और वे यूपीए के बैनर को चुनावी बैनर बनाने का प्रयास कर रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी की अधयक्ष मायावती उत्तरप्रदेश सरकार के खर्च पर देश भर के प्रदेशों की राजधानियों में  रैली कर रही हैं व अपना ही पैसा थैलियों के नाम पर लेकर उसे सफेद कर रही हैं व टिकिटों की एडवांस बुकिंग करने लगी हैं। रामविलास पासवान हमेशा की तरह अपनी डेढ ईंट की मस्जिद अलग बनाते हुये बसपा से टूटे हिस्सों को बटोर कर ठीक ठाक सौदे की जुगाड़ बैठा रहे हैं। राज ठाकरे ने यह गड़ा मुर्दा इसी समय इसलिए उखाड़ा है ताकि उनके ताउ और चचेरे भाई उध्दव उनसे पहले न उठा लें। पिछले दिनों शरद पवार ने बाल ठाकरे के घर पर जाकर उनसे डेढ घंटे मुलाकात की थी जो शुध्द राजनीतिक भैंट थी। बाल ठाकरे अपने मुहफट स्वभाव और दुस्साहसिक निर्णयों के लिए जाने जाते हैं और गत दिनों हुये राष्ट्रपति चुनाव में महाराष्ट्रवाद के नाम भाजपा उम्मीदवार का समर्थन करने से इंकार करके भाजपा को बता दिया था कि वे राजग के दूसरे दलों की तरह उनके अंधासमर्थक नहीं हैं तथा स्वतंत्र फैसले लेने में सक्षम हैं। सत्ता के लिए स्वाभिमान को गिरवी रख देने वाली भाजपा ने फिर भी उनसे रिश्ता नहीं तोड़ा और उनके सामने निचली पायदान पर बैठ कर भी उनसे फिर से समझौता कर लिया (भले ही उनका भरोसा नहीं करते हों।) उधर महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री देशमुख सरकार न केवल अपने सहयोगी शरद पवार की राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी से ही परेशान हो रही  है अपितु शिवसेना छोड़कर कॉग्रेस में सम्मिलित हो गये पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे भी उन्हें ऑंखें दिखा रहे हैं और प्रदेश में कभी भी ऊंट करवट ले सकता है।

राज ठाकरे जो बाला साहब ठाकरे के न केवल भतीजे हैं अपितु उनकी शिवसेना के प्रमुख सेनापति भी थे तथा इसी कारण अपने को उनका सच्चा राजनीतिक वारिस मानते रहे थे। किंतु बाला साहेब ने अपनी कमान अपने पुत्र उध्दव ठाकरे को सोंप कर उन्हें अलग संगठन बनाने को विवश कर दिया। इधार उनका यह अनुमान गलत साबित हुआ कि बाला साहब की फौज भी उन्हें सेनापति मानते हुये बाला साहेब के खिलाफ भी जा सकती है। परिणाम यह निकला कि वे किसी भी चुनाव में सफल नहीं हो सके भले ही उनके पास मुंबई के मुहल्लों मुहल्लों में बाहुबलियों के ठीक ठाक  गिरोह हों जो मौका आने पर तोड़फोड़ और लूटपाट कर सकते हों पर वे चुनाव नहीं जीता सकते। असल में यही वह स्थिति थी जब राज ठाकरे को अपनी उपलब्धा ताकत का प्रदर्शन करना था जो तोड़फोड़ करने का बहाना तलाशने वाले ऐसे ही कदम से संभव हो सकती है। उनके समय के चुनाव का पता इस बात से ही लगता है कि राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के गृह मंत्री ने औपचारिक कानूनी कार्यवाही को समुचित बिलंबित किया और मुख्यमंत्री ने अपने पुत्र के विवाह की तैयारियों पर धयान देना अधिक आवश्यक समझा।

     भले ही बेरोजगारी और मँहगाई से पीड़ित आमजन तात्कालिक उत्तेजना में आपस में टकरा कर अपने अधिकारों की लड़ाइयों को भटका लेते हों पर मुंबई दिल्ली कलकत्ता जैसे नगरों के जो गठन हैं वे ऐसे आंदोलनों को ज्यादा देर तक नहीं चला सकते। भाजपा जैसे दुहरे चरित्र वाले दलों और नेताओं का संकट यहीं से शुरू होता है जब बाला साहेब और उध्दव ठाकरे अपने मुद्दे का छिनने से बचाने के लिए मैदान में कूद पड़े हों। अगर भाजपा शिवसेना के इस कदम का विरोध करेगी तो उसे महाराष्ट्र में शिवसेना का साथ छोड़ना पड़ेगा और यदि वह उनका साथ देती है तो न केवल पूरे उत्तर भारत में उनकी खिलाफत हाने लगेगी अपितु उनके 'आसेतु हिमालय' वाले भूगोलीय राष्ट्रवाद पर प्रश्नचिन्ह लगेगा। पर इससे भी ज्यादा घातक प्रधनमंत्री प्रत्याशी चुन चुकी पार्टी के लिए उस विषय पर मौन रहना हो सकता था जो लगातार एक सप्ताह से सभी समाचार माधयमों  की प्रमुख खबर बना हुआ हो। यदि लालू यादव द्वारा व्यक्त की गयी आशंका के अनुसार बाकी देश में मराठियों के खिलाफ प्रतिक्रिया की गलत शुरूआत हो गयी तब तो भाजपा की नींव ही खिसक जायेगी।

वीरेन्द्र जैन