संस्करण: 18फरवरी-2008

 ब्राह्मण नेतृत्व बनाम हाथी को थामने की कवायद
    प्रमोद भार्गव

प्रदेश कांग्रेस में बहुप्रतीक्षित नेतृत्व परिवर्तन का पटाक्षेप केन्द्रीय कार्मिक राज्य मंत्री सुरेश पचौरी को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपे जाने के साथ हो गया। बहुआयामी इस निर्णय से जहां बसपा के हाथी को लगाम लगेगी, वहीं अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के नुमांइदों के सोच में सकारात्मक तब्दीली होने की उम्मीद है। कांग्रेसी मानसिकता के जो ब्राह्मण अर्से से पार्टी में ब्राह्मणों को नकारे जाने की प्रवृत्ति के चलते हाशिए पर थे, सुरेश पचौरी की तैनाती उनके लिए उम्मीद की किरण है, स्वाभाविक है बसपा की ओर रुख कर रहे मूल रूप से कांग्रेसी मानसिकता के ब्राह्मण उससे विमुख होंगे। हालांकि यह निर्णय युवा और ऊर्जावान नेतृत्व के सूत्रवाहक रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया की न तो मंशानुसार है और न ही उनकी इच्छाओं पर खरा उतरने वाला है। अलवत्ता इसी साल के अंत में होने वाले चुनावों के लिए 'प्रदेश चुनाव प्रचार अभियान समिति' का अध्यक्ष अजय ''राहुल'' सिंह को बनाकर केन्द्रीय नेतृत्व ने सिंधिया के संदर्भ में जले पर नमक छिड़कने जैसी कहावत को ही चरितार्थ किया है।

कांग्रेस का यह फैसला 'देर आए पर दुरुस्त आए' मुहावरे की तर्ज पर है। हालांकि गुटीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के चलते पिछले डेढ़ साल से निवर्तमान अध्यक्ष सुभाष यादव कमजोर नेतृत्व के बावजूद प्रदेश अध्यक्षी पर कुण्डली मारकर बैठे हुए थे। जबकि उन्हें अध्यक्ष की कमान हार के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं के टूटे मनोबल और संगठन में पैदा हुए बिखराव को एकजुट करने के नजरिए से किया गया था। लेकिन वे चार साल में अपन कार्यकारिणी तक की घोषणा नहीं कर पाए। बावजूद इसके अंतिम क्षणों तक भी  पद पर बने रहने के लिए जोर-आजमाइश में लगे रहे। ज्योतिरादित्य का संबल भी उन्होंने लिया और जब सिर से पानी गुजरने लगा तो अपने उत्तराधिकारी के नाते ज्योतिरादित्य का नाम भी अध्यक्ष पद के लिए उछाला। हालांकि उन्हें बढ़ती उम्र और गिरते स्वास्थ्य के चलते कांग्रेस हित में स्वयं इस्तीफा दे देने की पेशकस करनी थी। इससे उनकी गरिमा भी बनी रहती और अकुशल व दिशाहीन नेतृत्व की उलाहनाओं से भी वे बचे रहते। अब उनकी हेठी भी हुई और पद-लिप्सा भी उजागर हुई।

सुरेश पचौरी को बसपा की चुनौती से सामना करने से पहले कांग्रेस में ही विभिन्न क्षत्रपों की चुनौती से जूझना होगा। क्योंकि पिछले साल की शुरूआत में आक्रोश रैलियों के बहाने दिग्विजय और ज्योतिरादित्य जैसे क्षत्रपों के बीच वर्चस्व की जो जंग छिड़ी थी उस पर विराम सोनिया गांधी के हस्तक्षेप से ही संभव हो पाया था। गोया सुरेश पचौरी व राहुल सिंह की तैनाती की खुशी में पूर्व मंत्री व बाहुबली विधायक के.पी. सिंह की ओर से अखबारों में जो बधाई विज्ञापन छपे हैं उनमें भाजपा के कुशासन और सामंतवादी प्रवृत्तियों को नेस्तनाबूद करने का आह्वान किया गया है। मध्यप्रदेश की राजनीति में गाहे-बगाहे सामंती प्रवृत्तियों का वाहक महल को ही माना जाता है, इसलिए आक्रोश रैलियों के समय से ही दिग्विजय और केपी की जुगलबंदी ने सभाओं में एक ओर ज्योति बाबू को कांग्रेस के क्षत्रपों में परस्पर समन्वय बिठाने की नसीहत दे डाली थी, वहीं दूसरी ओर परोक्ष निशाना साधते हुए सामंती ताकतों के खिलाफ मोर्चा खोल देने की चेतावनी भी दी थी। इन रैलियों के बहाने अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हुए इनका कहना था कि ये रैलियां, कांग्रेस के वजूद-कायमी की दृष्टि से भागीरथी कोशिशें हैं।

दरअसल प्रदेश की राजनीति में सिंधिया के नेतृत्व में पलने वाली कांग्रेस का सामना हमेशा ही पहले अर्जुन सिंह और फिर दिग्विजय सिंह से होता रहा है। माधवराव सिंधिया ने कभी न तो पूरी तरह अर्जुन सिंह को स्वीकारा और न ही दिग्विजय को ? माधवराव अपने समय में श्यामाचरण शुक्ल और मोतीलाल बोरा को आगे कर नेतृत्व की लड़ाई लड़ते रहे। स्व. सिंधिया को शुक्ल और बोरा के साथ समन्वय बिठाने में कभी भी न तो मुश्किलें आईं और न ही अह्म टकराव के हालात निर्मित हुए, लेकिन अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह से संधिया को अपने नुमाइंदों की हैसियत बनाए रखने के लिए हमेशा ही संघर्ष करना पड़ा। कमोवेश यही स्थिति ज्योतिरादित्य के साथ है। एक तरह से यह परंपरा का विस्तार भी है। इसी कारण ज्योतिरादित्य, अर्जुन सिंह और दिग्विजय के नुमाइंदों से समन्वय नहीं बिठा पा रहे हैं। दरअसल ज्योतिरादित्य के समक्ष अपनी तरह की दिक्कतें हैं। यदि वे दिग्विजय सिंह से तालमेल बिठाकर चलते हैं तो उन्हें दिग्विजय समर्थकों को भी तरजीह देनी होगी,  यदि पर्याप्त तरजीह मिली तो ये सिंधिया के वर्चस्व को ही खतरा बन सकते हैं ? दूसरी तरफ ज्योतिरादित्य के साथ अपने पिता के वफादारों की लंबी फौज है। सिंधियानिष्ठ इस थाती को सब्जबाग दिखाकर संभाले रखना सिंधिया के लिए एक कठिन चुनौती है। जिससे सामना स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाए रखकर ही किया जा सकता है। सुरेश पचौरी भी बारास्ता अर्जुन-दिग्विजय और कमलनाथ प्रदेश अध्यक्षी पर आसीन हुए हैं इसलिए तकरार की परंपरा का विस्तार और प्रशस्त हो गया लगता है। लिहाजा पचौरी का सिंधिया से तालमेल बिठाकर चलना एक बड़ी चुनौती साबित होगा ? हालांकि कांग्रेस की गुटीय राजनीति में सुरेश पचौरी का गुट सबसे छोटा और अर्जुन-दिग्विजय का सबसे बड़ा गुट है। इसके बाद सिंधिया और कमलनाथ के गुट हैं। पार्टी के मंचों से गुटीय अन्तर्विरोधों को जितनी नकारने की कोशिश की जाती है वह उतनी ही साफगोई से बार-बार प्रकट होती है। शायद इसलिए सुरेश पचौरी को कांग्रेस के सभी गुटों को साथ लेकर चलने की हिदायत दी गई है।

यह चुनौती तो कांग्रेस के भीतर की बात हुई, कांग्रेस से बाहर सबसे बड़ी चुनौती है बहुजन समाज पार्टी, जिसका हाथी कांग्रेस के वजूद को रौंदता हुआ मत प्रतिशत में लगातार वृद्धि कर रहा है। ब्राह्मण, दलित और कुछ पिछड़ी जातियों की सोशल इंजीनियरिंग के चलते मायावती ने उत्तरप्रदेश में जो उपलब्धि हासिल की है उसका विस्तार वे मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और महाराष्ट्र में भी देखना चाहती हैं। इन सभी प्रदेशों में इसी साल के अंत में चुनाव होने हैं। सही मायनों में सुरेश पचौरी को ब्राह्मण मतदाताओं को कांग्रेस से जोड़े रखने की उम्मीद में ही अध्यक्ष पद से नवाजा गया है। क्योंकि कांग्रेस में क्षत्रीय वर्चस्व के चलते जो पिछड़े और दलित कांग्रेस की मुट्ठी से फिसल गए थे उनके ब्राह्मण नेता को कमान सौंपे जाने से लौट आने की उम्मीद है। लेकिन सुरेश पचौरी पर्याप्त समय न मिलने के कारण कितने सफल हो पाते हैं यह तो वक्त ही बता पाएगा। क्योंकि बीते चार साल के भीतर जो 13 उपचुनाव हुए हैं उनमें से केवल चार सीटें ही कांग्रेस भाजपा से छीन पाई है। इनमें से एक सीट खरगौन की लोकसभा सीट भी है जहां से सुभाष यादव के बेटे अरुण यादव ने जीत हासिल की। लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव में बहुमत में आने के लिए 13 में से 4 सीटें जीतना कांग्रेस की आदर्श स्थिति की स्थापना नहीं करती। कांग्रेस को जितना भी नुकसान हुआ है उसकी जड़ में बसपा की राजनीति है। यदि बसपा ने उत्तरप्रदेश का अनुकरण करते हुए ब्राह्मण उम्मीदवारों को ज्यादा संख्या में उतारा तो कांग्रेस को हानि होना तय है। इसलिए जरूरी है कि कांग्रेस दूरदृष्टि से काम लेते हुए कद्दावर ब्राह्मण नेताओं को अभी से चुनावी रणनीति में पर्याप्त महत्व दे। जिससे उनकी बसपा में जाने की उम्मीद ही खत्म हो जाए।

इसके अलावा कांग्रेस को आक्रामक तेवर अपनाते हुए शिवराज सरकार को पानी, सड़क और बिजली जैसे मुद्दों  पर तो निशाना बनाना ही होगा क्योंकि उन्हीं मुद्दों को मोहरा बनाकर उमा भारती ने दिग्विजय सिंह सरकार को चारों खाने चित्त किया था। कांग्रेस के पास एक नया मुद्दा भाजपा के मंत्रियों का खुला भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लचरता से उपजी  अराजकता भी है लेकिन सुरेश पचौरी कांग्रेस गुटों से समन्वय बिठाने के फेर में इन मुद्दों को कितना भुना पाते हैं इनके निष्कर्ष चुनाव के बाद निकलने वाले परिणाम से ही तय होंगे।

प्रमोद भार्गव