संस्करण: 18फरवरी-2008

अच्छी खबर-बुरी खबर 400 से 500 रुपए प्रति माह में जलता है गरीब का चूल्हा !
  अखिलेश सोलंकी

एक देश और उसके लोगों में क्या समानता हो सकती है जरा सोचिए ? बात को ज़रा और स्पष्ट करते हैं। दो को हम दो वर्गों में बाँट कर सकते हैं एक सम्पन्न राज्य तो दूसरा विकास की बाट जोहता गरीब राज्य। जैसा कि लोगों में होता है अमीर और गरीब आदमी। पिछले सप्ताह हमें दो खबरें पढ़ने को मिलीं एक अच्छी तो दूसरी बुरी। जहाँ तक अच्छी खबर की बात है तो वो हमें मिली अरूणाचल प्रदेश से जहाँ देश के सर्वेसर्वा डॉ. मनमोहन सिंह ने दौरा कर घोषणाओं का पिटारा खोला। तो इसके विपरीत हृदय को कष्ट पहुंचाने वाली ख़बर हमें मिली। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) से जिसने बताया कि कैसे अमीर और अमीर हो रहे है एवं गरीब और गरीब हो रहे हैं।

एक ओर जहां इंडिया के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 9.6 फीसद की दर से बढ़ने और चालू मूल्य पर प्रति व्यक्ति आय के 29642 रुपए रहने की बात कही जा रही है वहीं भारत के गांवों में 22 फीसदी लोग रोजाना महज 12 रुपए खर्च हैं और गांवों के 42 फीसद लोगों को बिजली भी मयस्सर नहीं है। यूं तो देश के गणतंत्र बनने के बाद लोगों ने खुशहाली और सामान हक का सपना देखा था, लेकिन वक्त गुज़रने के साथ ही यह व्यवस्था सत्ता और साधान दासी बनकर रह गई। इस व्यवस्था से आम लोग ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं।

बड़े-बड़े शहरों में सुविधाएँ और प्रति व्यक्ति आय बढ़ती जा रही हैं। शहर में धानाढय परिवार के लिए 10-20 खर्च करना कोई मायने नहीं रखता है। दूसरी और गरीबों को बुनियादी सुविधााएँ भी नहीं मिल रही हैं।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएसओ) की रपट के मुताबिक गांवों में 22 फीसदी लोगों को रोजाना खर्च 12 रुपए हैं तो 42 फीसदी लोगों को बिजली नसीब नहीं है। 74 फीसदी ग्रामीण अभी भी रसोई गैस के कनेक्शन का इंतजार कर रहे हैं।

इस रपट के मुताबिक कर्नाटक में गांवों में प्रति व्यक्ति मासिक आय 573 रुपए है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 1165 रुपए। मधयप्रदेश में गांव में प्रति व्यक्ति मासिक आय 487 रुपए और शहरी क्षेत्र में 982 रुपए है। झारखंड के गांवों में प्रति व्यक्ति मासिक आय 489 व शहरों में 1082 और बिहार के गांवों में प्रति व्यक्ति मासिक आय 465 जबकि, शहरी क्षेत्रों में 684 रुपए है।

देश की सकल घरेलू उत्पाद में 9.6 फीसदी की दर से विकास करने की बात कही जा रही है। वहीं आज हर पल किसानों के आत्महत्या की बात होती भी है तो जिक्र महाराष्ट्र के विदर्भ, आंध प्रदेश व कर्नाटक के कुछ इलाकों का ही नाम सामने आता हैं। जैसे मधयप्रदेश, पंजाब, छत्तीसगढ़, और पश्चिम बंगाल कोई किसान आत्महत्या करता ही न हो। एक ओर दलाल स्ट्रीट की रौनक बढ़ी है तो दूसरी ओर किसानों की बदहाली जारी है। मुल्क आगे बढ़ रहा है लेकिन विकास के नए डिज़ाइन में गरीब लोगों का स्थान नहीं दिखाई देता है।

राष्ट्रीय बजट में हमेशा ही ग्रामीण क्षेत्रों पर धयान देने की बात कही जाती है। लेकिन योजनाओं के निर्माण और इसे लागू करने की प्रक्रिया में खाई है।

रोजगार ग्रामीण कानून के तहत ही गुजरात और महाराष्ट्र जैसे सम्पन्न ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को जॉब कार्ड मुहैया कराने में काफी पीछे रहे हैं। एन.आर.ई.जी.ए. के तहत अक्टूबर 2007 के आंकड़ों में महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों में पंजीकृत लोगों में महज छह फीसद को रोज़गार दिए गए है जबकि गुजरात में 23 फीसद है। इसके अलावा पंजाब में इस योजना के 17 फीसद, कर्नाटक में 19 और बिहार में 47 फीसदी लोगों को जॉब कार्ड दिए गए है।

आज की चमकदार दुनिया में आराम और उपभोग के सामान न सिर्फ़ सेहत पर भारी पड़ रहे हैं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी संकट खड़ा कर रहे हैं। शहरों में बड़ी संख्या में इमारतों और मॉल का निर्माण हो रहा है। इन्हें वातानुकूलित बनाने को लेकर अन्य सुविधाओं से संपन्न किया जा रहा है जिसकी कीमत हमारी सेहत और पर्यावरण को चुकानी पड़ रही है। इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेंट चेंज (आई.पी.सी.सी.) की रपट के मुताबिक 1970 से 1990 के बीच कॉर्बन उत्सर्जन में ऐसे भवनों को योगदान 26 फीसद था जो आज बढ़कर 35 फीसदी हो गया है। जबकि सल्फर डाई ऑक्साईड उत्सर्जन में भवनों की हिस्सेदारी बढ़कर 49 फीसदी हो गई है।

अब लौटते हैं अच्छी खबर की तरफ, तीन बार अपनी अरूणाचल की यात्रा स्थगित करने के बाद प्रधानमंत्री पिछले दिनों इस सीमांत प्रदेश की यात्रा गए। उन्होंने वहाँ राज्य के ढांचागत विकास के लिए लगभग दस हजार करोड़ रुपए की घोषणा की।

प्रधानमंत्री ने राज्य को रेल, सड़क और हवाई संपर्क के ज़रिए शेष भारत से और अच्छी तरह से जोड़ने की कई नई परियोजनाएं घोषित की हैं। असम में हरमुठी से इटानगर तक रेल लाइन बिछाने का फैसला किया गया है। सीमांत क्षेत्रों को जोड़ने के लिए पूर्व में तवांग से लेकर पश्चिम में महादेव पुर तक दो लेन की 1840 किमी लंबी सड़क अगले चार सालों में तैयार कर ली जाएगी।

प्रधानमंत्री ने दिबांग नदी पर तीन हजार मेगावाट बिजली पैदा करने वाली विशाल बहुउद्देश्यीय परियोजना का शिलान्यास किया। पारे नदी पर एक और एक सौ दस मेगावाट पनबिजली परियोजना को हरि झंडी दिखाई। इसके अलावा भी प्रधानमंत्री जी ने अनेकों सौगातें दी है। काश वे पीड़ित राज्य की तरह गरीबों की सुधा लें।

अखिलेश सोलंकी