संस्करण: 18फरवरी-2008

 प्रशासन में राजनैतिक दखलंदाजी ! वरिष्ठ अफसरों का सेवा के प्रति मोहभंग
    राजेन्द्र जोशी

वे दिन शायद अब इतिहास बन गये हैं, जब शासकीय सेवाओं की समाज में बड़ा ही मान-सम्मान था। लोग सेवाभाव से शासन की नौकरियों से जुड़ते थे। अपने अपने क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त अधिकारी और कर्मचारी अपने ज्ञान और विवेक के आधार पर निर्भीक होकर निष्पक्षता के साथ अपनी डयूटी को अंज़ाम देने के लिए स्वतंत्र होते थे। साइंस, इंजीनियरिंग, चिकित्सा प्रबंधान, प्रशासन और एकाउंट जैसे विषयों में दक्षता प्राप्त अधिकारी शासन के विभिन्न विभागों में उत्साह और दिलचस्पी के साथ अपनी जिम्मेदारियों और् कत्तव्यों का निर्वहन करते थे। ऐसे प्रतिभावान सेवकों को शासन में अपना केरियर बेहतर बनाने के विशेष अवसर उपलब्ध थे। क्या वर्तमान में ऐसे प्रतिभावान  व्यक्तियों को शासन की सेवा में अपनी विशेषज्ञता प्रदर्शित कर केरियर बनाने में अवसर उपलब्ध हैं ? शायद नहीं।और यह सब इसलिए कि अब कोई भी वरिष्ठ पदों पर बैठा अधिकारी अपने आपको निष्पक्ष और निर्णय लेने में स्वतंत्र महसूस नहीं कर पा रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि अब अपने कत्तव्यों के निर्वहन के लिए उसे सत्ताधारी राजनैतिक दलों से डिक्टेशन मिलने लगे है।

राज संचालन की व्यवस्था में प्रशासनिक सेवाओं को उत्कृष्टता का दर्ज़ा है। अखिल भारतीय सेवाओं और राज्य की प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश पाने के लिए विद्यार्थी जीवन से ही युवा वर्ग परिश्रम और लगन के साथ आगे आता है। इसी तरह तकनीकी क्षेत्र की सेवाओं के लिए भी शासन के विभागों में मेरिट होल्डर्स अपने विषय की विशेषज्ञता के अनुसार नौकरी पाने के इच्छुक रहते हैं। योग्य, कुशल और कर्मठ लोग जब शासकीय सेवा में अपने ज्ञान और विवेक के अनुरूप सेवा देना चाहते हैं, तो उन पर कुछ ऐसे दबाव बनाये जाते हैं, जिससे उन्हें कुछ ऐसे कार्य करने को बाधय होना पड़ता हैं, जो नियमों और नीतियों के विपरीत होते हैं। राजनीति के आधार पर पहुंचे सत्ताधीशों को तो नीतियों और नियमों से क्रियान्वियत होने मामलों के निराकरण में इतनी रूचि नहीं होती, जितनी उन्हें अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के प्रति होती है। जो अधिकारी निष्पक्ष दबंग और अनुशासन का पालन करता है वह तो ऐसे राजनैतिक सत्ताधीशों से नहीं दब पाता किंतु जो अफसर सत्ताधीशों की हाँ में हाँ मिलाकर काम करने को ही अपना केरियर समझते हैं, वे उल्टे सीधो कामों को करते रहते हैं। परिणाम स्वरूप भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, भाई भतीजावाद जैसी बुराई पनपने लगती है। कुछ अधिकारी इस विचारधारा के भी होते हैं कि वे नियमों के अनुसार काम तो करना चाहते हैं किंतु अपना मन मसोसकर राजनैतिक दबावों को झेलकर नियम विरुध्द काम कर ही देते हैं। ऐसे अधिकारियों का मानना होता है कि राजनेताओं से उलझने से क्या फायदा।कब तक ये सत्ता में रहेंगे। ऐसे अधिकारी सत्ता के राजनैतिक परिवर्तन का इंतजार करने लगते हैं। कुल मिलाकर अब शासकीय सेवाओं में इतना अधिक कीचड़ मच चुका है कि कोई भी निष्ठावान, ईमानदार, परिश्रमी और कुशल अधिकारी को अपने केरियर बनाने के सपने पूरे करने में कोई आशा की झलक नहीं दिखाई दे पाती हैं। ऐसे में अधिाकारियों को शासकीय सेवाओं से मोहभंग खोता जा रहा है और अपने ऊपर आ रहे राजनैतिक दबावों से क्षुब्धा होकर वे बीच में से ही सेवाऐं छोड़ छोड़कर जा रहे हैं। ये अधिकारी अपना केरियर शासन के बजाय किसी अन्य निज़ी कंपनियों और संस्थानों में तलाश करते हैं।

इन दिनों बहुत ऐसे उदाहरण देखने को मिल रहा हैं कि भारतीय प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा और तकनीकी सेवाओं के कुशल योग्य और अनुभवी लोग शासकीय सेवा को तिलांजलि देते जा रहे हैं। सेवा में वेतन और अन्य सुविधाओं का तो महत्व होता ही है किंतु व्यक्ति को अपने कार्य संपादन में आनंद आना भी सेवा का एक महत्वपूर्ण पहलू है। आज शासकीय सेवाओं पर सत्ताधारियों का अंकुश और दबाव इतना बढ़ता जा रहा है कि नियमों और नीतियों पर चलने वाले अधिकारी फील्ड-पोस्टि।ग से कतराने लगे हैं। फील्ड में आज वे ही अधिकारी सफल हो पाते है जो राजनेताओं के इशारों पर ठुमके लगा सकते हों। अनेक अधिकारी ऐसे भी होते हैं जो सत्ताधारियों की राजनीति चमकाने के लिए छाती ठोंककर मैदान में उतरकर काम करते देखे जाते हैं। ऐसे अधिाकारी प्रशासन के दूध में राजनीति की शक्कर मिलाकर जनता को प्यालियों पर प्यालियां पिलाते जाते हैं और सत्ता के आगे अपनी उपयोगिता सिध्द करते रहते हैं।

वर्तमान में प्राय: अधिकतर सेवाऐं निज़ी क्षेत्रों के हाथों में चली गई हैं। उन्हें भी अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए दक्ष, अनुभवी और योग्य प्रशासनिक और तकनीकी विशेषज्ञों की आवश्यकता हो रही है। ऐसे में शासकीय सेवा के चरित्र में आये बदलाव के कारण अनेक वरिष्ठ अनुभवी और योग्य अफसर निजी कंपनियों और संस्थानों से जुड़ते चले जा रहे हैं। अनेक ऐसे उदाहरण है कि जिन प्रशासनिक अधिकारियों के बारे में आम जनता में ऐसी राय बन जाती है कि वे बहुत ही सेवाभावी और बेहतर अधिकारी है, उनमें से ही अधिकांश लोग शासन को अंतिम सलाम कर लेते हैं। निजी कंपनियों में वरिष्ठ अफसरों की रूचि बढ़ने के पीछे वेतन और सुविधाएँ तो हैं ही किंतु साथ ही उन्हें अपने काम के प्रदर्शन का उचित माहौल भी उपलब्ध रहता है। अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां, वित्तीय संस्थान, सेवाओं से जुड़े संस्थान और औद्योगिक घरानों में शासन की तुलना में एक स्वस्थ्य पर्यावरण् नज़र आने लगा है। कोई भी व्यक्ति अपनी अर्जित शिक्षा, ज्ञान, कौशल, और विशेषज्ञता के अनुसार अपना जीवन बनाना चाहता है। जबसे शासकीय सेवा में राजनैतिक दखलंदाजी का माहौल आया है तबसे वरिष्ठ सेवाओं से जुड़े अधिकारियों का सत्ताधारियों के बीच काम करने के प्रति मन फटता जा रहा है। अभी हाल ही में एक समाचार प्रकाशित हुआ है कि भारतीय सेवा के अनेक प्रशासनिक और पुलिस अफसर शासकीय सेवा से ऊबकर प्राइवेट कंपनियों में जाना चाह रहे हैं इसके लिए वे मेनेजमेंट, लेखा, विधि, या तकनीकी क्षेत्र के अनेक डिप्लोमा और डिग्रियों के लिए पढ़ाई करने लग गये हैं। सेवानिवृत्ति के बाद तो योग्य अफसरों का विभिन्न संस्थाओं में उपयोग होना अच्छी बात है। अब तो वर्तमान में उच्च पदों पर पदस्थ अधिकारियों का अपने-अपने पद छोड़कर भागने का सिलसिला देशभर में शुरू हो चुका है।

राजेन्द्र जोशी