संस्करण: 17 सितम्बर-2012

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नफरत की

राज-नीति...!

           बौध्दिक स्तर पर विमर्श से विमुख या पराजय बोध से निरंतर भयभीत लोग अमूमन आक्रामक होते हैं। यदि यह गुण ऐसे व्यक्ति में विकसित हो जाएं जिसके पास थोड़ी सी ताकत, जनसमर्थन भी है और गगनगामी महत्वाकांक्षा भी,तो कई मौकों पर व्यवस्था के लिए दुर्भाग्यशाली साबित होते हैं। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में देखें तो यह गुण हमारे कई राजनेताओं में प्रस्फुटित हुए हैं,और कई लोग तो परिपक्व भी हो चुके हैं।

? विवेकानंद


लोकतंत्र की गाड़ी को

अराजकता की ओर ले जाने का प्रयास

        जकल पता ही नहीं चल रहा है कि इस देश में कोई सरकार है भी या नहीं! जिसके मन में जो आ रहा है वह बिना सोचे समझे बोले चला जा रहा है और कुछ लोग तो कानून की परवाह किये बिना उस पर अमल भी करने लगे हैं। पहले कभी खालिस्तान आन्दोलन चलाने वालों ने ऐसा किया था किंतु वे इसे विद्रोह समझ कर ही कर रहे थे और उसका खतरा उठाने के लिए तैयार भी थे, और उठाया भी। तत्कालीन सरकार और प्रधानमंत्री ने एक सीमा तक ही इसे सहा था और फिर अपरेशन ब्लू स्टार किया गया था भले ही उसके लिए देश की लोकप्रिय प्रधानमंत्री को अपनी जान देनी पड़ी हो।   

? वीरेन्द्र जैन


ठाकरे परिवार की बिहारी पृष्ठभूमि

क्षेत्रीयतावाद की राजनीति की सीमाए

   बाल ठाकरे और उनका परिवार क्षेत्रीय राजनीति करने में देश के सभी क्षेत्रीय दलों और नेताओं को मात दे रहे थे। 1960 के दशक में क्षेत्रीय राजनीति के द्वारा ही बाल ठाकरे ने अपनी अलग पहचान बनाई थी। तब वे दक्षिण भारतीयों और गुजरातियों के खिलाफ आग उगला करते थे। इधर कुछ वर्षों से उनके बेटे और भतीजे उत्तर भारतीयों और खासकर बिहार के लोगों के खिलाफ आग उगल रहे थे। उनके खिलाफ आग उगलकर वे अपने मराठा मानूष की राजनीति को धार देने का काम कर रहे थे। उसमें वे सफल भी हो रहे थे। बाल ठाकरे बीच बीच में पाकिस्तान और मुसलमानों को भी अपने निषाने पर लेने लगे थे।

? उपेन्द्र प्रसाद


क्या हम धर्मनिरपेक्ष है?  

            यह ''धर्मनिरपेक्षता और भारतीय मुसलमान'' विषय पर एक निबंध है और मैं यह मानता हॅू कि वर्तमान में घटित घटनाओं ने इसे लिखना मेरे लिये बहुत मुश्किल कर दिया है। मैं अपनी बात प्रारंभ से ही कहता हूॅ।

               मैं जमशेदपुर मैं पैदा हुआ था जहाँ मैंने नगरीय क्षेत्रों में एक के बाद एक दंगे भड़कते हुये देखे। मुझे अपने स्कूल का वह दिन आज भी याद है जब मेरा सहपाठी ओबिदुल इस्लाम मुझसे अलविदा कहने आया था। उसने दु:खी होकर मुझसे कहा था कि उसका परिवार पाकिस्तान वापस लौट रहा है।  

? शिव विश्वनाथन


यह है 'जनकल्याणकारी'

शिवराज सरकार

         ध्यप्रदेश के 'यशस्वी' मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बधाई के पात्र हैं। और हों भी क्यों नहीं, क्योंकि उन्हें समाज के लगभग हर तबके की चिंता दिनरात खाए जा रही है। पता नहीं बेचारे इस चिंता में वे कितने समय की नींद ले पा रहे होंगे। हमारी शिवराज जी के प्रति पूरी सहानुभूति है। अब देखिए, उनके 'विलक्षण' दिमाग में एक खयाल आया कि इस प्रदेश की गरीब जनता (खासकर भाजपा से जुडे लोगों की भीड़) धर्म भीरू तो है ही। अपनी पार्टी के वेटिंग से बाहर हो चुके पीएम लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और उससे उपजी सहानुभूति लहर से राम मंदिर भले ही न बन पाया हो .....

 ?   महेश बाग़ी


अमन की नयी राह

                  स्लामाबाद की यात्रा पर गए भारत के विदेशमंत्री एस एम कृष्णा एवं पाकिस्तान की विदेश मंत्री हीना रब्बानी खार के बीच हाल में चली वार्ता, एक दूसरे मुल्क के निवासियों के आवागमन को सुगम बनाने के इरादे से वीसा नियमों पर किए गए हस्ताक्षर तथा व्यापार-निवेश को आसान बनाने के लिए उठे कदमों को लेकर एक विद्वान की टिप्पणी बहुत मौजूं जान पड़ती है कि 'बड़े बड़े से बड़े सफर की शुरूआत एक छोटे कदम से होती है और 'चिरवैरी' कहे जानेवाले मुल्कों ने यह कदम बढ़ाने का साहस किया है।'

? सुभाष गाताड़े


क्या अब विदेशी मीडिया हांकेगा देश को?

      क समय विदेशी मीडिया की ऑंख का तारा बने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लगता है अब उसकी ऑंखों में चुभने लगे हैं तभी तो घरेलू मोर्चे पर भ्रष्टाचार के आरोपों पर घिरी संप्रग सरकार और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की फजीहत करने में विदेशी मीडिया भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा है। अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने संप्रग सरकार पर तीखी टिप्पणी करने में सबको पीछे छोड़ दिया है। इस अखबार ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नाकामयाब और असहाय व्यक्तित्व वाला करार देने के साथ संप्रग को भ्रष्ट भी बता दिया है।

? सिध्दार्थ शंकर गौतम


कैग के घेरे में मध्यप्रदेश सरकार

      भारत सरकार के नियंत्रक एंव महालेखाकार (कैग) की रिपोर्ट पर दिल्ली में हंगामा करने वाली भारतीय जनता पार्टी यदि चाहे तो भोपाल में अपनी ही सरकार से जवाब तलब कर सकती है। कैग ने हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में भाजपा के नेतृत्व वाली मध्यप्रदेश सरकार के कामकाज पर सवाल उठाये है। इस रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि मधयप्रदेश सरकार विकास कार्यो के लिए केन्द्र सरकार द्वारा भेजी गई राशि को खर्च नही कर पा रही है। निर्धारित समय में राशि का पूर्ण उपयोग नहीं होने से विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार विकास कार्यो के लिए केन्द्र सरकार से मिलनेवाली राशि को खर्च करने में मध्यप्रदेश सरकार बहुत पीछे है। 

? अमिताभ पाण्डेय


सत्याग्रहियों के हौसले ने

सरकार को झुकाया

        र्मदा नदी में अपनी मांगों को लेकर पिछले 16 दिन से जल सत्याग्रह कर रहे सत्याग्रहियों के हौसले के आगे आखिरकार, मध्य प्रदेश सरकार को झुकना पड़ा है। सरकार ने आंदोलनकारियों की दो प्रमुख मांगों, बांध की ऊंचाई पूर्ववत यानी 189 मीटर करने और जमीन के बदले जमीन देने पर अपनी रजामंदी जतला दी है। साथ ही हालात का अध्ययन करने के लिए पांच सदस्यीय एक कमेटी भी बनाई है, जो विस्थापितों से बातकर तीन महीने में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी।

? जाहिद खान


चिकित्सक और चिकित्सा पध्दतियों का घालमेल

       ह अब एक सामान्य सी बात है कि चिकित्सा की किसी भी पध्दति में डिग्री लिया हुआ व्यक्ति बड़े आराम और अधिकार के साथ अंग्रेजी दवाओं की प्रैक्टिस करता है। अधिकांश मरीज यह जानते ही नहीं कि अंग्रेजी दवाओं से उनका इलाज करने वाला डॉक्टर ऐसा करने के लिए अधिकृत नहीं है। देश के प्रत्येक हिस्से में ऐसे हजारों डॉक्टर मेडिकल प्रैक्टिस करते मिल जायेंगे जिन्होंने पढ़ाई तो आयुर्वेद, होम्योपैथ या फिर यूनानी पध्दति में की है लेकिन मरीजों का इलाज वे इन दवाओं से न करके ऍग्रेजी दवाओं से ही करते हैं।

    

? सुनील अमर


खेती की आय में महिलाओं की हिस्सेदारी तय हो

        केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ घरेलू महिलाओं को अपने पतियों की तनख्वाह का हिस्सा दिलाना चाहती हैं।इसके लिए वो वाकयादा महिलाओं के खाते और पेनकार्ड तैयार करवाकर पतियों से तयशुदा राशि पत्नियों के बैंक खाते में जमा करना अनिवार्य करना चाहती हैं। अगर महिला एवं बाल विकास मंत्री द्वारा प्रस्तावित ये कानून अमल में आता हैं तो ये महिला सशक्तीकरण में क्रांतिकारी कदम सिद्व होगा।

? डॉ. सुनील शर्मा


भारतीय समाज में अभारतीय कानून क्यों \

       भारतीय समाज पश्चिम के प्रभाव से आक्रान्त है। मगर ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी सरकार और न्यायपालिका भी पश्चिम की जीवन शैली से पूर्णत: प्रभावित हैं। इसीलिए एक के बाद एक ऐसे कानून बनाये जा रहे हैं अथवा ऐसे निर्णय लिये जा रहे हैं जो कालान्तर में परिवार के स्वरूप को क्षतिग्रस्त कर दें तो आश्चर्य नहीं होगा। स्मरण रहे कि भारत में स्त्री ही परिवार की धुरी होती है। वह समाज की निर्मात्री है। वही समाज का पोषण एवं संवर्ध्दन करती है। फिर भी अपने पुरुषत्व के गर्व में पुरुष उसे बराबरी का दर्जा देने से कतराता है।

    

? डॉ. गीता गुप्त


  17 सितम्बर2012

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