संस्करण: 17 सितम्बर-2012

सत्याग्रहियों के हौसले ने

सरकार को झुकाया

? जाहिद खान

               र्मदा नदी में अपनी मांगों को लेकर पिछले 16 दिन से जल सत्याग्रह कर रहे सत्याग्रहियों के हौसले के आगे आखिरकार, मध्य प्रदेश सरकार को झुकना पड़ा है। सरकार ने आंदोलनकारियों की दो प्रमुख मांगों, बांध की ऊंचाई पूर्ववत यानी 189 मीटर करने और जमीन के बदले जमीन देने पर अपनी रजामंदी जतला दी है। साथ ही हालात का अध्ययन करने के लिए पांच सदस्यीय एक कमेटी भी बनाई है, जो विस्थापितों से बातकर तीन महीने में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी। गौरतलब है कि खंडवा जिले के घोघलगांव में नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता चितरूपा पालित की अगुआई में 51 ग्रामीण लगातार पानी में रहकर अपना विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी मांग थी कि ओंकारेश्वर बांध का जलस्तर 189 मीटर से ज्यादा ना बढ़ाया जाए। जलस्तर बढ़ाए जाने से पहले उचित पुनर्वास और विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन देने की मांग को पूरा किया जाए।

               जमीन के बदले जमीन दी जाए, बांध विस्थापितों की यह पुरानी मांग रही है। यह मांग कहीं से नाजायज भी नहीं। क्योंकि, जमीन ही किसान की आजीविका का प्रमुख स्त्रोत होती है। जमीन के ना होने से उसकी और परिवार की जिंदगी बेसहारा हो जायेगी। हमारी अदालतों ने भी विस्थापितों की इस वाजिब मांग का हमेशा समर्थन किया और समय-समय पर विस्थापितों के हक में फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट का स्पश्ट निर्देश है कि बांध का जल स्तर बढ़ाए जाने से 6 महीने पहले, प्रभावितों के पुनर्वास व जमीन के बदले जमीन देने की व्यवस्था की जाए। बावजूद इसके मुख्तलिफ सरकारें, अदालतों के आदेश-निर्देश की बराबर अवहेलना करती रही हैं। वह भी अवमानना की हद तक। मध्य प्रदेश में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना लंबे समय से हो रही है। जहां शिवराज सरकार ने ओंकारेश्वर और इंदिरा सागर बांध परियोजना मामले में अदालत के आदेशों को पूरी तरह ताक पर रख दिया है। इन दोनों परियोजनाओं के डूब से प्रभावित हजारों लोगों के पुनर्वास का काम किए बिना, सरकार ने इस मानसून में ओंकारेश्वर बांध को 193 मीटर ऊंचाई तक भरने का फैसला कर लिया। यह सोचे-विचारे बिना कि जलस्तर बढ़ने से डूब क्षेत्र में आ रहे, गांवों की क्या स्थिति होगी ?

                बहरहाल, जैसे ही ओंकारेश्वर बांध का जलस्तर 190.05 मीटर तक पहुंचा, खंडवा के घोघल गांव समेत 30 गांवों में इसका असर दिखाई देने लगा। बढ़ते पानी ने ना सिर्फ खेतों में खड़ी फसलों को तबाह कर दिया, बल्कि इन गांवों के डूबने का भी खतरा बना हुआ था। कमोबेश यही हालात इंदिरा सागर बांध के जलस्तर बढ़ने से हैं। हरदा जिले के भैसवाड़ा, काजीसराय, खरदना समेत 19 गांव आहिस्ता-आहिस्ता चारों ओर पानी से घिरते जा रहे थे। यदि समय रहते, सरकार कोई फैसला नहीं लेती, तो ये गांव हमेशा के लिए डूब जाते। ग्राम खरदना में आंदोलन कर रहे सत्याग्रहियों की मांग थी कि इंदिरा सागर बांध का जलस्तर घटाकर 200 मीटर कर दिया जाए। जिससे उनके गांव और जमीनें बची रहें। सरकार यदि उनकी मांग ना माने, तो कम से कम उन्हें जमीन के बदले जमीन और उनका पुनर्वास तो करे।

               ओंकारेश्वर और इंदिरा सागर बांध परियोजना से हुए विस्थापित, पुनर्वास संबंधी अपने हक और उचित मुआवजे के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं। पुनर्वास व मुआवजे से इतर विस्थापितों की हमेशा से यह मांग रही है कि उन्हें जमीन के बदले जमीन दी जाए। यह जमीन सिंचित हो और कम से कम इतनी हो कि उनके परिवार का गुजारा अच्छी तरह से हो सके। विस्थापितों की मांग कहीं से भी ऐसी नहीं कि जिसका पालन राज्य सरकार और परियोजनाकर्ता कंपनी एनएचडीसी यानी नर्मदा हाइड्रो डेव्हलेपमेंट कार्पोरेशन ना कर सके। उनकी मांग हर लिहाज से नीति और न्याय के दायरे में है। बावजूद इसके षिवराज सरकार ने आधे-अधूरे पुनर्वास और मुट्ठी भर मुआवजा बांटकर अपनेर् कत्ताव्यों से इति श्री कर ली। विस्थापितों को अपने हाल पर छोड़ दिया। आलम यह है कि नर्मदा घाटी की तीनों परियोजनओं के डूब से प्रभावित हजारों लोगों के पुनर्वास का काम अभी तक अधूरा पड़ा है। जिसकी वजह से विस्थापित दर-दर भटकने को मजबूर हैं। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश-निर्देशन मिलने के बावजूद शासन और एनएचडीसी ने प्रभावितों की मांगों पर कोई सकारात्मक कार्यवाही नहीं की है। विस्थापित जब  सब तरफ से हार गए, तब उन्होंने आखिर में जल सत्याग्रह का सहारा लिया।

               नर्मदा घाटी की इन तीनों परियोजनओं के बारे में शिवराज सरकार और एनएचडीसी के बड़े-बड़े दावे हैं। मसलन इन योजनाओं के पूरा होने पर राज्य में कई मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। लेकिन इन दावों में कितनी सच्चाई है, यह एक छोटी सी मिसाल से जाना जा सकता है। ओंकारेश्वर परियोजना के बारे में सरकार और एनएचडीसी ने साल 2007 में सुप्रीम कोर्ट को बतलाया था कि इस बांध में 189 मीटर तक पानी भरते ही 65 मेगावाट बिजली बनने लगेगी। लेकिन इस निशान पर पानी भरने के बाद भी एक यूनिट बिजली नहीं बनी। जाहिर है, बिजली उत्पादन को लेकर अदालत में बार-बार झूठ बोला गया। सरकार एक और दावा करती है कि इन तीनों परियोजनाओं के डूब से प्रभावित 65,864 परिवारों के पुनर्वास का काम पूरा किया जा चुका है और विस्थापितों को मुआवजा बांट दिया गया है। पर हकीकत कुछ और ही है, जो कि अब धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने आ रही है।

               बहुमुखीय विकास में बांधों के योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता। बिजली उत्पादन और सिंचाई का रकबा बढ़ाए जाने की दृष्टि से बांधा हमारे लिए बेहद उपयोगी हैं। लेकिन बांधा परियोजनाओं के आकार लेने से पहले, इन परियोजनाओं के चलते डूब से प्रभावित विस्थापितों के प्रति संवेदनापूर्ण कार्यवाही भी सरकार की जिम्मेदारियों में षामिल है। पुनर्वास नीति-नियम व अदालती फैसलों के मुताबिक हर परिवार को सभी भौतिक व आर्थिक फायदे मिलें, इसकी सुनिश्चितता सरकार को करना चाहिए। विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन देने में शिवराज सरकार हमेशा से असमर्थता जताती रही है। उसकी दलील है कि इतनी अधिक जमीन उपलब्ध कराना, खासा मुश्किलभरा काम है। व्यावहारिक रूप से इसको अमल में लाना कठिनाईयों भरा है। एक तरफ सरकार किसानों को जमीन के बदले जमीन देने में आनाकानी कर रही है, तो दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के अंदर ही बीते कुछ सालों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विषेश आर्थिक क्षेत्र यानी सेज के लिए लाखों एकड़ उपजाऊ और गैर उपजाऊ जमीन बड़े पूंजीपतियों के हाथों में सौंप दी। इस मामले में शिवराज सरकार का दोगला रवैया साफ-साफ दिखलाई देता है। जो बांध विस्थापितों के लिए कुछ और, तो पूंजीपतियों के लिए कुछ और है।

              अंत में एक बात और। अपने जायज हक के लिए संघर्ष कर रहे, विस्थापितों के आंदोलन को जिस तरह हमेशा सोचे-समझे तरीके से विकास विरोधी बतलाकर दबाया जाता है, वह सरकार में निर्लज्जता की निशानी है। जो अवाम की जानिब अपना फर्ज पूरा करना तो दूर, अपनी नाकामियां छिपाने के लिए आंदोलन को बदनाम करने से भी बाज नहीं आतीं। आंदोलन को उखाड़ने के लिए, वह साजिश रचती हैं। जबकि घोघलगांव के सत्याग्रहियों की जो भी मांगे थीं, वे न्याय और नीति के दायरे में हैं। यही वजह है कि उनकी मांगों को देश में भारी जनसमर्थन मिला और सरकार को अंतत: झुकना पड़ा। सत्ता के दंभ की हार हुई और सत्याग्रहियों के नैतिक साहस की जीत।     


? जाहिद खान