संस्करण: 17 सितम्बर-2012

कैग के घेरे में मध्यप्रदेश सरकार

?  अमिताभ पाण्डेय

               भारत सरकार के नियंत्रक एंव महालेखाकार (कैग) की रिपोर्ट पर दिल्ली में हंगामा करने वाली भारतीय जनता पार्टी यदि चाहे तो भोपाल में अपनी ही सरकार से जवाब तलब कर सकती है। कैग ने हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में भाजपा के नेतृत्व वाली मध्यप्रदेश सरकार के कामकाज पर सवाल उठाये है। इस रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि मधयप्रदेश सरकार विकास कार्यो के लिए केन्द्र सरकार द्वारा भेजी गई राशि को खर्च नही कर पा रही है। निर्धारित समय में राशि का पूर्ण उपयोग नहीं होने से विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार विकास कार्यो के लिए केन्द्र सरकार से मिलनेवाली राशि को खर्च करने में मध्यप्रदेश सरकार बहुत पीछे है। इस मामले में उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात की सरकार मध्यप्रदेश से आगे है।

               यहां यह बताना जरूरी होगा कि कैग ने विगत 5 सितम्बर 2012 को दिल्ली में एक सेमिनार का आयोजन किया था। सेमिनार में कैग ने भारत के 32 राज्यों के 67 बडें शहरों में केन्द्र सरकार की जे एन यू आर एम  नामक महात्वाकांक्षी योजना के तहत चलाये जा रहे विकास कार्यो का रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत किया। इसमें गहन अध्ययन के आधार पर  67 महानगरों में चलाये जा रहे कार्यो की आंकडों के आधार पर बिन्दुवार समीक्षा की गई। इस रिपोर्ट कार्ड के अनुसार वर्ष 2006 से जे एन यू आर एम योजना मध्यप्रदेश के चार महानगरों जबलपुर, इन्दौर, उज्जैन, भोपाल में भी प्रभावशील हो गई। इस योजना को लागू हुए 6 वर्ष से अधिक समय बीत जाने पर भी 8 में से केवल 4 रिफार्म पर अब तक काम शुरू हो सका है जबकि शेष 4 पर काम शुरू नहीं हो पाया है। इस योजना के अन्तर्गत मध्यप्रदेश के चार महानगरों में 8 हजार करोड रूपये से अधिक के कार्य चलाये जा रहे हैं लेकिन तय समय अवधि के अनुसार भोपाल, इन्दौर, उज्जैन, जबलपुर में योजना के काम पूरे नहीं हो सके है।

               जे एन यू आर एम से सम्बन्धित कैग की रिपोर्ट में बताया गया कि शहरी गरीबों को सुविधाएं उपलब्ध करवाने के मामले में मध्यप्रदेश के चार महानगरों भोपाल, इन्दौर, उज्जैन, जबलपुर में अपेक्षा के अनुसार काम नहीं हो सका है। इसी प्रकार पेयजल सप्लाई की वसूली भी  23 प्रतिशत से आगे नहीं बढ पाई, सम्पत्ति कर की वसूली का आंकडा भी संतोषप्रद नहीं है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में भी मध्यप्रदेश सरकार ने अब तक लक्ष्य के अनुसार काम नहीं किया है। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश मे ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर किये जा रहे कार्यो की स्थिती संतोषप्रद नहीं है। हाल ही में भोपाल में नगरीय प्रशासन एंव विकास विभाग द्वारा आयोजित संगोष्ठी में यह तथ्य सामने आया कि प्रदेश के लगभग सभी शहरों में अपशिष्ट के सुरक्षित निपटारे की कोई वैज्ञानिक व्यवस्था नहीं है। मध्यप्रदेश में केवल चार प्रतिशत शहरी कचरे का निपटारा ही वैज्ञानिक तरीके से हो रहा है। इस संगोष्ठी में मध्यप्रदेश के नगरीय प्रशासन एंव विकास विभाग के राज्यमंत्री मनोहर ऊंटवाल ने बताया कि प्रदेश के शहरों से प्रतिदिन  6 हजार टन ठोस अपशिष्ट और 1200 एम एल डी दूषित जल निकलता है। भोपाल में 450 टन ठोस अपशिष्ट प्रतिदिन निकलता है। यह अपशिष्ट शहरों की स्वच्छता और जलस्त्रोतों को दूषित कर रहा है। इससे सतही और भूजल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। यह बीमारियों को फैलाता है। इस संगोष्ठी में नगरीय प्रशासन एंव विकास विभाग के प्रमुख सचिव एस पी एस परिहार ने कहा कि प्रदेश की 80 प्रतिशत आबादी खुले में शौच करती है। राज्य सरकार के प्रमुख सचिव की यह जानकारी चौंका देने वाली हैं। इसका कारण यह है कि केन्द्र सरकार शहरी एंव ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता बनाये रखने एंव खुले में शौच की प्रवृति को रोकने के लिए प्रतिवर्ष मध्यप्रदेश सरकार को बडी रकम दे रही है। इस रकम को समग्र स्वच्छता अभियान के माध्यम से व्यय करना बताया जा रहा है। इस अभियान पर अभी तक राज्य में बडी रकम खर्च की जा चुकी है। इसके बावजूद यदि प्रदेश की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी खुले में शौच करती है तो समग्र स्वच्छता अभियान के नाम पर व्यय की गई राशि का उपयोग कब, कहॉ, कैसे हुआ? इसकी उच्च स्तरीय जॉच की जाना चाहियें। राज्य के प्रमुख विपक्षी दल कॉग्रेस से जुडे नेताओं का आरोप है कि समग्र स्वच्छता अभियान के नाम पर भारी गडबडी और भ्रष्टाचार किया गया है। इस अभियान को लेकर विपक्षी ही नहीं सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी के कुछ विधायकों ने भी राज्य विधानसभा में सवाल उठायें है।

                प्रसगंवश उल्लेखनीय है कि मधयप्रदेश में जे एन यू आर एम योजना अन्तर्गत चलाये जा रहे विकास कार्यो में अनियमितता,भ्रष्टाचार की शिकायतें भी देखने, सुनने को मिली हैं। शहरी गरीबों के लिए इस योजना के तहत भोपाल में जो आवास बनाये गये उनके निर्माण में घटिया सामग्री का उपयोग किया गया। ऐसे अनेक आवास पहली बारिश में ही बुरे हाल में दिखाई दे रहे है। इसी प्रकार के मामले इन्दौर, उज्जैन, जबलपुर मे बनाये गये आवासों में भी देखे जा सकते है। यहॉ यह बताना प्रासंगिक होगा कि केन्द्र सरकार द्वारा स्वीकृत राशि के माधयम से मधयप्रदेश में चलाई जा रहीं विभिन्न योजनाओं की निगरानी के लिए कॉग्रेस हाईकमान के निर्द्रैश अनुसार मधयप्रदेश कॉग्रेस कमेटी के अधयक्ष के प्रदेश के सभी जिलों में निगरानी समितियॉ गठित कर अनेक पदाधिकारियों को नियुक्त किये जाने की घोषणा की थी। ये निगरानी समितियॉ और इनके पदाधिकारी केन्द्रीय निधि से प्रदेश में चलाये जा रहे विकास कार्यो की निगरानी को लेकर गंभीर नहीं हैं। ऐसा लगता है कि इनकी रूचि केवल पार्टी में पद लेने में ही अधिक है। जे एन यू आर एम ही नहीं बल्कि महात्मा गॉधी राष्टीय रोजगार गांरटी योजना सहित अनेक केन्दीय योजनाओं में अनियमितताओं के अनेक उदाहरण लगातार देखने सुनने को मिल रहे है। अनियमितताएं करने वालों में छोटे मोटे अधिकारी कर्मचारी ही नहीं बल्कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के आधा दर्जन से अधिक अधिकारी भी जॉच के घेरे में है। यदि कॉग्रेस के पदाधिकारी केन्द्रीय योजनाओं में राज्य सरकार द्वारा खर्च किये गये धन की गहराई से जॉच पडताल करें तो चौकाने वाले परिणाम सामने आ सकते है। कॉग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह तो पहले भी कई बार सप्रमाण यह कह चुके हैं कि मधयप्रदेश में केन्द्र से भेजी गई राशि का सही उपयोग नहीं हो रहा है। अब अनियमितताओं को उजागर करने की जिम्मेदारी कॉग्रेस पदाधिकारियों, कार्यकताओं की है।


? अमिताभ पाण्डेय

(लेखक सामाजिक मुद्दों के स्वतंत्र पत्रकार है। )