संस्करण: 17 सितम्बर-2012

अमन की नयी राह

? सुभाष गाताड़े

               स्लामाबाद की यात्रा पर गए भारत के विदेशमंत्री एस एम कृष्णा एवं पाकिस्तान की विदेष मंत्री हीना रब्बानी खार के बीच हाल में चली वार्ता, एक दूसरे मुल्क के निवासियों के आवागमन को सुगम बनाने के इरादे से वीसा नियमों पर किए गए हस्ताक्षर तथा व्यापार-निवेश को आसान बनाने के लिए उठे कदमों को लेकर एक विद्वान की टिप्पणी बहुत मौजूं जान पड़ती है कि 'बड़े बड़े से बड़े सफर की शुरूआत एक छोटे कदम से होती है और 'चिरवैरी' कहे जानेवाले मुल्कों ने यह कदम बढ़ाने का साहस किया है।'

               मालूम हो कि विगत शनिवार को दोनों मुल्कों के बीच इस करारनामे को लेकर दस्तखत हुए। नए वीसा नियमों के तहत दोनों देशों के व्यापारियों को अधिक सहूलियतें दी गयी हैं, जिसके अन्तर्गत न केवल वह मल्टिपल एन्टी कर सकेंगे अर्थात कई बार आ जा सकते हैं और उन्हें पुलिस रिपोर्ट से भी छूट देने की और अधिक शहरों में जाने की छूट होगी। इसके अलावा ग्रुप टूरिस्ट वीसा नाम से एक नयी श्रेणी को शुरू किया गया है जिसके तहत 10-15 लोगों का समूह इस वीसा को तीस दिन के लिए हासिल कर सकता है, जिसके प्रबन्धन का जिम्मा दोनों देशों के पंजीकृत आपरेटर्स के पास होगा। वैसे अभी भी दोनों मुल्कों ने व्यक्तियों को टूरिस्ट वीसा प्रदान करने से - ताकि वह दूसरे देश घुमने के इरादे से आ जा सकें, लोगों से मिल जुल सकें - अभी परहेज किया है।

               गौरतलब है कि इस करारनामे को लेकर दोनों मुल्कों के बीच उत्साहवर्ध्दक प्रतिक्रिया सुनने को मिल रही है। चाहे व्यापारी हों, दोनों मुल्कों के बीच व्यापार एवं राजनीतिक सम्बन्ध बेहतर बनाने में मुब्तिला संस्थान हों या शान्ति के लिए प्रतिबध्द कार्यकर्ता हों, सभी का मानना है कि इस करार का दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर अहम प्रभाव पड़ेगा। ध्यान रहे कि इस करार ने विगत 38 साल से चली आ रही सीमित वीसा प्रणाली की व्यवस्था को समाप्त किया है जिसके चलते अभी तक दोनों मुल्कों को अपने व्यापार को दुबई के रास्ते करना पड़ता था, जिसके चलते यातायात तथा जहाजों से होने वाली मालढुलाई के खर्चों में भी बढोत्तरी होती थी।

               इसमें कोई दोराय नहीं कि दो साल से जबसे भारत ने पाकिस्तान के साथ सम्वाद के सिलसिले को आगे बढ़ाया है तबसे कई मामलों में - खासकर व्यापार एवं निवेश के मामलों में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। तयशुदा बात है कि इस बात की गारंटी नहीं दी जा सकती कि दोनों मुल्कों में सम्बन्ध सामान्य हो ही जाएंगे मगर विगत साठ साल से अधिक समय से जिन दो पड़ोसी मुल्कों ने आपस में चार बार युध्द किया हो और कभी एक दूसरे को मिटा देने की बात की हो, उन मुल्कों में अगर इतिहास को भूलते हुए बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए सम्वाद को आगे बढ़ाने की बात चलती है तो यहभी सुकूनदेह बात कही जा सकती है।

                यूं तो भारत एवं पाकिस्तान वर्ष 2004 से ही आपस में शान्ति वार्ता की प्रक्रिया चला रहे हैं जिसमें वर्ष 2008 के 26/11 के आतंकी हमलों से रूकावट पैदा हुई थी, मगर अब लगता है कि दोनों पक्ष इसके प्रति गम्भीर भी हैं। जाहिर है जहां पाकिस्तान के लिए कसमीर के मसले का समाधान न होना एक दुखती रग कहा जा सकता है तो भारत के लिए 2008 के आतंकी हमले के मास्टरमाइंडों को आई एस आई का समर्थन या भारत की सरजमीं पर आतंकी कार्रवाइयों में मुब्तिला संगठनों के लिए पाकिस्तान सरकार का कथित समर्थन, चिन्ता का सबब बने रह सकते हैं।

               वैसे यह भी प्रतीत हो रहा है कि दोनों मुल्कों के कर्णधार इस बात को समझने लगे हैं कि सिर्फ इन्हीं मसलों का राग अलापते रहेंगे तो सम्बन्धों में प्रगति नामुमकिन है, उन्हें यहभी लगता है कि व्यापार एवं निवेष को सुगम बनाने, लोगों के आने जाने पर लगी बन्दिशें हटाने से ऐसा माहौल भी बन सकता है। मालूम हो कि सम्बन्धों में सामान्यीकरण को लेकर दोनों मुल्कों बढ़ती तत्परता के संकेत पिछले साल ही मिले थे। भारत के फौजी हेलिकाप्टर के पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश और चन्द घण्टों के अन्दर उनकी वापसी /अक्तूबर 2011/-जो किस्सा कभी दोनों देशों के बीच तनाव की वजह बन सकता था - या इस घटना के महज दो दिन पहले संयुक्त राष्टसंघ की सुरक्षा परिषद में अस्थायी सदस्य के तौर पर पाकिस्तान का चुनाव और इसमें भारत के वोट ने निभायी निर्णायक भूमिका, आदि मसलों पर चर्चा चल ही रही थी कि पाकिस्तान ने भारत को विषेश तरजीही मुल्क का दर्जा दिया। मालूम हो कि भारत ने पहले ही /1995/ में पाकिस्तान को विषेष तरजीही मुल्क का दर्जा दिया था और उसने विश्व व्यापार संगठन मंच पर यूरोपीय संघ के बाजार तक पहुंच की उसकी कोशिशों के प्रति अपनी आपत्ति वापस ली है। लाजिम है ऐसा कोई भी कदम दोतरफा व्यापार को और आसान बना देता है।

               पाकिस्तान के चर्चित 'डॉन' अख़बार में लिखते हुए अमेरिका में बसे पाकिस्तानी मूल के विद्वान प्रोफेसर अहमद ने इस बात की चर्चा की है कि आखिर दोनों मुल्क वार्ता के लिए क्यों तैयार होते दिख रहे हैं। उनका मानना है कि पहले जो भी माहौल रहा हो, मगर अब जबकि छोटे से भूटान देश पर भी कोई आक्रमण कर उसे शिकस्त नहीं दे सकता, ऐसे बदले दुनिया के वातावरण में दोनों मुल्कों को यह एहसास हो चला है कि युध्द से मसलों को हल नहीं किया जा सकता। इसके अलावा आपसी तनाव के वातावरण से बढ़ते सैनिकी खर्च भी जनता के बुनियादी सुविधाओं के खर्चों पर कटौती लगाने का बहाना बन जाता है। इसके अलावा वह व्यापार बढ़ोत्तरी के फायदे भी देखते हैं। चाहे अमेरिका, कनाडा एवं मेक्सिको के बीच बना ''नाफटा' जैसा व्यापार समूह हो या यूरोपीय मुल्कों के बीच व्यापार के स्तर पर एकीकरण की चली कोशिशें हों, वह इनके फायदे भी देखते हैं और दोनों मुल्कों के कर्णधारों को लगता है कि अमन की पटरी पर गाड़ी आगे चल निकली तो सार्क को भी वैसी सूरत दी जा सकती है।

               कुछ लोग यह भी मानते हैं कि पाकिस्तान के बदले रूख का वास्तविक कारण यही है कि पाकिस्तान की सेना अपनी पूर्वी सीमाओं पर फिलवक्त अमन चाहती है क्योंकि खैबर पख्तुनवा और एफएटीए इलाकों में वह तालिबान के साथ युध्द में मुब्तिला है। हक्कानी नेटवर्क को खतम करने के लिए अमेरिका की तरफ से उस पर दबाव भी पड़ रहा है। मगर अगर दोनों मुल्कों में हमेषा अमन के चाहनेवालों पर गौर करें तो वे मानते हैं कि एक ऐसी पीढ़ी दोनों मुल्कों में निर्णायक भूमिका में पहुंच रही है, जो बंटवारे के बोझ से मुक्त होकर नए धरातल पर सम्बन्ध कायम करना चाह रही है।

               कुछ लोगों का यह भी मानना है कि पाकिस्तान एवं भारत के बीच आपसी सद्भाव के वातावरण के प्रति अमेरिका का भी समर्थन है जो चाहता है कि 2014 तक अपनी सेनाएं अफगानिस्तान से वापस बुलाने के पहले वहां का युध्द समाप्त हो सके। यह अकारण नहीं कि भारत-पाकिस्तान की हालिया वार्ता पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने में अमेरिका आगे रहा है।

               वजह जो भी हो, अगर सम्बन्ध बेहतर हो रहे हैं तो यह हर मायने में अच्छा है। कई सारी मानवीय त्रासदियां जो हमारे सामने घटित हो रही हैं, उससे हम मुक्ति पा सकते हैं। मिसाल के तौर पर, भारत पाकिस्तान के तनावपूर्ण सम्बन्धों की याद दिलाता सियाचिन मसला भी है जिसे दुनिया की सबसे उंचाई पर स्थित युध्दभूमि कहा गया है, जहां दोनों तरफ से हजारों सैनिक - एक दूसरे के खिलाफ लड़ते हुए नहीं, ठंड या हिमदाह के चलते मारे गए हैं, और आज भी यह सिलसिला जारी है। दोनों मुल्कों के अमनपसन्द लोग इस बात का इन्तजार कर रहे हैं कि व्यापार-निवे एवं आवाजाही पर जमीं बर्फ हटने के बाद अब क्या सियाचिन की बारी आएगी ताकि इस इलाके का गैरसैनिकीकरण करके दक्षिण एिया के इस समृध्द इलाके की जनता को तरक्की एवं सदभाव के नए रास्ते पर ले जाया जा सके।

   ? सुभाष गाताड़े