संस्करण: 17 सितम्बर-2012

यह है 'जनकल्याणकारी'

शिवराज सरकार

?  महेश बाग़ी

                 ध्यप्रदेश के 'यशस्वी' मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बधाई के पात्र हैं। और हों भी क्यों नहीं, क्योंकि उन्हें समाज के लगभग हर तबके की चिंता दिनरात खाए जा रही है। पता नहीं बेचारे इस चिंता में वे कितने समय की नींद ले पा रहे होंगे। हमारी शिवराज जी के प्रति पूरी सहानुभूति है। अब देखिए, उनके 'विलक्षण' दिमाग में एक खयाल आया कि इस प्रदेश की गरीब जनता (खासकर भाजपा से जुडे लोगों की भीड़) धर्म भीरू तो है ही। अपनी पार्टी के वेटिंग से बाहर हो चुके पीएम लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और उससे उपजी सहानुभूति लहर से राम मंदिर भले ही न बन पाया हो, परंतु केंद्र भाजपा की सरकार तीन-तीन बार बन गई और धर्म भीरू जनता से मंदिर के नाम पर करोड़ों-अरबों का चंदा अलग से वसूल कर लिया।

               इसी अवधारणा से प्रेरित होकर 'माननीय' शिवराज जी को सूझा कि क्यों न प्रदेश की जनता को तीर्थ दर्शन पर भेजा जाए। उनके आसपास तो ऐसे 'मदारियों' की विशेष फौज है, जो उन्हें 'जमूरा' बनाए रखने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती है। जैसे ही शिवराज जी ने तीर्थदर्शन यात्रा का प्रस्ताव किया, वैसे ही उसे उनके सलाहकार मंडल ने तत्काल मंजूरी भी दे दी। अब चूंकि मामला भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का है, इसलिए मजबूरी में ही उन्हें तीर्थदर्शन यात्रा योजना में दीगर तीन अन्य बडे धर्म के लोगों को भी शरीक करने को मजबूर होना पड़ा। यह बात अलग है कि इनमें से एक धर्म ऐसा है, जो एक निराकार को ही मानता है और इस धर्म के मूल ग्रंथ के अनुसार एक अकेले 'मालिक' के अलावा किसी दूसरे के आगे सजदा करना अधार्मिक कृत्य है। इसका अर्थ यह हुआ कि मालिक के अलावा और किसी को भी उससे बड़ा दर्जा नहीं दिया जा सकता। लेकिन शिवराज जी की भी एक मजबूरी थी, यदि वे तबके को नजरअंदाज कर देते तो उन पर एक धर्म विशेष पर होने का ठप्पा लग जाता। इसलिए उन्होंने इसमें एक ऐसे 'स्थल' को भी जोड़ लिया, जहां शीष झुकाना मजहब के खिलाफ है। मगर क्या किया जा सकता है। इस मजहब से जुडे लोगों के खिलाफ होने का ठप्पा भाजपा पर पहले से ही लगा है, इसलिए तीर्थदर्शन यात्रा में इसे भी मजबूरीवश शरीक कर लिया गया है। हम मुख्यमंत्री द्वारा लाई गई इस योजना के कतई विरोधी नहीं हैं, लेकिन हमारा मूल प्रश्न यह है कि क्या प्रदेश के लोगों को तीर्थयात्रा कराना ही किसी सरकार का दायित्व भर रह गया है? भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्ष है।

              फिर शिवराज सरकार धर्म के नाम पर यह राजनीति क्यों कर रही है? वह भी उस प्रदेश में जिसका सरकारी खजाना तो खाली है ही, उस पर 93 हजार करोड़ रुपयों का कर्ज भी चढ़ा हुआ है। इतना ही नहीं, यह सरकार अपने उपक्रमों की संपत्तियों को गिरवी रखकर भी कर्ज ले चुकी है। इसके अलावा 'अपने चहेतों' को उपकृत करने के लिए इस सरकार ने बैंक गारंटी तक दे रखी है। इस सबका कुल जमा आशय हुआ कि यदि प्रदेश की तमाम संपदाओं को यह सरकार अपनी निजी जागीर समझ रही है तो इसका अर्थ साफ है कि उसका मकसद न प्रदेश का विकास करना है और न ही प्रदेशवासियों का भला करना। इसका उदाहरण भी खुद सरकार ने ही पेश किया है। खाली खजाने और कर्ज पर कर्ज की स्थिति के बाद सरकार ने निर्माण एजेंसियों से जुडे विभागों के बजट में 40 प्रतिशत से अधिक कटौती कर दी है। नतीजतन निर्माण कार्य तो ठप हो ही गए हैं, सरकारी अमला भी कुर्सी तोड़ते हुए मुफ्त की तनख्वाह ले रहा है। अब बात करें प्रदेश की उस खनिज संपदा की जो इस प्रदेश की जनता की धरोहर है और इसी के बलबूते सरकारी राजस्व में इजाफा होता है। इस गंभीर मामले में यह सरकार कितनी क्रियाशील है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदेशभर में खनन माफियाओं ने सिर उठा रखे हैं। खासकर, भाजपा से जुडे लोगों ने तो इसे अपनी जागीर ही समझ लिया है। यादा दूर न जाए, राजधानी से सटे विदिशा में जिले में एक एसडीएम ने अवैध खनन करती एक जेसीबी मशीन जप्त की और प्रकरण भी बनाया, मगर हुआ क्या? यह कार्रवाई करने वाले अधिकारी का रातोंरात तबादला कर दिया गया। पता है क्यों? उक्त अवैध खनन प्रदेश के मुखिया का छोटा भाई जो कर रहा था। अवैध खनन का यह अकेला प्रकरण नहीं है, शिवराज मंत्रिमंडल के कई सदस्यों पर अवैध खनन में लिप्त होने अथवा अवैध करने वालों को प्रश्रय देने के आरोप भी लगे। कुछ दबंग अधिकारियों ने कार्रवाई करने की हिम्मत दिखाई तो उन पर बुल्डोजर चलाकर उसे 'हादसा' करार दे दिया गया। मुरैना जिले में तो कलेक्टर और एसपी तक पर गोलियां बरसाईं गईं। मगर हुआ क्या? एक भी नेता का बाल तक बांका नहीं हुआ। वोटबैंक की खातिर इस सरकार ने कई योजनाएं क्रियान्वित की है। खासकर जननी सुरक्षा योजना, इसके तहत जननियों को घर से अस्पताल लाने और अस्पताल से घर भेजने की सुविधा मुहैया कराई जाने की व्यवस्था है। क्या राय शासन यह बताने का साहस करेगा कि अब तक इस योजना के तहत कितनी जननियों को घर से अस्पताल लाया गया। यादा दूर न जाएं, चार दिन पहले ही राजधानी के जेपी अस्पताल में एक महिला प्रसव के लिए पहुंची, जिसे सुल्तानिया जनाना अस्पताल में रेफर करने की सिफारिस की गई। उक्त प्रसूता अस्पताल परिसर से बाहर निकली और उसने वहीं बच्चे को जन्म दे दिया। जननी सुरक्षा योजना का ढोल पीटने वाली सरकार के चार रहनुमा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, वित्तमंत्री राघवजी, जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज जिस विदिशा जिले को अपनी कर्मभूमि बताते हैं, उसी विदिशा जिले की लटेरी तहसील में एक प्रसूता को अस्पताल से सिर्फ इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि उसका पति वार्डबाय को सौ रुपए रिश्वत नहीं दे सका था। बेचारा पति रुपए का इंतजाम करने निकला और महिला ने अस्पताल परिसर में ही बच्चे को जन्म दे दिया। बदहवास प्रसूता संभल पाती, इसके पहले ही एक सूअर आकर उस नवजात को जिंदा ही खा गया। मध्यप्रदेश के संसदीय इतिहास में इतनी लोमहर्षक और शर्मनाक करने वाली घटना संभवत: पहले कभी नहीं हुई और इससे भी बड़ा शर्मनाक सच यह है कि एक भी सरकारी बाशिंदा इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया।

               वोट बटोरने की खातिर सरकार ने कुछ और कल्याणकारी योजनाएं भी शुरू की है। इनमें ग्रामीण क्षेत्रों में लोक कल्याणकारी शिविरि लगाए जाने का प्रावधान है। अब तक मिली जानकारी के अनुसार ऐसे शिविरों में आए डेढ़ करोड़ से अधिक प्रकरण अधिकारियों की टेबलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। इसी प्रकार शहरी क्षेत्र के नागरिकों के लिए सरकार ने लोकसेवा गारंटी अधिनियम पारित किया और इसके लिए केंद्र से पुरस्कार लेने में भी 'शर्म' महसूस नहीं की। इस अधिनिमय के तहत विभिन्न विभागों की 52 सेवाएं सम्मिलित हैं। इनमें से 16 विभागों की 70 हजार शिकायतें लंबित पड़ी हैं। 12 हजार से अधिक प्रकरण तो पिछले दो साल से कार्रवाई की राह देख रहे हैं। हालांकि सरकार ने इस अधिनियम के तहत समय-सीमा निर्धारित की है और काम न होने पर अफसरों-कर्मचारियों के विरुध्द जुर्माना करने का भी प्रावधान किया है, किंतु आज तक एक भी मामले में कोई कदम नहीं उठाया गया है।

               यही सरकार कभी किसानों, कभी छात्रों, कभी कोटवारों, कभी काम वाली बाइयों आदि-आदि की समस्याओं के बारे में पंचायतें आयोजित कर चुकी हैं। माना जा रहा है कि इन पर 50 हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो चुके हैं। लेकिन नतीजा क्या है? मुख्यमंत्री की चार हजार से अधिक घोषणाओं में से चार सौ घोषणाएं भी पूरी नहीं हो पाई हैं। क्या इसके बावजूद इसे हम एक जनकल्याणकारी सरकार कहेंगे? यह प्रश्न इसलिए मौजूदा है क्योंकि इस सरकार को लोक दिखावे में यादा मजा आ रहा है। शायद प्रदेश की अपढ़ जनता को भी लग रहा है कि देखो, हमारा मुख्यमंत्री कितना अच्छा काम कर रहा है। इसलिए हम भी यही कहेंगे शिवराज जिंदाबाद, जिंदाबाद शिवराज।

? महेश बाग़ी