संस्करण: 17 सितम्बर-2012

क्या हम धर्मनिरपेक्ष है?

? शिव विश्वनाथन

               यह ''धर्मनिरपेक्षता और भारतीय मुसलमान'' विषय पर एक निबंध है और मैं यह मानता हॅू कि वर्तमान में घटित घटनाओं ने इसे लिखना मेरे लिये बहुत मुश्किल कर दिया है। मैं अपनी बात प्रारंभ से ही कहता हूॅ।

               मैं जमशेदपुर मैं पैदा हुआ था जहाँ मैंने नगरीय क्षेत्रों में एक के बाद एक दंगे भड़कते हुये देखे। मुझे अपने स्कूल का वह दिन आज भी याद है जब मेरा सहपाठी ओबिदुल इस्लाम मुझसे अलविदा कहने आया था। उसने दु:खी होकर मुझसे कहा था कि उसका परिवार पाकिस्तान वापस लौट रहा है।  ओबिदुल 100 मीटर दौड़ का एक बहुत ही अच्छा धावक था और मै आज  तक उसकी तरह नही दौड़ पाया हूॅ।

               जब मैं बड़ा हुआ और मैंने 1992 में मुंबई के दंगे और 2002 में गुजरात का नरसंहार देखा। यह देखकर मुझे विडंबना हुई कि बहुसंख्यक समुदाय के लिये लोकतंत्र अरंडी के तेल के समान है जो स्वास्थय के लिय तो लाभदायक है किन्तु उसे पीना कठिन है। जब मैं गुजरात में हुई हिंसा का अध्ययन कर रहा था तो मैंने देखा कि हिंसा से बचे हुये मुस्लिम समुदाय ने विधिक समुदाय के आसपास स्वयं के लिये एक नई नागरिकता का निर्माण कर लिया था। मैंने मिस्टर बंदूकवाला की बात को सुना जो एक समय बड़ौदा विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर थे। वे हिन्दुओं से कह रहे थे कि यदि तुम माफी भी नही माँगते हो, तो भी मैं तुम्हे माफ करता हूॅ। यह सब सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ कि धर्मनिरपेक्षता का यह कैसा अर्थ है?

              मेरे एक धर्मनिपेक्ष मित्र विचित्र प्रकार के जातिवाद के अभ्यस्त थे। दंगों के बाद की परिस्थितियों में वे मुसलमानों से तो बात करते थे किन्तु हिन्दुओं से दूर रहते थे जबकि दंगों की पीड़ा को तो हिन्दुओं ने भी सहा था।  मैने देखा कि धर्मनिरपेक्षता ध्रुवीकरण का रूप ले रही है जहाँ एक सम्प्रदाय की पीड़ा दूसरे सम्प्रदाय की पीड़ा से अधिक विशेष है। सबसे बुरी बात यह है कि मैने धर्मनिरपेक्षता को निरर्थक और संवादहीन पाया। यह धर्मनिरपेक्षता शास्त्रविहीन उपदेश के समान पूर्णतया राजनीतिक स्वरूप  की थी जिसमें   दंगों में हताहत चीख पुकार मचाने वाले मुसलमानों के बच्चे थे और सच खिड़कियों से बाहर झाँक रहा था।

               कम से कम विज्ञान और धर्म के संबन्धों की परिभाषा के अनुसार तो धर्मनिरपेक्षता एक झूॅठी ऐतिहासिक कहानी पर आधारित है। विज्ञान और धर्म के बीच संघर्ष एक झूॅठी कपोल कल्पना है। धर्म और विज्ञान के बीच संघर्ष के बारे में जो ग्रन्थ प्रकाशित हुये वे धर्मशास्त्रियों और वैज्ञानिकों के मध्य सत्ता के लिये संघर्ष के परिणामस्वरूप प्रकाशित हुये थे, जो आधुनिक विश्वविद्यालय पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिये लड़ रहे थे। उन दोनों ने ही अतीत में जो इतिहास लिखा उसमें इन तथ्यों को नही बताया कि धार्म और विज्ञान दोनों ही रचनात्मक एवं एक दूसरे के पूरक है।

               मै सोचता हूॅ कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता को धर्म के साथ नही बॉधा जा सकता किन्तु उसका धर्म के साथ संवादजनक रिश्ता बनाना अत्यंत आवश्यक है। मुझे एक पुरानी फिल्म ''इनहेरिट द विंड'' का अंत याद आ रहा है, जिसमें फिल्म का हीरो ''क्लेरेंस डेरो'' डार्विन की ''ओरिजिन ऑफ स्पीसीज''  और ''बाइबल''  दोनों को महान पुस्तकों की भॉति हाथ में लेकर ऊपर उठाता है जो दोनों ही भिन्न-भिन्न सच से प्रेरित है। धर्मनिरपेक्षता एक विचारधारा के रूप में समालोचना पर जोर देती है और मैं यही कर रहा हूॅ।

                 मुंबई में जो कुछ हुआ और जो हो रहा है वह अत्यंत पाशविक है। यदि मुसलमान भी बाल ठाकरे या राज ठाकरे की भॉति कट्टर हो जाय तो वे भी वैसा ही करेंगे। यदि मुसलमान सिर्फ मुसलमानों के ही लिये बात करने पर अड़ जायें और बोडो की पीड़ा को न समझे तो वे आत्ममोह में बॅधी हुई ऐसी प्रजाति माने जायेंगे जिसमें धर्मनिरपेक्षता के कोई मूल्य मौजूद नही है। जब तक मुसलमान यह न समझ लें कि दस लाख से अधिक बोडो लोग विस्थापित किये जा चुके है, तो तीस लाख मुसलमानों के विस्थापन का अर्थ उन्हे समझ में आ जायेगा। एक आदमी की पीड़ा दूसरे आदमी के जश्न  का कारण नही हो सकती। यह धर्मनिरपेक्ष लोगों का धर्मनिरपेक्ष तरीका कदापित नही हो सकता।

               हमारे समाज में अब धर्मनिरपेक्षता को पृथक से परिभाषित करना होगा। धर्म और विज्ञान, के बीच संघर्ष नही हो सकता अथवा राज्य और धर्म को अलग नही किया जा सकता। धर्मनिपरेक्षता एक ऐसा मार्ग है जिसमें हम अनजान व्यक्ति को भी आदर देते है। वह अनजान व्यक्ति ही हमें इसका महत्व बताता है। धर्मनिरपेक्षता का पहला नियम सत्कार होना चाहिये। हम दूसरों का स्वागत करते है क्योंकि वह हमारा नही है। वह हमें यह स्मरण कराता है कि हम वास्तविक रूप में परिपूर्ण नही है, और अंशमात्र है जिन्हे एक दूसरे की आवश्यकता है। धर्मनिरपेक्षता का दूसरा नियम दलाई लामा की इस टिप्पणी के बाद बनाया जा सकता है -''जार्ज बुश के व्यवहार से मुसलमानों का उनके प्रति विश्वास पैदा हुआ है''। इसी प्रकार कहा जा सकता है कि गुजरात नरसंहार के बाद नरेन्द्र मोदी ने मुसलमानों का विश्वास प्राप्त कर लिया है। यह धर्मनिरपेक्षता की दूरियों को एक अर्थ देने का तरीका है जहॉ हम दूसरों की पीड़ा के क्षणों में उनके विपरीत हो जाते है। अभी भी हमारी धर्मनिरपेक्षता दीवारें पैदा करती है। ऐसा अहसास होता है कि हिंसा तभी हो सकती है जब पहचान स्पष्ट हो और अलगाव को बरकरार रखा जाता हो। हमारी धर्मनिरपेक्षता अलगाव तथा भिन्नताओं को सकारात्मक रूप से  लेती है क्योंकि वह विविधाता का एक सिध्दान्त है, समरूपता का नही।

               एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में मुझे उसकी परिभाषा के अनुसार धर्मनिरपेक्ष होना होगा। इसलिये कि मैं हिन्दू हूँ, मैं सिर्फ हिन्दुओं के ही लिये नही लड़ सकता। मैं मुसलमानों के लिये लड़ता हूॅ क्योंकि मैं एक हिन्दू हूॅ। मेरा कर्तव्य मेरे सम्प्रदाय से बडा है क्योंकि मेरे अधिकार भी उससे आगे है। इस धर्मनिरपेक्षता की यथार्थ संवादजन्यता को जरूरत है कि मै हिन्दू अतिवादियों और मुस्लिम कट्टरपंथियों दोनों को ही चुनौती दूँ। आज हमारा समाज कमजोर हो चुका है क्योंकि मुस्लिम हिंसा और विशिष्टता एक समस्या बन चुकी है। मुसलमानों की आलोचना करना उनका राक्षसीकरण करना नही है। हमें एक दूसरे को आइना दिखाने के लिये नागरिकता का आदान-प्रदान करना होगा। हमें यह समझना होगा कि कुछ और दंगे राजनीति की वास्तविक प्रकृति को बदल सकते हैं।

               मैं यह इसलिये लिख रहा हूॅ क्योंकि मै प्रजातंत्र के भविष्य के लिये चिंतित हूॅ। स्थिति तनावपूर्ण है और हमें यह नही भूलना चाहिये कि असम भारत में मुसलमानों की आबादी वाला दूसरा सबसे बड़ा राज्य है। हमें यह समझने की जरूरत है कि एक बाधय करने वाला अल्पसंख्यकवाद उतना ही सड़ा और दुर्गन्धयुक्त है जितना कि भाड़े के गुण्डों वाला बहुसंख्यकवाद। मुस्लिम कट्टरपंथी और हिन्दू अतिवादी दोनों ही प्रजातंत्र के लिये खतरनाक है। हमें एक ऐसे खुले लोकतंत्र की जरूरत है जो इन दोनों ही अतिवादिताओं से निपटने में सक्षम हो। एक मौलाना अब्दुल कादिर अल्वी राज ठाकरे का कोई विकल्प नही है। वह सिर्फ एक ऐसा मुस्लिम मोदी है जिसने सिर पर टोपी पहन रखी है। खतरा यह है कि कुछ दंगे असुरक्षा और घृणा का वातावरण पैदा करते है जो मोदी जैसे राजनेता को सत्ता में लाते है। यह इतिहास बताता है कि एक धर्मनिपरेक्ष व्यक्ति की सदैव  उपेक्षा होती है। वर्तमान में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ बहुत ही संकीर्ण और कमजोर है। इसके लिये हमें नये शब्दों का आविष्कार करना होगा ताकि हम उस दुनिया को समझ सकें जिसमें हम रहना चाहते हैं। एक संकुचित और राज्य प्रायोजित पाश्चात्य धर्मनिरपेक्षता का दिखावा इस नई लोकतांत्रिक लड़ाई में पूर्णतया व्यर्थ है।

? शिव विश्वनाथन

(लेखक एक जाने-माने समाज विज्ञानी है।)