संस्करण: 17 सितम्बर-2012

ठाकरे परिवार की बिहारी पृष्ठभूमि

क्षेत्रीयतावाद की राजनीति की सीमाए

? उपेन्द्र प्रसाद

               बाल ठाकरे और उनका परिवार क्षेत्रीय राजनीति करने में देश के सभी क्षेत्रीय दलों और नेताओं को मात दे रहे थे। 1960 के दशक में क्षेत्रीय राजनीति के द्वारा ही बाल ठाकरे ने अपनी अलग पहचान बनाई थी। तब वे दक्षिण भारतीयों और गुजरातियों के खिलाफ आग उगला करते थे। इधर कुछ वर्षों से उनके बेटे और भतीजे उत्तर भारतीयों और खासकर बिहार के लोगों के खिलाफ आग उगल रहे थे। उनके खिलाफ आग उगलकर वे अपने मराठा मानूष की राजनीति को धार देने का काम कर रहे थे। उसमें वे सफल भी हो रहे थे। बाल ठाकरे बीच बीच में पाकिस्तान और मुसलमानों को भी अपने निषाने पर लेने लगे थे। पर उनके भतीजे राज ठाकरे का सबसे प्रिय राजनैतिक हथकंडा बिहार और बिहार से आए लोगों के खिलाफ ही आग उगलना था। वे नई पार्टी बनाकर अपने चाचा और चचेरे भाई के खिलाफ मराठा मानूष की राजनीति में प्रतिस्पर्धा भी कर रहे थे, इसलिए वे अपनी क्षेत्रवादी राजनीति को ज्यादा से ज्यादा उग्र बनाने में लगे हुए थे।

               राज ठाकरे ने अपनी क्षेत्रीयतावाद की राजनीति की अति उस समय कर दी, जब उन्होंने कहा कि यदि बिहार सरकार उन मुंबई पुलिस कर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करती है, जिन्होंने बिहार की स्थानीय पुलिस को सूचित किए बिना अब्दुल कादिर नाम के एक अपराधी को गिरफ्तार कर लिया था, तो वे महाराष्ट्र में रह रहे सभी बिहारियों को घुसपैठिया घोषित कर देंगे और उन्हें निकाल बाहर करने की कार्रवाई शुरू कर देंगे। उनकी उस धमकी के बाद तो उनके चचेरे भाई उध्दव ने बिहारियों के लिए महाराष्ट्र में काम करने के लिए वर्क परमिट की अनिवार्यता का सुझाव भी दे डाला। जाहिर है, दोनों अपनी राजनैतिक स्पर्धा के क्रम में क्षेत्रीयतावाद की राजनीति को उस चरम पर ले रहा थे, जो राष्ट्र विरोधी भी था।

               लेकिन अब क्षेत्रीयता की उनकी राजनीति को फिलहाल ब्रेक लगा हुआ है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने बाल ठाकरे के पिता केशव सीताराम उर्फ प्रबोधंकर ठाकरे की आत्मगाथा को उध्दत कर बता दिया कि पूरा ठाकरे परिवार ही बिहारी मूल का है। जब दिग्विजय सिंह ने पहली बार ठाकरे परिवार को बिहारी मूल का कहा था, तो राज ठाकरे ने उस पर अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा था कि यदि हम बिहार से हैं, तो दिग्विजय सिंह सुलभ शौचालय से हैं। उसके बाद जब श्री सिंह ने उनके दादा प्रबोधंकर ठाकरे की आत्मगाथा को पढ़कर सुना दिया और बता दिया कि उनका पूरा ठाकरे परिवार ही बिहार से आया है और वे लोग किस रास्ते से पुणे पहुंचे, उस रास्ते का भी उस पुस्तक में जिक्र है, तो उसके बाद से राज ठाकरे न तो दिग्विजय सिंह का नाम ले रहे हैं और न ही सुलभ शौचालय की उन्हें याद आ रही है।  वैसे ठाकरे परिवार की तरह ही सुलभ शौचालय की पृष्ठभूमि भी बिहार की ही है। यह आंदोलन बिहार में ही शुरू हुआ था और महाराष्ट्र में वहीं से आया है।

               अपने बिहारी पृष्ठभूमि पर राज ठाकरे तो मौन हैं, पर उध्दव ठाकरे ने जरूर कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन उनकी लड़खड़ाती जुबान दिग्विजय सिंह के दावे की ही पुष्टि कर रही थी। उन्होंने कहा कि श्री सिंह को मराठी नहीं आती, इसलिए वे समझ नहीं सके कि प्रबोधंकर ठाकरे ने अपनी जीवनगाथा में क्या लिखा है। पर उध्दाव चाहते तो अपने दादा की आत्मगाथा का वह पैराग्राफ मराठी में पढ़कर उसका सही मतलब समझा सकते थे, पर उन्होंने वैसा नहीं किया, क्योंकि उनको पता है कि उनके दादा ने वास्तव में यही लिखा है कि वे मगध से भोपाल और चित्तौड़गढ़ होते हुए पुणे पहुंचे। ठाकरे परिवार का सबसे वरिश्ठ और सबसे विद्वान सदस्य बाल ठाकरे हैं, उन्होंने भी दिग्विजय सिंह को गलत साबित करने के लिए कुछ नहीं बोला।

               दिग्विजय सिंह की बात का कांग्रेस के एक सांसद संजय निरुपम ने समर्थन किया। निरुपम आज भले ही कांग्रेस में हों, लेकिन वह कभी शिवसेना में हुआ करते थे और बाल ठाकरे द्वारा संपादित दोपहर के सामना के हिंदी संस्करण के कार्यकारी संपादक भी थे। उनके बारे में तो उध्दव ठाकरे नहीं कह सकते कि वे मराठी नहीं जानते, क्योंकि दोपहर का सामना के कार्यकारी संपादक होने के नाते तो मराठी वे जरूर जानते होंगे, क्योंकि वह अखबार मूल रूप में मराठी में ही निकाला जाता है और हिंदी संस्करण में तो ज्यादातर मराठी अखबार का अनुवाद ही छपता होगा। संजय निरुपम ठाकरे परिवार के बहुत नजदीक भी रहे हैं और उस नजदीकी के कारण ही पहली बार वे बाल ठाकरे ने ही उन्हें राज्य सभा का सांसद बनाया था। श्री निरुपम की सामाजिक पृष्ठभूमि भी वही है, जो ठाकरे परिवार की है और सबसे बड़ी बात यह है कि निरुपम बिहार से जाकर महाराष्ट्र की राजनीति कर रहे हैं और उन्हें वहां की राजनीति में लाने वाले खुद बाल ठाकरे ही हैं। जाहिर है, यदि संजय निरुपम ठाकरे परिवार को शतप्रतिशत बिहारी पृष्ठभूमि का बता रहे हैं, तो इसमें शतप्रतिशत सच्चाई भी है।

               बाल ठाकरे के पिता की आत्मकथा ने उनकी क्षेत्रीयता की राजनीति पर बज्र सा गिरा दिया है। देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह राजनीति अब आगे क्या रूप लेती है, लेकिन इस प्रकरण से यह साफ हो गया है कि हमारे देश में जो कोई भी क्षेत्रीय उन्माद फैला रहे हैं और उस उन्माद की राजनीति कर रहे हैं, वे न तो देष को समझ रहे हैं और न अपने आपको। सच तो यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बसने का काम इतनी ज्यादा बार हुआ है कि कोई यह नहीं कह सकता कि जहां आज वह रह रहा है, वहीं उसके सारे पुरखे रह रहे होंगे। हो सकता है कि आज जो अपने आपको मराठा बताकर महाराष्ट्र के स्थानीय निवासी होने का दावा कर रहे हैं, वे देश के किसी और हिस्से से आए होंगे और जो लोग पिछले 50 साल से महाराष्ट्र में रह रहे हैं, उनके पुरखे पहले कभी महाराष्ट्र से ही बाहर निकले हों।

              अनेक कारणों से भारतीय उपमहाद्वीप में लोग एक जगह से उजड़कर दूसरी जगह बसते रहे हैं। पहले तो ज्यादातर आबादी पशुपालक थी। वह आबादी उन इलाकों में अपने जानवरों के साथ घूमती थी, जहां उनके जानवरों को चारा पानी मिले। एक जगह सूखा पड़ने की स्थिति में बरसात वाले स्थान पर वे चले जाते थे। गांव में बसने के बाद भी जब दो तीन साल तक सूखा पड़ा तो वहां से वे अपना घर द्वार छोडकर वैसी जगह चले जाते थे, जहां सूखा नहीं पड़ा हो। प्राकृतिक कारणो के अलावा राजनैतिक कारणों से भी लोगों ने एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान को अपनाया। बहुत लोगों ने अपनी घार्मिक आस्थाओं को बचाने के लिए भी अपने मूल स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान का रूख किया। जनजातीय संघर्षो में हारने वाली जनजातियां अपने मूल स्थान को छोड़कर कहीं और चली गई और वहीं बस गई। इस तरह लोग इतनी ज्यादा बार उजड़े और बसे हैं कि यह कहना कठिन है कि कौन कहां नहीं थे। यदि इस तथ्य को हमारे देश में क्षेत्रीयतावाद फैलाने वाले समझे ंतो, हमारे देश को एक बड़ी समस्या से निजात मिल जाएगी।                      

? उपेन्द्र प्रसाद