संस्करण: 17 सितम्बर-2012

भारतीय समाज में अभारतीय कानून क्यों \

? डॉ. गीता गुप्त

                भारतीय समाज पश्चिम के प्रभाव से आक्रान्त है। मगर ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी सरकार और न्यायपालिका भी पश्चिम की जीवन शैली से पूर्णत: प्रभावित हैं। इसीलिए एक के बाद एक ऐसे कानून बनाये जा रहे हैं अथवा ऐसे निर्णय लिये जा रहे हैं जो कालान्तर में परिवार के स्वरूप को क्षतिग्रस्त कर दें तो आश्चर्य नहीं होगा। स्मरण रहे कि भारत में स्त्री ही परिवार की धुरी होती है। वह समाज की निर्मात्री है। वही समाज का पोषण एवं संवर्ध्दन करती है। फिर भी अपने पुरुषत्व के गर्व में पुरुष उसे बराबरी का दर्जा देने से कतराता है। यही कारण है कि एक-दूसरे के पूरक होते हुए भी स्त्री पुरुष आज प्रतिद्वंन्दी की भूमिका में आमने-सामने खड़े दिखाई देने लगे हैं। दोनों में सहिष्णुता के अभाववश पारिवारिक जीवन में कलह बढ़ रहा है। नयी पीढ़ी तो विवाह और पारिवारिक जीवन से ही कतराने लगी है। हालांकि इसके पीछे कुछ अन्य कारण भी हैं जैसे-लिव इन रिलेशनशिप और समलैंगिक संबंधों के प्रति बढ़ता आकर्षण, जो युवाओं को पारिवारिक दायित्वों से पूर्णत: मुक्त रहकर स्वच्छंद जीवन जीने की छूट देता है। और दुर्भाग्य से हमारी सरकार और न्यायपालिका भी ऐसे संबंधों की पैरवी करती है।

               न्यायपालिका ने ऐसे कई निर्णय दिये हैं जिनसे यह चिंता उपजती है कि वह भारत के परंपरागत सामाजिक मूल्यों की पैरोकार है अथवा पश्चिमी संस्कृति की समर्थक ? भारतीय परिवार में स्त्री विभिन्न भूमिकाओं में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती है। इसके बदले में उसे परिवार व समाज में सम्मान, प्रतिष्ठा एवं सुरक्षा मिलती रही है। यह सोचने की बात है कि किसी पुरुष के जीवन में प्रवेश कर एक स्त्री, जो पत्नीत्व और मातृत्व ग्रहण करती है, फिर अगणित उत्तरदायित्वों को सहर्ष निभाती है, क्या उसका कोई मूल्य कानूनन निर्धारित किया जा सकता है ? कम से कम भारत में तो यह संभव नहीं है। यहां पारिवारिक नाते-रिश्ते परस्पर प्रेम, सौहार्द, विश्वास, सहयोग और समर्पण पर अवलंबित रहे हैं। कभी घर परिवार में कलह, क्लेश या अप्रिय स्थिति निर्मित हुई तो बड़े बुजुर्गों के हस्तक्षेप या समझाइश ने जीवन को सही दिशा दी है। किन्तु अब  एकल परिवार के कारण घर के क्लेश न्यायालय की चौखट तक पहुंच रहे हैं, यह भारतीय समाज के लिए खतरे की घंटी है। अभी अधिक समय नहीं बीता, जब हिन्दुओं में भी तलाक को आसान बनाने के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन की कवायद की गई।

               और अब सरकार एक ऐसा कानून लाने पर विचार कर रही है जिसके अनुसार पति की आय का एक निश्चित भाग प्रति माह पत्नी को प्राप्त हो सके। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री कृष्णा तीरथ का कहना है कि 90 प्रतिशत महिलाएं विवाहोपरान्त घर-गृहस्थी में जुट जाती हैं। दिन भर की मेहनत के बावजूद उन्हें इससे कोई आय नहीं होती। किसी वजह से तलाक होने या पति की मृत्यु के बाद महिलाओं के पास स्वयं के गुजर बसर के लिए भी कुछ नहीं होता। इस कानून से उनको फायदा होगा क्योंकि इसके तहत हर पुरुष को अपने मासिक वेतन का दस से बीस फीसदी हिस्सा पत्नी को देना पड़ सकता है। यह रकत पत्नी को आय के रूप में देना होगा। उक्त कानून के दायरे में मजदूर से लेकर तमाम उच्चाधिकारी तक शामिल होंगे। पुरुषों को पत्नी के लिए अलग खाता खुलवाना होगा। हर माह उसमें राशि जमा करनी होगी, जिसे सिर्फ पत्नी निकाल सकेगी।

               उल्लेखनीय है कि भारत में 90 प्रतिशत महिलाएं पूर्णकालिक गृहिणी हैं। लेकिन नौकरी पेशा महिलाएं भी घर के दायित्वों से मुक्त नहीं हैं। आम तौर पर पुरुष घर के कामों में पत्नी की मदद नहीं करते। यह भारत में आम बात है, इससे परिवार के अस्तित्व पर कोई संकट नहीं मंडराता। लेकिन विचारणीय यह है कि यदि पुरुष को अपने वेतन का एक निश्चित भाग प्रति माह पत्नी को देने के लिए कानूनन बाधय किया जाएगा तो क्या दोनों के बीच संबंधा सहज रह पाएंगे ? भारतीय समाज में पत्नी पुरुष की अध्र्दांगिनी होती है। विवाह के बाद उनमें कोई भेद-भाव या 'तेरे-मेरे' की भावना नहीं होती। घर परिवार के प्रति दोनों की जिम्मेदारियां एक बराबर होती हैं। दोनों के सुख-दु:ख, नाते-रिश्तेदार, धान-दौलत सभी तो (कानूनन भी) साझे होते हैं। गृहस्वामिनी के रूप में अघोषित रूप से पति की समस्त आय की वह अधिकारिणी होती है। वह घर की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति पति के सहयोग से ही करती है। कहीं-कहीं तो पत्नी को पूरा वेतन सौंप कर पुरुष अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त रहना चाहते हैं और कहीं दोनों मिलकर योजनाबध्द तरीके से घर के प्रति अपने दायित्वों को निभाते हैं। सब कुछ उनकी आमदनी और आपसी समझ पर निर्भर करता है कि पारिवारिक जीवन को भलीभांति कैसे लिया जाएं ? इसमें कानून का हस्तक्षेप कहां तक जायज हैं ? एक मां, पत्नी और विभिन्न रूपों में जिम्मेदारियां निभाने की कीमत कानून की नज़र में पति की आय का सिर्फ दस या बीस प्रतिशत भाग होना क्या सचमुच स्त्री के स्त्रीत्व का अपमान नहीं ?

               जहां तक विवाहोपरान्त गृहिणियों की आय का प्रश्न है, तो वे पति की आमदनी से आकस्मिक विपदाओं के लिए धान बचाकर रखती ही हैं। उन्हें पति, बच्चों और रिश्तेदारों सहित सामाजिक आवश्यकताओं के मद्देनज़र बचत करना आता है। फिर भी, सरकार चाहे तो उन्हें घर पर ही उनकी योग्यतानुसार काम सुलभ कराया जा सकता है। रही बात परित्यक्ताओं और बेसहारा विधवाओं की, तो तलाकशुदा स्त्री को कानून पति से निर्वाह भत्ता मिलता है। बेसहारा विधावा की बात अलग है, पर अमूमन एक विधवा भी पति की संपत्ति की कानूनन हकदार होती है। ऐसे में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा तैयार किये जा रहे कानून के औचित्य पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है। अलबत्ता सरकार स्त्रियों के भविष्य और उनकी आर्थिक समृध्दि हेतु सचमुच चिन्तित है। अलबत्ता सरकार स्त्रियों के भविष्य और उनकी आर्थिक समृध्दि हेतु सचमुच चिंतित है तो उसे कुछ विशेष प्रावधान करने चाहिए। जैसे गृहिणियों को घर पर ही उनकी योग्यतानुसार काम मिलने की सुविधा सुलभ करायी जाए। विधवाओं एवं परित्यक्ताओं को शासकीय उपक्रमों में प्राथमिकता के आधार पर नौकरी दी जाए। द उन्हें मकान खरीदने या रोजगार के लिए व्याजमुक्त ऋण उपलब्धया कराया जाए। उन्हें आयकर से पूर्णत: मुक्त रखा जाए। उनके बच्चों की संपूर्ण शिक्षा नि:शुल्क हो। उन्हें यात्रा करते समय किराये में 50 प्रतिशत छूट दी जाए। और अंतिम बात, उनके मामलों को तत्परता से निपटाया जाए, चाहे वे जिससे भी संबंधित हों।

                स्मरण रहे कि 'घर' और 'परिवार' अकेली स्त्री या अकेले पुरुष से नहीं बनता बल्कि वह दोनों के सौजन्य और सहयोग से बनता है। दोनों मिलकर ही उसे अच्छी तरह चला सकते हैं और चलाये आये हैं। आय कम हो या अधिक, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। गृहस्थी का मामला नितान्त निजी होता है और सबकी निजता का सम्मान होना चाहिए। सरकार को भी यह समझना होगा। भारत पश्चिम नहीं है। यहां 'घर' भावनाओं से बनते हैं, कानून से नहीं। अतएवं सरकार को ऐसे ही कानून बनाने चाहिए जो घर-परिवार को मजबूती से जोड़े रखने में सहायक हों।

? डॉ. गीता गुप्त