संस्करण: 17 सितम्बर-2012

खेती की आय में महिलाओं की हिस्सेदारी तय हो 

? डॉ. सुनील शर्मा

               केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ घरेलू महिलाओं को अपने पतियों की तनख्वाह का हिस्सा दिलाना चाहती हैं।इसके लिए वो वाकयादा महिलाओं के खाते और पेनकार्ड तैयार करवाकर पतियों से तयशुदा राशि पत्नियों के बैंक खाते में जमा करना अनिवार्य करना चाहती हैं। अगर महिला एवं बाल विकास मंत्री द्वारा प्रस्तावित ये कानून अमल में आता हैं तो ये महिला सशक्तीकरण में क्रांतिकारी कदम सिद्व होगा। लेकिन भारत की कुल आबादी में सरकारी और गैरसरकारी क्षेत्र में नौकरीपेशा वेतन भोगियों की आबादी अधिकतम बीस फीसदी के आसपास ही होगी, जिसमें कुछ हिस्सा ऐसा भी है जिसमें पति पत्नि दोनों ही नौकरी पेशा है।

               इसके साथ ही यह वर्ग ऐसा है जो अपेक्षाकृत शिक्षित है और अधिकारों के मामले में महिलाओं की स्थिति कुछ हद तक अच्छी है। लेकिन महिलाओं का एक बड़ा वर्ग है किसान परिवारों से जुड़ी महिलाओं का जो कि देशभर में महिलाओं की कुल आबादी का आधे से अधिक है। किसानों का न तो तयशुदा वेतन होता है और न ही निश्चित आय। ऐसी स्थिति में विचारणीय यह है कि इन किसान परिवारों की महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा के मुद्दे पर कैसे राहत मिल सकती है। जबकि ये महिलाएॅ घरेलू मोर्चे के साथ साथ खेती किसानी में भी पति का बराबरी से हाथ बंटाती है। वो हाड़ तोड़ती सर्दी में भी परिवार के सदस्यों के जागने के पूर्व ही रोजाना के घरेलू कार्यो को निपटा कर पशुओं दुह कर और चारा डाल खेत जाने को तैयार हो जाती है। और खेत पर हरेक मोर्चे पर पति के साथ बराबरी से कार्य करती हैं। लेकिन यहॉ भी उनका शोषण ही होता है। बराबर कृषि कार्य के लिए उन्हें पुरूषों को दी जाने वाली मजदूरी  की तुलना में कम मेहनतना दिया जाता है। जमीन का मालिकाना हक भी सामान्य तौर पर पुरूषों के नाम पर होता है। खेती से जुड़े अधिकांश फैसले पुरूषों द्वारा किए जातें है।लेकिन उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी महिलाओं की होती है।कृषि उत्पादों के विपणन का पूरा अधिकार पुरूषों के हाथ में होता है जिससे घर की वित्तीय स्थिति पर उनका ही पूरा नियंत्रण और दबदबा रहता है। आर्थिक मामले में ये कदम कदम पर ये महिलाएॅ पति की ओर देखने मजबूर रहती हैं। महिलाओं के हाथ में रूपये तब आते हैं जब वो किसी रिश्तेदारी में जाती हैं। अन्यथा वो सिर्फ यह बता सकती है। कि घर में कौन से सामान की कमी है। महिलाएॅ खेत पर काम कर खाली हाथ घर नहीं आती हैं बल्कि उनके सिर पर चारे का गट्ठा भी होता है। पोषण के मामले में भी खेती किसानी से जुड़े वर्ग की महिलाओं की स्थिति काफी बदतर है। महिलाएॅ ही पूरे घर का खाना बनाती हैं लेकिन अक्सर भूखी ही रह जाती हैं। महिलाओं में रक्तअल्पता और कुपोषण के मामले खाद्य संकट से जूझते अफीक्री देशों के मुकाबले कम नहीं है।

               चूॅकि देश में महिलाओं की कृषि हिस्सेदारी कम नहीं है, अत: महिलाओं की स्थिति में सुधाार कर देश का कृषि उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है। इसके संबंध में विकासशील देशों में महिलाओं की कृषि में भागीदारी पर विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के द्वारा वर्ष 2011 में किए गए अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि यदि महिलाओं को पुरूषें के बराबर परिसंपत्तियां,कच्चा माल और सेवाओं जैसे संसाधन मिलते हैं तो समस्त विकासशील देशों में कृषि उत्पादन 2.5 से 4 फीसदी तक बढ़ जाएगा।इससे भूखे लोगो की तादात 12 से 17 फीसदी तक कम की जा सकती है।इसके अतिरिक्त इससे लोगों की आमदानी भी बढ़ेगी जिससे जीवन स्तर में सुधार के साथ साथ जीवन प्रत्याशा मे बढ़ोत्तरी होगी।

               इसके साथ ही महिलाओं को कृषि कार्यों से जुड़े कार्य जैसे पशुपालन,मुर्गीपालन जैसे कार्यों का विशेष प्रशिक्षण देकर उनकी आय में इजाफा किया जा सकता है। वर्मीकांपोस्ट की निर्माण इकाईयों के जरिए महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुदृढ़ीकरण के अनेक उदाहरण हमारे सामने है। महिला स्वसहायता समूहों के जरिए वर्मीकम्पोस्ट निर्माण की इकाईयॉ देश के विभिन्न सफलता पूर्वक कार्य कर रहीं है। स्वयंसहायता समूहों के जरिए महिलाओं को डेयरी एवं पशुपालन के लिए धान उपलब्ध कर उनकी आमदानी में सुधार किया जा सकता है।

                भारतीय महिलाएॅ कृषि के मोर्चे पर पुरूषों के साथ साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहीं है। लेकिन आर्थिक स्वालंबन के मामले में फिसड्डी हैं और पूर्णत: पुरूष वर्ग पर आश्रित हैं जबकि उनका आर्थिक स्वाबलम्बन देश की अर्थव्स्वस्था के साथ स्वयं महिला सशक्तीकरण की राह में सहयोगी सिध्द होगा। जरूरत इस बात है कि सरकार कानूनी रूप से उन प्रावधानों को लागू करे जो खेती की आय में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित करे।

? डॉ. सुनील शर्मा