संस्करण: 17 सितम्बर-2012

चिकित्सक और चिकित्सा पध्दतियों का घालमेल

? सुनील अमर

               ह अब एक सामान्य सी बात है कि चिकित्सा की किसी भी पध्दति में डिग्री लिया हुआ व्यक्ति बड़े आराम और अधिकार के साथ अंग्रेजी दवाओं की प्रैक्टिस करता है। अधिकांश मरीज यह जानते ही नहीं कि अंग्रेजी दवाओं से उनका इलाज करने वाला डॉक्टर ऐसा करने के लिए अधिकृत नहीं है। देश के प्रत्येक हिस्से में ऐसे हजारों डॉक्टर मेडिकल प्रैक्टिस करते मिल जायेंगे जिन्होंने पढ़ाई तो आयुर्वेद, होम्योपैथ या फिर यूनानी पध्दति में की है लेकिन मरीजों का इलाज वे इन दवाओं से न करके ऍग्रेजी दवाओं से ही करते हैं। इस सिलसिले में एक दिलचस्प वाकया उत्तर प्रदेश का है जहॉ कुछ अरसा पहले तक सरकारी अस्पतालों में तैनात होने वाले आयुर्वेद व होम्योपैथ के डॉक्टर भी ऍग्रेजी दवाऐं ही मरीजों को लिखते व देते थे। प्रदेश में सत्तारुढ़ नयी सरकार ने गत माह एक शासनादेश जारी कर आयुर्वेद, होम्यापैथ व यूनानी पध्दति के समस्त डॉक्टरों द्वारा ऍग्रेजी दवाओं के प्रयोग पर रोक लगा दी तथा इसके उल्लंघन पर आपराधिक कार्यवाही करने का निर्देश भी दिया। इस रोक के विरुध्द कुछ चिकित्सकों ने वहॉ के उच्च न्यायालय में अपील की तो गत सप्ताह अदालत ने सरकार के कदम को सही बताते हुए कहा कि याची अपनी विधा के विशेषज्ञ हो सकते हैं लेकिन इतने भर से उन्हें मार्डन दवाओं की प्रैक्टिस करने का अधिकार नहीं मिल जाता।

               यह सच है कि देश में एम.बी.बी.एस. डिग्रीधारी डॉक्टरों की भारी कमी है। कमी तो असल में मेडिकल कालेजों की ही बहुत है जहाँ तैयार होकर डॉक्टर निकलते हैं। मेडिकल की पढ़ाई के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षा सी.पी.एम.टी. अत्यन्त कठिन है तथा सीटें बहुत कम होने के कारण प्रत्येक सीट के लिए दावेदारों की संख्या अत्यधिक हो जाती है। प्रशासनिक सेवा की परीक्षाओं की तरह सी.पी.एम.टी. में भी मेरिट के हिसाब से पहले एम.बी.बी.एस. के लिए तत्पश्चात अन्य चिकित्सा पध्दतियों के लिए चयन होता है। हर पध्दति का अपना विशिष्ट पाठयक्रम तथा उपचार विधि होती है। जैसे इंजेक्शन और ऑपरेशन की जो व्यवस्था ऐलोपैथ में है वैसा संभवत: दुनिया की किसी अन्य पध्दति में नहीं है। इधर कुछ वर्षो से कुछ आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं ने इंजेक्शन बनाना शुरु किया है लेकिन अन्यान्य कारणों से वह लोकप्रिय नहीं हो पाया है। आयुर्वेद हमारे देश की अत्यन्त प्राचीन चिकित्सा पध्दति है और आज भी दुनिया भर में महत्त्व रखती है लेकिन इसके मुकाबले एलोपैथ महज इसलिए सर्वव्यापी और लोकप्रिय हो गया कि असर करने में इसकी तीव्रता, सर्व सुलभता तथा इस पर हो रहे विस्मयकारी अनुसंधानों ने इसे सरर्वोच्च कर दिया। इसके बजाय आयुर्वेद हजारों साल पुरानी उन किताबों पर आश्रित होकर रह गया है जिन्हें ज्यादातर तो लाल कपड़े में बॉधकर रख दिया गया है और वे पूजा की सामाग्री बनकर रह गये हैं। इनमें कोई भी उल्लेखनीय अनुसंधान नहीं हुआ है। इसी प्रकार होम्योपैथी को भी इस देश में आये दो सौ साल से अधिक हो रहा है लेकिन वह महज पढ़े-लिखे लोगों में ही सिमटी हुई है।

               आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथ के सिध्दांतकार यह कहते हैं कि उनकी चिकित्सा पध्दति भी तीव्र असरकारी है लेकिन सच यही है कि तात्कालिक असर के मामले में एलोपैथ का कोई सानी नहीं है। इस पध्दति में इंजेक्शन और ऑपरेशन की सुलभता ने इसे सर्वोच्च बना दिया है। चिकित्सक, चाहे वह सरकारी ही क्यों न हो, के पास गया हुआ मरीज तत्काल आराम चाहता है और यह उसे एलोपैथ में ही मिल पाता है। दूसरे, न सिर्फ सरकार अस्पतालों में एलोपैथ पार जोर देती है, बाजार में सर्वाधिक सुलभता भी इन्हीं दवाओं की है। यही कारण है कि अन्य पैथी के चिकित्सक भी इसी पैथी में इलाज करने को प्रमुखता देते हैं क्योंकि यह सहूलियत व व्यवयसाय दोनों दृष्टिकोण से ठीक पड़ता है। लेकिन प्रश्न यहॉ उनकी योग्यता का है। सरकारी अस्पताल हों या समाज में मौजूद प्रायवेट चिकित्सक, अगर एम.बी.बी.एस. डॉक्टर मौजूद हों तो न तो मरीज को अन्य डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा और न ही अन्य पैथी के चिकित्सकों को एलोपैथ अपनाने को मजबूर होना पड़ेगा। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि एलोपैथिक दवाऐं तेज असर करने के साथ-साथ, मरीज को अगर अनुकूल न हुई तो नुकसान भी उतनी ही तेजी से करती है और क्षणांश में जानलेवा हो सकती हैं। यही कारण है कि अपात्र व्यक्तियों द्वारा इसकी प्रैक्टिस को गैर कानूनी व दंड योग्य घोषित किया गया है।     राजकीय प्रश्रय किसी भी विधा को शीर्ष पर पहुॅचा सकता है। अंग्रेजी भाषा और एलोपैथी के साथ यही हुआ है। सरकार का सारा जोर एलोपैथी पर रहता है। मेडिकल कॉउसिल ऑफ इंडिया में भी एलोपैथ का ही बोलबाला रहता है। बावजूद इसके, देश में डॉक्टर्स की भारी कमी है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के ऑकड़े बताते हैं कि देश के सामुदायिक केन्द्रों पर चिकित्सकों के लगभग चालीस प्रतिशत पद खाली पड़े हुए हैं। लगभग यही हाल कम्पाउन्डरों का भी है। जितने डॉक्टर हर साल संस्थानों से पढ़कर बाहर निकलते हैं उनमें से अधिकांश विदेश चले जाते हैं और कमाल यह है कि इस पर न तो सरकार को कोई नियंत्रण हैं और न इसकी जानकारी ही कि कितने डॉक्टर्स प्रतिवर्ष देश के बाहर चले जाते हैं।            लगभग एक वर्ष से केन्द्र सरकार यह योजना बना रही है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए तीन वर्षीय पाठयक्रम के आधार पर डॉक्टर्स तैयार किये जॉय जो उसी क्षेत्र में नौकरी या प्रैक्टिस करने को बाध्य हों। इसका ये मंतव्य है कि एक तो डॉक्टरों की कमी को जल्दी पूरा किया जा सके तथा ग्रामीण क्षेत्रों में योग्य डॉक्टर उपलब्ध रहें। इस योजना का सबसे ज्यादा विरोध डॉक्टर ही कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि ये सब-ग्रेड के डाक्टर उनके प्रोफेशन और उनकी हनक को कम कर देंगें। सरकार की आधी-अधूरी कोशिशों के साथ ये अत्यन्त आवश्यक योजना ठंढ़े बस्ते में पड़ी हुई है जबकि ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर डॉक्टर्स की बहुत किल्लत है। संसद में प्राय: हर बड़े राजनीतिक दल से तमाम डॉक्टर सांसद हैं लेकिन शायद ही इनके द्वारा कभी डॉक्टरों या मेडिकल कॉलेजों की कमी की बात की जाती हो। एलोपैथ के डॉक्टर यदि पर्याप्त संख्या में उपलब्धा हों तो दूसरे पैथ के डॉक्टर से एलोपैथ की दवा लेने मरीज क्यों जाऐंगें। अभी तो स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में दवा विक्रेता भी मरीजों का उपचार करते रहते हैं। सरकारी ऑकड़ों के अनुसार हर साल औसत 1200 एम.बी.बी.एस. डॉक्टर विदेश चले जाते हैं और इस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं हैं जबकि ऐसे एक डॉक्टर को तैयार करने में सरकार का करोड़ों रुपया खर्च होता है और ये जिस देश में जाते हैं उन्हें बिना पैसा खर्च किये डॉक्टर मिल जाते हैं। देश में मेडिकल कॉलेज बहुत कम हैं। इस पर भी सितम यह है कि कॉलेजों को मानक के अनुसार न पाने पर मेडिकल काउन्सिल ऑफ इंडिया उनकी सीटें ही कम कर दे रही है। उच्च न्यायालय का आदेश सराहनीय है लेकिन गरीब मरीजों के मामले में यही कहावत सटीक बैठती है कि मरता क्या न करता। जब तक काबिल डॉक्टरों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होगी, मरीज आयुर्वेदिक और होम्यो ही नहीं झोला छाप से भी इलाज कराते रहेंगें। ग्रामीण डॉक्टरों को तैयार करने की योजना पर शीघ्र अमल ही इसका सही हल हो सकता है। जरुरत है कि सरकार डॉक्टरों की धौंस में आये बिना इस योजना को शुरु करे।

? सुनील अमर