संस्करण: 17 सितम्बर-2012

नफरत की

राज-नीति...!

?    विवेकानंद

               बौध्दिक स्तर पर विमर्श से विमुख या पराजय बोध से निरंतर भयभीत लोग अमूमन आक्रामक होते हैं। यदि यह गुण ऐसे व्यक्ति में विकसित हो जाएं जिसके पास थोड़ी सी ताकत,जनसमर्थन भी है और गगनगामी महत्वाकांक्षा भी, तो कई मौकों पर व्यवस्था के लिए दुर्भाग्यशाली साबित होते हैं। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में देखें तो यह गुण हमारे कई राजनेताओं में प्रस्फुटित हुए हैं, और कई लोग तो परिपक्व भी हो चुके हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यदि कोई हो सकता है तो वह है महाराष्ट्र की शिवसेना और उसकी परिपाटी को आगे बढा रही है महाराष्ट्र नव निर्माण सेना। शिवसेना की नींव नफरत की नीति पर ही पड़ी थी। ठाकरे ने अपनी राजनीति की शुरूआत दक्षिण भारतीयों के खिलाफ आग उगल कर शुरू की थी। उन्होंने 1964 में दक्षिण भारतीयों के खिलाफ हिंसक आंदोलन चलाया और इसे मराठी मानुष के सम्मान की रक्षा का नाम दिया। परिणामत: उनसे ऐसे मराठी जुड़ते चले गए जो दक्षिण भारतीयों के धन एवं बाहुबल के कारण उनसे टकराने में डरते थे। धीरे-धीरे ठाकरे की टीम तैयार हो गई, और इसी टीम का नाम 19 जून 1966 को पड़ा शिवसेना। मराठियों के खिलाफ आग उगलते-उगलते बाल ठाकरे मराठियों के एकमात्र रक्षक के रूप में स्थापित हो गये। जब दक्षिण भारतीयों ने हथियार डाल दिए तो ठाकरे ने गुजरातियों, मारवाड़ियों और उत्तर भारतीयों पर अपनी धौंस जमाना शुरू की। हालांकि जब पानी सिर से गुजरने लगा तो इंदिरा गांधी ने ठाकरे का कान उमेठा, लेकिन उनके स्वर्गवास और राम मंदिर मुद्दे के उछलने के बाद ठाकरे को अपना नाम चमकाने का एक और मौका मिला। ठाकरे कंपनी ने अल्पसंख्यकों के विरुध्द मुंह खोला, धर्म के नाम पर सत्ता प्राप्ति का सपना देखने वाले कुछ लोगों ने उनसे हाथ मिलाकर उन्हें और मजबूत किया।  यह और बात है कि ठाकरे कभी इस परिधि से बाहर नहीं निकल सके। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान तो मिली पर महाराष्ट्र के बाहर शिवसेना का कोई वजूद नहीं बना सके। हमेशा इसी डर के साए में जीते रहे कि कहीं महाराष्ट्र में उन्होंने जो बनाया है वह बिखर न जाए। उसी नीति पर उनके भतीजे राज ठाकरे चल रहे हैं।

               राज ठाकरे ने जिस दिन से महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का गठन किया है, उनके निशाने पर उत्तर भारतीय हैं। हिंदी पट्टी से उनकी नफरत वास्तव में नफरत नहीं है, यह स्वार्थ की हवस है जो देश को तोड़कर, उसे नुकसान पहुंचाकर भी पूरी करने का प्रयास किया जा रहा है। हो सकता है कि राज ठाकरे आगे चलकर और इस तरह के कुकृत्य करें, क्योंकि उनके पैर अभी तक पूरी तरह महाराष्ट्र की राजनीति में जमे नहीं हैं, और शिवसेना भी एक बार फिर अपनी शैशवकाल की राजनीति में वापस आ जाए, क्योंकि राज ठाकरे की नफरत नीति का उस पर भारी पड़ने का डर है। हालांकि यह डर दोनों ओर दिखाई दे रहा है। आजकल उध्दव और राज ठाकरे के बीच मेल-मुलाकात होने लगी है, कयास लगाए जा रहे हैं कि शिवसेना और मनसे का विलय भी हो सकता है, क्योंकि दोनों की राजनीति का एक ही आधार है, मराठी मानुष। उनकी पकड़ बनी रहे इसलिए जब-जब मौका मिलता है वे इस मुद्दे को सुलगाकर अपनी राजनीतिक जमीन पकाने लगते हैं। या यूं कहें कि जब यह डर पैदा होता है कि अब पैर उखड़ जाएंगे इस मुद्दे पर गुंडागर्दी शुरू हो जाती है।

               उद्योगपति मुकेश अंबानी, अभिनेता अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर आदि ऐसे लोग हैं, जो सिर्फ इसलिए ठाकरे खानदान के अपशब्दों के शिकार हुए हैं क्योंकि इन्होंने मुंबई को मराठी मानुष की बापौती न मानकर सारे देश की आर्थिक राजधानी माना। चूंकि इन सख्शियतों की बात का असर व्यापक होता है, इसलिए मारे डर के ठाकरे साहब ने सबको धमकाना शुरू कर दिया। हालिया मुंबई हिंसा के बाद भी जब राज ठाकरे ने मराठी मुद्दे पर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश की और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आइना दिखाया तो बड़े ठाकरे भड़क गए। और जैसा कि मैंने कहा कि डरा हुआ व्यक्ति आक्रामक होता है, तो बड़े ठाकरे ने बजाए सच स्वीकार करने या सच बताने के अपशब्दों का प्रयोग शुरू कर दिया। हालांकि बाद में पोल खुल गई और इतना ही नहीं यह भी उजागर हो गया कि अपने पूर्वर्जों के प्रति ठकारे खानदान में कितना सम्मान है जो डेढ़ सौ साल से खानदान के किसी सदस्य ने अपने पुरखों को पानी तक नहीं दिया।  खैर पंडों की इस बात में इसमें कितनी सच्चाई है पता नहीं लेकिन इस खुलासे के बाद ठाकरे परिवार का मुंह सिल गया है, इसके उलट अपने परिवार और अपनी माटी के प्रति अपनी कृतघ्नता को ढंकने के लिए ठाकरे साहब उस भाषाई स्तर तक पहुंच गए हैं, जहां सड़क छाप लोग पहुंच जाते हैं। ताजा इंटरव्यू में उन्होंने बताया है कि कांग्रेस महासचिव के पूर्वज कैसे थे और ठाकरे खानदान कितना शूरवीर थे। लेकिन वे यह बताते वक्त यह भूल गए कि उनकी अपनी शूरवीरता कभी मुंबई के बाहर नहीं निकली और आगे जिस तरह की राजनीति करने पर वे उतारू हैं कभी निकलेगी भी नहीं। राज ठाकरे अपनी गुंडा टीम के साथ केवल छात्रों और छोटे-छोटे धंधे करके अपने पेट पाल रहे लोगों के साथ मारपीट कर खुद को खुदा साबित करने में लगे हैं, और उद्दव ठाकरे आज तक यह साबित नहीं कर पाए कि वे नेता हैं भी या नहीं।

                मराठी मानुष के बाद यदि इनके पास कोई मुद्दा है तो हिंदुत्व का। पर मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह निरा ढोंग है। क्योंकि गहराई से देखें तो हिंदू और हिंदुत्व से प्रेम करेगा वह उत्तर भारतीयों के संरक्षण की बात करेगा न कि उन्हें बीमारी बताएगा। ठाकरे और इनकी तरह तथाकथित हिंदुत्ववादी जिस अस्मिता, सम्मान, संस्कृति, परंपराओं, विकास, कला और सृजन की बात करते हैं, वास्तव में उसके वाहक हिन्दी भाषी यानि उत्तर भारतीय ही हैं। देश हो या परदेश अपने गीता अथवा रामायण के गुटके के सहारे इन्हीं हिन्दी भाषियों ने तमाम दुख तकलीफों के बावजूद उस संस्कृति को जिंदा रखा है जिसकी पूजा और सम्मान आज भी दुनिया करती है। इतिहास साक्षी है जब भी भारत-भारतीयता पर किसी तरह का संकट आता है, देश अपने इस भू-भाग की तरफ देखता है। लेकिन जब सुफल चखने की बात आती है, तो उत्तर भारत को हाशिये में धकेल दिया जाता है। किनारों पर बैठे लोग लड़-झगड़ कर अपना हिस्सा ले लेते हैं, और हिंदी पट्टी के हिस्से आती है दीनता और गरीबी। बावजूद दुनिया के जिस भी कोने में उत्तर भारतीय पहुंचे, उन्होंने भारतीय संस्कृति को बचाए रखा। वे मॉरिशस गए, फिजी गए, ट्रिनिडाड-टुबैगो गए। लेकिन कभी अपनी जड़ों से कटे नहीं। तमाम अभावों और परेशानियों के बावजूद उन्होंने अपनी भाषा, संस्कृति और परंपरा को बचाए रखा। एक अकेले रामायण या गीता का गुटका उनके जीवन का संबल बना। आज यदि देश से बाहर भारतीय संस्कृति का कोई अस्तित्व है, तो उसे इस स्थिति तक पहुंचाने में उत्तर भारतीयों का सबसे बड़ा योगदान है। और रही मुंबई के विकास की बात तो जिस मुंबई और मुंबई के जिस विकास और ग्लैमर की बात की जा रही है उसमें वास्तव में मुंबई वासियों की कोई गिनती नहीं है। ठाकरे जैसी नफरनत की नीति के कारण यह विकास धुंधला ही पड़ सकता है। बालीबुड की गुजरात पलायन की खबरें शुरू हो गई हैं। कई व्यवसायी भी मुंबई छोड़ने का इरादा जता चुके हैं। इसलिए यह मुंबई वासियों को सोचना है कि उन्हें किसका साथ देना है। मुंबई जिस चमकदमक पर इतराता है उसमें बड़े व्यवसायियों में पारसियों की संख्या सर्वाधिक है। शेयर बाजार पर गुजरातियों का कब्जा है। कस्टम, सेंट्रल, एक्साईज और इनकम टैक्स विभाग के 70 प्रतिशत अधिकारी बिहार के हैं। बॉलीबुड में पंजाबियों का प्रभुत्व है। तकनीशियनों में 25 प्रतिशत उत्तर भारतीय हैं। निर्माण उद्योगों में उत्तर प्रदेश व बिहार के लोगों का हिस्सा 30 प्रतिशत से अधिक है। सुरक्षा गार्ड की भूमिका में बिहार व उत्तर प्रदेश के लोग 40 प्रतिशत से अधिक है। निजी स्कूलों के अधिकांश संचालक उत्तर प्रदेश के हैं। दूध व्यवसाय में 75 प्रतिशत से अधिक उत्तर प्रदेशी हैं। खोमचा लगाने वालों में बिहार व उत्तर प्रदेश के लोगों का हिस्सा 50 प्रतिशत है। अपने-आप को पढ़े लिखों की राजधानी और आईटी का आका समझने वाले मुंबई, बैंगलूर, कर्नाटकियों को यह पता ही नहीं है उनकी यह हैसियत भी हिन्दी भाषियों के कारण है। यहां हजारों की संख्या में पढ़े लिखे नौजवान अपनी सेवाएं दे रहे हैं। हां इन हिन्दी भाषियों का दुर्भाग्य है कि देश को 6-6 प्रधानमंत्री देने के बाद यह पिछड़े क्षेत्र के कहे जाते हैं। लेकिन यह क्षेत्र पिछड़ इसलिए है क्योंकि यहां रहने वालों की मेहनत, हुनर और इनकी जीवटता का उपयोग पूरे देश ने किया पर इनके विकास की चिंता किसी ने नहीं की।

? विवेकानंद