संस्करण: 17  अक्टूबर- 2011

केन्द्र सरकार के अच्छे कार्यों को अन्ना करें सलाम!            

? डॉ. सुनील शर्मा

               सूचना के अधिकार के नाम पर भी केन्द्र सरकार को बदनाम करने की साजिश की जा रही है। हवाला दिया जा रहा है कि भ्रष्टाचार के खुलासे से भयभीत मंत्रीगण इसकी धार को कुंद करने के लिए इसमें संशोधन करवाना चाहते हैं। जबकि खबर यह है कि आम आदमी और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती को प्रदर्शित करने वाले इस अधिकार को केन्द्र की कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने पहले से अधिक मजबूती प्रदान की है अभी हाल ही में इस अधिकार में नया संशोधन कर व्यवस्था दे दी की सूचना के अधिकार के आवेदनकर्ता की मौत के बाद भी उसके द्वारा मॉगी गई जानकारी को आम जनता के बीच रखा जाएगा और उसे सरकारी बेबसाइट पर डाल दिया जाएगा वास्तव में भ्रष्टाचार के हो हल्ले के बीच केन्द्र सरकार का यह सराहनीय और साहसपूर्ण कार्य है जो आम आदमी को भ्रष्टाचार का विरोध करने में संबल प्रदान करेगा है और सूचना के प्रवाह को निरंतरता प्रदान करेगा। उल्लेखनीय है कि यूपीए सरकार ने अक्टूबर 2005 में देश के नागरिकों को सूचना का अधिकार नामक अमोघ अस्त्र दिया था। जबसे यह अधिकार देश से भ्रष्टाचार निवारण का एक महत्तवपूर्ण औजार बन गया। इसके सहारे आम आदमी की पहुॅच सरकारी कार्यालयों की फाइलों के  हर एक पन्ने तक हो गई। पहले जिस आफिस में आम आदमी को यह कहकर दुत्कार दिया जाता था कि यह सरकारी कागज है तुम्हारे काम का नहीं हैं,बाहर हो जाओं यहॉ से लेकिन इस अधिकार ने ये सारे दुराग्रह तोड़कर आम आदमी को बलशाली बना दिया। इसके बाद सूचनाओं का जो प्रवाह सरकारी फाइल से आम आदमी तक प्रारम्भ हुआ तो सरकारी बाबुओं के अनेक काले कारनामें आम हुए,भ्रष्टाचार के प्रकरण सामने आए। सरकारी बाबुओं ने इसमें अनेक अड़ंगे खड़े करने के प्रयास किए, यहॉ तक कि सूचना के अधिकार का उपयोग करने वालों की हत्या होने लगी शायद मौत के भय से सूचनाओं का प्रवाह रूक जाए। लेकिन केन्द्र सरकार के इस कदम से भ्रष्टाचारियों पर नकेल और सख्त होगी तथा सूचना के अधिकार का उपयोग कर्ताओं को संबल मिलेगा। वास्तव में भ्रष्टाचार के विरोध में हुकांर भरने वाले अन्ना और रामदेव को इस काम के लिए केन्द्र सरकार को सलाम करना चाहिए। अब चूॅकि बिजनेसमेन रामदेव की समझ और राजनीति तो आम आदमी के सामने आ चूकी है अत:उनसे ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती वो इसकी प्रशंसा करे लेकिन अन्ना स्वयं अच्छे जनसेवक रहें है, सूचना के अधिकार को लागू करवाने मे कहीं न कहीं उनका भी योगदान रहा है। उनसे उम्मीद की जाती है कि वो इसकी अच्छाई स्वीकार करते और इसे आम आदमी के बीच प्रचारित करते, क्योंकि देश में जनलोकपाल जैसा तंत्र तब ही प्रभावी हो सकता है जबकि सूचनाओं का अबाध प्रवाह बने। लेकिन अन्ना की यह हुंकार कि जनलोकपाल के लिए कांग्रेस को पराजित करो उनके राजनैतिक मंतव्य को ही प्रदर्शित करता है, इससे स्पष्ट है कि राजनीति से लोकनीति की बात करने वाले अन्ना भी लोकनीति को भूल राजनीति करने लगें हैं और अपने जनसमर्थन के बूते सरकार को ब्लैकमेल करने का अलोकतांत्रिक कार्य कर रहें हैं।

                वास्तव में संविधाान और संसदीय प्रक्रियाओं में तनिक भी जानकारी रखने वाला आम आदमी भी यह जानता है कि कानून का निर्माण एक लम्बी और जटिल प्रक्रिया होती है इसे ब्लैकमेल के जरिए नहीं कराया जाना चाहिए। इसके लिए व्यापक चिंतन की आवश्यकता होती है इसके लिए संसद में बहस होती है आमराय बनाई जाती है लोगों के सुझाव लिए जाते है। भ्रष्टाचार निवारण के लिए बन रहे कानून में भी आम आदमी के सुझावों पर गौर करना जरूरी है, क्योंकि  सवा अरब आबादी वाले इस देश में हो सकता है कि टीम अन्ना से भी अच्छे सुझाव मिले जिनका उपयोग भ्रष्टाचार के खात्में में टीम अन्ना के जनलोकपाल से ज्यादा असरदार विधोयक की भूमिका तैयार कर सके। आखिरकार केवल टीम अन्ना के सुझावो को अंतिम मुहर क्यों लगाई जाए? टीम अन्ना जनमत संग्रह की बात करती है अंततोगत्वा यह प्रक्रिया देश के जिए घातक सिध्द होगी। जहॉ तक टीम अन्ना के अनेक सदस्यों द्वारा चलाए जा रहे स्वयंसेवी संगठनों को भारी मात्रा मेंअमेरिकी चंदे मिलने की पुष्टि से स्पष्ट है कि आम आदमी को भ्रष्टाचार निवारण के नाम पर बहलाकर उसकी ताकत का दुरूपयोग ही किया जा रहा है। जहॉ तक स्वयं अन्ना की बात है तो वो कई जनआंदोलनों के नेता रहे है,सारे देश में सूचना का अधिकार लागू होने के पूर्व ही यह अन्ना की पहल पर महाराष्ट्र एवं म.प्र. में लागू किया था। म.प्र.में इसे लागू करने काम दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ही किया था। आज अन्ना दिग्विजय सिंह के आलोचक है लेकिन अपने कार्यकाल में अन्ना के अच्छे कार्यों को लोकनीति में सर्वप्रथम जगह देने वाली दिग्गी सरकार ही थी। चाहे अन्ना का पानी रोको अभियान हो या फिर सूचना का अधिकार सर्वप्रथम म.प्र. में लागू किया गया था। अन्ना की प्रेरणा से ही म.प्र. के मलगॉव में उस समय कुछ अच्छे काम किए थे। दिग्विजय सिंह के भाषणों में भी अन्ना के कार्यों को पर्याप्त महत्व मिलता था, 26 जनवरी 2001 में म.प्र. के सीहोर जिले के दोराहा कस्बे में दिग्विजय सिंह का भाषण सुनने का अवसर मुझे मिला था जिसमें उन्होंने आम नागरिकों से अन्ना के आदर्श अपनाने का आव्हान किया था।वास्तव में अन्ना के अच्छे काम हम सब के लिए प्रेरणादायी है और वो देश के टिकाउ विकास में सहायक हो सकते है लेकिन किसी विशेष मकसद के लिए जिद उनकी गरिमा को समाप्त करती है और देश को एक अच्छे तंत्र से भी वंचित रख सकती है। फिर उनका राजनैतिक आग्रह या कहें दुराग्रह लोकतंत्र की गरिमा को आघात पहुॅचाने वाला है। और अब जब अन्ना सरकार के कार्यो पर नजर रख रहें हैं तो उन्हें सरकार के लोककल्याणकारी कार्यों की प्रशंसा भी करनी चाहिए संत की तरह निरपेक्ष होकर।

 
? डॉ. सुनील शर्मा