संस्करण: 17  अक्टूबर- 2011

आखिर क्यों ?

खाद्यांन संकट और मंहगाई :

? जगदीश खातरकर

               विश्व खाद्य दिवस के अवसर पर हमारे देश सहित पूरे दुनिया मे संगोष्ठीयों का आयोजन हो रहा है। कई संस्थानो के द्वारा बडे जोर शोर से प्रदर्शनिया लगाई जा रही है, जो किसी मेले से कम नही आंका जा सकता है। बम्बई में अन्नपूर्णा संस्थान द्वारा 16 से 18 नवम्बर तक विशाल कार्यक्रम का आयोजन रखा गया है जिसमें लगभग 250 से अधिक प्रर्दशनियां लगने का अनुमान है तो वही इस भव्य कार्यक्रम में लगभग 8000 से अधिक लोग भाग लेगे।

                बात विश्व खाद्य दिवस को मनाने तक ही सीमित नही है सवाल उठता है कि इस दिवस को मनाने का क्या औचित्य है ?इसकी क्यो आवश्यकता पडी है ?आज हमारे देश में भयानक खाद्यान्न संकट बना हुआ है,बाजार मे खाद्यानो के भाव आसमान छू रहे है,ऐसा कोई दिन नही होता है,जिस दिन हमें अखबारो,टी.वी. चैनलो रेडियों पर खाद्यानों के भाव बढने की खबरे देखने सुनने पढने को नही मिलती होगी। हमारा देश कृषि प्रधान देश है यहां पर्याप्त मात्रा में खांद्यानों का उत्पादन हो रहा है। हमारे देश की 75 प्रतिशत जनता कृषि आधारित रोजगार पर आश्रीत है तो वही देश की 25 प्रतिशत जनता उद्योंगो पर आश्रित है लेकिन अगर गौर किया जाये तो उद्योगो को प्रदाय होने वाला कच्चा माल कृषि से ही प्राप्त होता है। फिर भी इस तरह की खाद्यान समस्या देश में बनी रहना चिंता का विषय है।

               हमारे कृषि प्रधान देश में 34 लाख से अधिक किसान कर्ज के बोझ तले दबे हुए है इसकी संख्या सबसे अधिक महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश प्रातं में है। देश में हजारो के तादात में किसान कर्ज से पीड़ित होकर आत्महत्या कर रहे है गरीबी, भूखमरी, एवं बेरोजगारी के कारण मौते हो रही है अगर इस संबध में मीडिया में बात उजागर हो जाये तो सरकार अक्सर इस पर अपना दामन बचाते हुए लीपापोती कर देती है।

               सरकार द्वारा गरीबो को सस्ते दामो में अनाज उपलब्ध कराने के लिये फूड सिक्योंरिटी बिल को मंजूरी दी गई है। इस योजना के अन्तर्गत गरीबो को सस्ते दामो में अनाज उपलब्ध कराना है, लेकिन क्या इस बिल के माध्यम से गरीबो को सस्ते दाम में अनाज उपलब्ध हो पायेगा ? संभव नही है। प्रावधान रखा गया है कि इस बिल के माध्यम से केन्द्र सरकार हर राज्य में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगो कि संख्या के आंकडे तय करेगा एवं उन आकंडों के अनुसार राज्य सरकार को राशन उपलब्ध कराया जायेगा, और राज्य सरकार की जवाबदारी होगी की जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार को 25 किलोग्राम राशन अनिवार्य रूप से मुहैया कराये।

               अब बात आती है गरीबो की तो अभी हाल ही गरीबी रेखा के सबंध में सुरेश तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट को ले कर पूरे देश में बहस छिंडी हुई है तेदूलकर समिति के सिफारिषो के आधार पर योजना आयोग द्वारा उच्चतम न्यायालय में हलफनामा दायर कर कहा गया कि शहरी क्षेत्र में 32 रूपये खर्च करने वाला व्यक्ति और ग्रामीण क्षेत्र में 26 रूपये खर्च करने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा की श्रेणी में नही माना गया है। विचारनीय प्रश्न है कि क्या वास्तव मे यह संभंव है। जिस तरह से पोषण वैज्ञानिक सुखात्में ने यह अवधारणा दी कि शहरी क्षेत्र के प्रति व्यक्ति को एक दिन मे 2400 कैलोरी एवं ग्रामीण क्षेत्र के प्रति व्यक्ति को 2100 कैलोरी कि आवश्यकता होती है गरीबो के संबध में योजना आयोग,तेदूलकर समिति,विश्व बैक एवं अन्य सभी के द्वारा अलग अलग अपने अपने आंकडे बताये गये है। आत्ममंथन करने वाली बात है कि हमारे देश में गरीबो के कल्याण के नाम पर उनका मजाक उडाया जा रहा है,गरीबी खत्म करने के बजाये गरीबी के मापदण्ड का आंकलन किया जा रहा है, उन्हे 32 रूपये या 30 रूपये या 40 रूपये से उन्हे क्या मतलब है ? सरकार लाखो करोड़ो में खांद्यानो पर सब्सिडी दे रही है फिर भी खाद्य पदार्थो के भण्डारण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की बदहाली किसी से छिपी नही है। रासायनिक खादो पर कम्पनीयों को सरकार द्वारा करोडो में सब्सिडी दे जा रही है ताकि किसानो को सस्ते दामो पर खाद उपलब्ध हो सके किन्तु क्या किसानो को उसका सही लाभ मिल पा रहा है ? नही। फिर भी समस्या ज्यो के त्यो ही बनी हुई है।

               खाद्यान संकट के साथ ही दुसरी ओर देश मे कुपोषण की समस्या कुछ कम नही है। इसके भी आंकडे कम होने के बजाय बढते ही जा रहे है। अगर आकडों कि ओर ध्यान दिया जाये तो देश में लगभग 10लाख गर्भवती महिलाओ एवं बच्चों की मौत कुपोषण से हो चूंकी है। सरकार की घोषित पोषण परिषद का गठन आज तक नही हो पाया है। देश में लगभग 133000आंगनवाडी केंन्द्रो की कमी बनी हुई है यह कमी उन्ही क्षेत्रो में बनी हुई है,जहां कुपोषण के मामले सबसे अधिक मात्रा मे पाये गयें है। सरकार को इस बात से अनभिज्ञ नही होना चाहीए की कई जगहो पर पोषण आहार आंगनवाडी केन्द्रों में सड रहा है अथवा खुले बाजार बेच दिया जाता है। जो पशुओं के चारे के रूप में उपयोग किया जा रहा है। अगर खास तौर पर देखा जाये तो हमारा देश कुपोषण के मामले में निष्क्रिय दिखाई पडता है।

               अब बाजार कि ओर रूख किया जाये तो स्थिति और भी विकराल नजर आती है। आज हमारे देश की आर्थिक विकास दर 07 प्रतिशत के आस पास है लेकिन अगर आर्थिक एवं राजनैतिक माहौल में सुधार नही हुआ तों निश्चित रूप से वह दिन भी दुर नही है, जो अपनी परम्परावादी विकास दर 5 या 6 प्रतिशत रह जावेगी। हाल ही रिजर्व बैक द्वारा मौद्रीक उपाय के तहत की गई ब्याज दरो में बढोतरी भी मंहगाई को रोकने में विफल रहा है। व्यापारियो द्वारा अधिक मुनाफे के लिये अक्सर खांद्यानो में अनेक तरह से मिलावट कर बेचा जाता है। मसालो में कलर ,ग्रिडस ऐडड कलर सस्पेंसेस मेटर आइल और न जाने क्या क्या डाला जाता है। आज बाजार में दाल चावल आटा और पेय पदार्थो में मिलावट नही हो इसकी कोई ग्यारंटी नही है। इन सब कारणो से उपभोक्ताओ को अनेक व्याधियों का सामना करना पड रहा है। ताकत बढानें के लिये बाजार में कई ऐसे पेय पदार्थ एवं दवाईयां बिक रहे है जो हमारे यहां प्रतिबंधित है अथवा चिकित्सक के परामर्श से दी जाती है। किन्तु बिना किसी रोक टोक के बाजार में यह दवाएं पेय पदार्थ आसानी से उपलब्ध हो रही है इसके पीछे मूल कारण है कि हमारे यहां रोक थाम के लिये कोई कठोर कानून नही है, जिससे यह अवैधानिक काम धडल्ले से चल रहे है।

                हाल ही लोकसभा में नियम 184 के तहत महंगाई पर चर्चा हुई लेकिन यह सिर्फ कलात्मक भाषण बाजी की भेट चढ गई। यह महगाई पर चर्चा तब हो रही थी जब देश में अनाज का रिकार्ड उत्पादन हुआ है। सरकारी गोदाम अनाज से लबालब भरे हुए है,गोदामो में अनाज रखने के लिये जगह नही है,गोदामो के बहार सडको पर खुले आसमान के नीचे अनाज रखा जा रहा है जो सही समय पर रख रखाव नही होने के कारण सड भी रहा है इसी चर्चा के दौरान हमारे देश की विपक्ष पार्टी के नेताप्रतिपक्ष सदन से उठकर बहार चले जाते है। इसे एक विडम्बना ही कहा जाये कि सरकार को जो करना है वह कर रही है, लेकिन क्या हमारा विपक्ष भी कमजोर पडा हुआ है। किसी ने ठीक ही कहा है कि अच्छी सरकार के लिये मजबूत विपक्ष की आवश्यकता होती है। लेकिन अपने यहां वह भी संवेदनशील नही है। हमारा देश खाद्यान उत्पादन में दुनिया में दुसरा सबसे बडा देश है फिर क्यों हमारे यहां खाद्यानों के दाम आसमान छू रहे ? हम खाद्यान संकट से क्यों जुझ रहे है ? इसकी क्या वजह है ? अपने देश के नेता अपने स्वार्थ पूर्ती के लिये सडकों पर उतरकर हो - हल्ला मचा रहे है इससे क्या होने वाला है ? यह सिर्फ वोट बैक की राजनीति है। इन्हे चाहीए कि एकजुटता के साथ कोई सार्थक हल खोजे। हमारे यहां कई वर्षो से उत्तरप्रदेश का बुदेलखण्ड क्षेत्र एवं उडिसा के कुछ जिले अकाल ग्रस्त है, वहां पर्याप्त खाद्यान नही मिल पा रहा है, वहां के लोगो को भुखमरी का शिकार होना पड रहा है, लेकिन एक ओर सरकार के गोदाम अनाज से लबालब होने के बाद भी सडको पर अनाज सड रहा है। इससे पता चलता है कि हमारी सरकारे कितनी जनता के प्रति संवेदनशील है। अगर सरकार के प्रति कोई विरोध प्रदर्शन धरना आंदोलन करते है तो आम तौर पर सरकारे दबाव की नीति अपनाकर विरोध को नियंत्रित कर लेती है अथवा अपने परम्परागत तरीके से कोई कमेटी या आयोग गठीत कर अपने कतव्यो की इति श्री कर देते है। इससे सरकारो को एक फायदा होता है कि लोग धीरे धीरे असल मुददे को भूल ही जाते है।

               महंगाई एवं खाद्यान्न संकट से निपटने के लिये यह उचित होता कि अनाज का नया स्टांक आने के पूर्व बाजार में उतार दिया जाता, तथा पूराना स्टांक वहां भेज दिया जाता जहां गरीब और जरूरतमंद लोगो को आवश्यकता है ताकि काफी हद तक अनाज सडने से तो बचाया जा सकता था।  साथ ही हमारे पूराने भंडार गृह है उनकी मरमम्त कि जावे, जहां पर्याप्त मात्रा में अनाज भण्डार गृह नही है रखरखाव की सुविधाा नही हो वहां समुचित मात्रा में नये भण्डार गृहों का निर्माण करवाया जावे। इसके बावजूत भी अगर अनाज बचता है, तो उससे तत्काल अकालग्रस्त क्षेत्रो में गरीबो, वंचितो मे वितरीत करवा दिया जाये। अनाज वितरण व्यवस्था संतुलित किया जाना चाहीए।आम सहमति से केन्द्र व राज्य सरकारे नयी खाद्यान्य नीति बनाये।  मंहगाई एवं खाद्यान्य संकट का मूल कारण जमाखोरी ,कालाबाजारी ही नही है, इसके लिये खूले आसमान में अनाज का सडना और फिर उसे दफना देना, अपनी उपज का सही भण्डारण नही कर पाना तथा सरकार जो नीति या योजना बनाये उसका सही क्रियान्वयन व सतत मूल्याकंन नही हो पाना तथा वायदा कारोबार भी एक मूल कारण है।

               तीसरी ओर हमारी सरकारे किसानो की हितैषी होने का दम भरती है अभी हाल ही केन्द्र सरकार द्वारा 117 साल पुराने भूमि अधिगृहण कानुन में बदलाव किया जा रहा है। क्या संशोधित कानून में किसानो के लिये कुछ विशेष प्रावधान किये गये है ? किसानो की जमीन अधिगृहित कर उद्योग स्थापित किये जायेगे। खैर किसान को अधिगृहित जमीन के एवज में नौकरी का प्रावधान रखा गया है अथवा पाँच लाख की राशि मुआवजे के तौर पर दिया जायेगा। विचारनीय है कि जिस किसान के लिये जमीन पीढी दर पीढी उसके रोजगार का एक मात्र सहारा है उसको अधिगृहीत कर उद्योग एवं शांपिग माल की स्थापना कि जायेगी। लेकिन उस किसान को उसके परीवार को नौकरी या पांच लांख की राशि कितने वर्षो, दिनो तक सहयोग करेगी। हमें भूलना नही चाहीए पश्चिम बगांल के सिंगुर विवाद को। हांलाकि नये बिल में वैकल्पिक रोजगार का प्रावधान है लेकिन उसमे किसी प्रकार की बाध्यता परिलक्षित नही होती है, और वह रोजगार पीढी दर पीढी सहारा दे इसकी कोई ग्यारंटी नही है।

? जगदीश खातरकर