संस्करण: 17  अक्टूबर- 2011

बदहाली की कगार पर मध्यप्रदेश

? महेश बाग़ी

               मधयप्रदेश बदहाली की कगार पर है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आत्ममुग्ध होकर व्यर्थ की नौंटंकियों में व्यस्त हैं और प्रदेश अधयक्ष प्रभात झा मुंगेरीललाल की तरह हसीन सपने देख रहे हैं। प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति सबके सामने हैं। हत्या, लूट, बलात्कार और डकैती की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। नौकरशाही बेलगाम हो चुकी है। सरकार ख़जाना पहले से ही खाली है और कर्ज का भार लगातार बढ़ता ही जा रहा है। प्रदेश में भ्रष्टाचार का यह आलम है कि अदने से सरकारी कर्मचारी भी करोड़ों के आसामी निकल रहे हैं। प्रदेशभर की सड़कें बर्बाद हो चुकी है, जिससे उद्योग-धंधों के साथ पर्यटन पर भी बुरा असर पड़ रहा है। उधार मुख्यमंत्री नित नई घोषणाएं कर घोषणावीर का खिताब पा चुके हैं और संगठन के नुमाइंदे अयाशी में लिप्त हैं। कारुलाल सोनी से लेकर तरुण विजय तक सैकड़ों उदाहरण सामने हैं।

               मुख्यमंत्री सरकार की पारदर्शिता का ढोल पीटते हुए खुद को जनता का सेवक कहते नहीं अघाते हैं, लेकिन लोक सेवकों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। चौहान कई बार निर्देश दे चुके हैं कि कलेक्टर कमीश्नर गांवों में जाकर रात बिताएं, मगर चंद अपफसरान ने ही इसका पालन किया। शेष मुख्यमंत्री के निर्देश को घोल कर पी गए। कमीश्नर-कलेक्टर कांफ्रेंसिंग के दौरान जनसंपर्क विभाग ने मुख्यमंत्री को हीरों की तरह पेश किया,लेकिन वास्तविकता यह है कि इस कांफ्रेंसिंग के दौरान नौकरशाही ने मुख्यमंत्री को गुमराह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कांफ्रेंसिंग में अफसरान ने प्रगति के जो आंकड़े पेश किए,उनमें से आधे भी सच होते,तो मधयप्रदेश देशभर में नंबर वन होता। दरअसल मुख्यमंत्री नौकरशाही के आगे बेबस हैं। इसीलिए वे उनके झूठ पर भी उनकी पीठ थपथपाते रहे। कांफ्रेसिंग में सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर सतत निग़ाह रखने के निर्देश को भी नौकरशाही ने हवा में उड़ा दिया। यही वजह है कि राशन का अनाज, शकर, घासलेट, काले बाजार में जा रहा है और ग़रीब दर-दर भटक रहे हैं।

               आम जनता में थोथी वाहवाही लूटने के लिए शिवराज सिंह घोषणा तो कर देते हैं, लेकिन उनके पालन पर नज़र नहीं रखते हैं। कई बार तो वे मुद्दों से हट कर व्यर्थ की भाषणबाजी करने लगते हैं। भोपाल में आयुर्वेदिक नेत्र चिकित्सालय के उद्धाटन के दौरान भी ऐसा ही हुआ। वहां बीएएमएस के छात्रों ने भाजपा के घोषणापत्र की याद दिलाते हुए मांग की कि गांवों में आयुर्वेद डॉक्टर पदस्थ किए जांए, आयुर्वेद डॉक्टरों के रिक्त पद भरे जाएं और आयुर्वेद कॉलेज तथा अस्पताल खोले जाएं। उद्धाटन समारोह के भाषण में मुख्यमंत्री ने इनमें से एक भी चुनावी घोषणा का ज़िक्र तक नहीं किया। इससे समझा जा सकता है मुख्यमंत्री और भाजपा अपनी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र के प्रति कितने गंभीर हैं।

               प्रदेश में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि तृतीय श्रेणी का कर्मचारी भी करोड़ों का मालिक बन बैठा है। आयकर विभाग की छापामार कार्रवाई से अधिकारियों और नेताओं में खौफ है। यही कारण है कि अपनी आय छिपा कर काला धन एकत्र करने वाले ये लोग अब खुद आगे बढ़ कर टैक्स जमा कर रहे हैं। मौजूदा वित्तीय वर्ष में 815करोड़ रुपए आय कर जमा होना इसका प्रमाण है। इसमें सबसे ज्यादा कर अफ़सरों नेताओं ने जमा करवाया है। बीते कुछ सालों में आय कर विभाग ने नेताओं-अफसरों पर जो शिकंजा कसा है, उससे इस वर्ग में घबराहट है। आईएएस अरविंद-टीनू जोशी का हश्र वे देख चुक हैं। छापे की कार्रवाई के बाद नौकरी तो जाती ही है, समाज भी उनका अघोषित बहिष्कार कर देता है। छापों की जद में आए लोगों की यही स्थिति है। एक समय था,जब जोशी दंपति के यहां अफसरों का मजमा लगा रहता था और आज यह स्थिति है कि उनके फोन की घंटी यदा-कदा ही बजी है।

                राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली खुद मुख्यमंत्री अपनी आंखों से देख चुके हैं। सेंधवा बस कांड के घायलों को देखने वे जब इंदौर के एमवाय अस्पताल गए तो वहां आईसीयू में डॉक्टर जूते पहने पाए,जबकि यह नियम विरुध्द है। इसी अस्पताल की बर्न यूनिट में पिछले 45 दिनों में 75 मरीज़ भर्ती किए गए, जिनमें से 55 ने संक्रमण के कारण दम तोड़ दिया। ताज्जुब है कि इतनी मौतें होने के बाद भी सरकार ने कोई क़दम नहीं उठाया। दतिया में मुख्यमंत्री बेटी बचाओं अभियान की शुरुआत करने गए, जहां मंच के पास बैठी एक महिला अपनी बच्ची को दूध पिला रही थी, जिसे एक एएसपी ने थप्पड़ मार कर भगा दिया उस महिला ने खूब शोर-शराबा किया, लेकिन मुख्यमंत्री तक उसकी आवाज़ नहीं पहुंच सकी। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते कई प्रसूताएं अस्पताल परिसर और सड़कों पर प्रसव करने को मजबूर हुई, किंतु सरकार ने एक भी अधिकारी, डॉक्टर या नर्स के विरुध्द कार्रवाई नहीं की। इससे सरकार की जननी सुरक्षा और लाड़ली लक्ष्मी जैसी योजनाओं की पोल खुल गई है।

               कुल मिला कर प्रदेश में शासन-प्रशासन नाम की कोई चीज़ नहीं बची है। प्रदेश के मुख्यमंत्री नित नई नौटंकियों में व्यस्त है,अफसरशाही भ्रष्टाचार में लिप्त है और आम जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। सरकार के किसी भी महकमे में नज़र डाली जाए, तो वहां अराजकता की स्थिति नज़र आती है। इससे ऐसा लगता है कि मानो शिवराज सरकार ने प्रदेश का बंटाढार करने का प्रण लिया है और वह इस दिशा में निरंतर प्रगति कर रही है।


? महेश बाग़ी