संस्करण: 17  अक्टूबर- 2011

अन्ना हजारे भ्रष्टाचार से लड़ना चाहते हैं या कांग्रेस से?

? एल.एस.हरदेनिया

               पिछले कुछ दिनों में देश के राजनीतिक मंच पर कुछे ऐसी बातें हुई है जिनसे कई लोगों के चेहरे से नकाब उठ गये हैं।

               इस तरह की घटनाओं में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत का यह दावा शामिल है कि अन्ना हजारे के आंदोलन को न सिर्फ हमारा समर्थन था वरन् उसके संचालन में हमारे स्वयंसेवकों की प्रमुख भूमिका थी। जब से अन्ना हजारे का आंदोलन प्रारंभ हुआ था उस समय से ही यह आरोप लगाया जा रहा था कि उनके आंदोलन के पीछे आर.एस.एस. का हाथ था। इसी तरह का आरोप बाबा रामदेव के आंदोलन पर भी लगाया गया था। वैसे तो अनेक लोग यह आरोप लगा रहे थे परंतु अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महामंत्री श्री दिग्विजय सिंह यह आरोप काफी जोरदार तरीके से लगा रहे थे। अब चूँकि स्वयं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख ने यह दावा किया है कि उनके संगठन की अन्ना के आंदोलन में पूरी तरह भागीदारी थी। डॉ. भागवत के बयान के बाद दिग्विजय ने याद दिलाया कि वे यह बात पहले से कह रहे थे। उनके आरोप में कितना दम था यह अब डॉ. मोहन भागवत के बयान से सिध्द हो गया है। जब श्री दिग्विजय सिंह ने यह आरोप लगाया था उस समय अन्ना हजारे और उनके समर्थकों ने यह कहा था कि दिग्विजय सिंह का दिमाग खराब हो गया है और उनका उचित स्थान पागलखाना है। अन्ना की इस टिप्पणी को याद दिलाते हुए दिग्विजय सिंह ने अन्ना से पूछा कि क्या वे अब भी मुझे पागलखाना भेजना चाहेंगे?  

                 अन्ना और उनकी टीम की ओर से दो ऐसी बात की गई हैं जिससे उनके असली इरादे खुलकर सामने आ गये है। स्वयं अन्ना हजारे ने मतदाताओं से अपील की हैं कि अगले चुनाव में वे कांग्रेस को हराये। उन्होंने यह भी घोषणा की है कि भविष्य में जिस भी राज्य में चुनाव होंगे वे कांग्रेस के विरूध्द प्रचार करने जायेंगे। अन्ना हजारे के इस बयान से स्पष्ट हो गया है कि उनका असली उद्देश्य जन लोकपाल विधेयक पारित करवाना नहीं है परंतु कांग्रेस के हाथ से सत्ता छीनना है। ठीक यही इच्छा भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है। अन्ना टीम ने कांग्रेस को हटाने की न सिर्फ दिली इच्छा प्रगट की है वरन् मैदान में उतरकर कांग्रेस का विरोध करना भी प्रारंभ कर दिया है। हिसार के लोकसभा उपचुनाव में अन्ना टीम के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल ने कांग्रेस उम्मीदवार के विरूध्द प्रचार भी किया। उन्होंने अपने प्रचार के दौरान कांग्रेस के विरूध्द हर संभव आरोप लगाये है। यदि अन्ना टीम का मुख्य उद्देश्य देश से समग्र रूप से भ्रष्टाचार समाप्त करना है तो उसे उन कारणों को दूर करने की भी मांग करना चाहिये जो भ्रष्टाचार को पनपाते हैं। क्या मात्र कांग्रेस को हराकर भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा? क्या लोकपाल विधेयक पारित करने मात्र से भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा? क्या कांग्रेस अकेले भ्रष्टाचार के लिए उत्तरदायी है? क्या अन्य पार्टियाँ, नौकरशाह, औद्योगिक घराने, क्या बड़े-बड़े व्यापारी भ्रष्ट आचरण नहीं करते हैं? क्या कुछ आध्यात्मिक पुरूष भ्रष्ट आचारण नहीं करतें है? आवश्यकता है भ्रष्टाचार के विरूध्द समाज में आक्रोश पैदा करने की। आवश्यकता इस बात की है समाज में ऐसा वातावरण बनाया जाय जिससे भ्रष्टाचार के सहारे कुछ भी हासिल नहीं किया जा सके। अन्ना हजारे या जो भी भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने में दिलचस्पी रखते हैं उन्हें इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार कर एक ठोस कार्यक्रम बनाना होगा।

               अन्ना टीम न सिर्फ कांग्रेस के विरूध्द प्रचार कर रही है, उसे भ्रष्टाचार की एक मात्र जननी मानती है। उससे ऊपर अब तो अन्ना की टीम देश की संसदीय प्रणाली पर भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रही है। अभी हाल में अन्ना की टीम की तरफ से यह कहा गया कि अन्ना संसद से भी ऊपर है। इस देश के 120करोड़ निवासियों का प्रतिनिधित्व करने वाली संसद के ऊपर क्या किसी व्यक्ति या संगठन को रखा जा सकता है? हमारे देश के संविधान ने संसद को सर्वशक्तिमान माना है। हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी संसद की सर्वोच्चता को स्वीकारा है। इस तरह यह कहना कि अन्ना संसद से भी ऊपर है कहने वाले के अंहकार का प्रतीक है। हम किसी भी हालत में प्रजातंत्र को अस्थिर नहीं कर सकते हैं। अन्ना टीम को सत्ता की राजनीति से दूर रहना था। उस स्थिति में ही उनके आंदोलन की विश्वसनीयता कायम रहती।

               जहाँ भ्रष्टाचार के विरूध्द एक पुख्ता आंदोलन की आवश्यकता है वहीं संसदीय प्रणाली में भी कुछ बुनियादी सुधारों की आवश्यकता है। अन्ना की टीम को मतदाताओं के बीच जाकर यह समझाना चाहिए कि वे सोच समझ किसी उम्मीदवार को चुने। इसके साथ ही राजनीतिक पार्टियों पर भी दबाव बनाना चाहिए कि वे भी साफ सुथरें लोगों को उम्मीदवार बनाये। राजनीतिक पार्टियों को चाहिए कि वे जाति, सम्प्रदाय, धन और बल की ताकत से प्रभावित होकर उम्मीदवार न चुने। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जनप्रतितिनिधि अपने प्रभाव का उपयोग संपत्ति अर्जित करने में न करें। संसदीय प्रणाली में और भी कई खामियाँ हैं जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है। जैसे-जनप्रतिनिधियों के उस अधिकार को समाप्त किया जाना चाहिए जिसके रहते वे अपने वेतन भत्तों का निर्धारण स्वयं कर लेते हैं। दुनिया के दूसरे प्रजातंत्रो में इस तरह की व्यवस्था नहीं है। हमारे देश में जन प्रतिनिधियों को मिलने वाली पेन्शन के नियमों में भी सुधार की आवश्यकता है। अभी हमारे देश में 30 वर्ष आयु के पूर्व जनप्रतिनिधि को भी पेन्शन की पात्रता है। दुनिया के दूसरे प्रजातांत्रिक देशों में भी जन प्रतिनिधियों को पेन्शन मिलती है। पर उन देशों में जनप्रतिनिधियों को पेन्शन मिलना उस समय प्रारंभ होती है जब वे उस देश के सरकारी कर्मचारियों की पेन्शन की आयु प्राप्त कर लेता है। इस तरह ऐसे अनेक सुधार है जिन्हें लागू करने से हमारे देश के प्रजातंत्र की जड़े और मजबूत होगी। यदि अन्ना हजारे और उनकी टीम इन सुधारों के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन करेगी तो उसका सर्वत्र स्वागत होगा। परंतु सत्ता की राजनीति में टांग डालकर, चुनाव के दौरान एक ही पार्टी (कांग्रेस) के विरूध्द प्रचार करके अन्ना व उनकी टीम ने अपनी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है और लोगों के मन में उनेक असली इरादों के बारे में शंकाये पैदा कर दी है।

? एल.एस.हरदेनिया