संस्करण: 17  अक्टूबर- 2011

संदर्भ : संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट

मनरेगा में मनमानी

? जाहिद खान

                महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जैसा कि नाम से बजाहिर है, ग्रामीण बेरोजगारों के लिए सरकार द्वारा सामाजिक सुरक्षा भुगतान देने की योजना है। यह योजना साल 2006 से जब मुल्क में अमल में आई तो ग्रामीण भारत में कई अहमतरीन बदलाव देखने को मिले। मसलन-गांव से शहर की ओर बड़े पैमाने पर होने वाला मजदूरों का पलायन रूका,गांवों में ही नए-नए रोजगार सृजित हुए और इससे गांवों के अंदर बुनियादी ढांचा मजबूत हुआ। यहां तक कि उस वक्त जब कई विकसित यूरोपीय मुल्क अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंदी से जूझ रहे थे, तब मनरेगा ही थी जिसने भारत को आर्थिक मंदी से बचाया। लेकिन जैसा कि हमारे यहां हर अच्छी योजना के साथ होता है, मनरेगा में भी भ्रष्टाचार का घुन लगता चला गया। योजना में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां और अनियमितताओं के मामले सामने निकलकर आने लगे। कुछ स्वयंसेवी संगठनों के सर्वेक्षणों में ये घपले समय-समय पर उजागर हुए। खुद सरकार की ओर से कराए गए अधययन में भी कई राज्यों में शिकायतों की तस्दीक हुई। अब संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने मनरेगा की कड़वी सच्चाई बयान की है। हाल ही में आई समिति की 35 वीं रिपोर्ट में, योजना की समीक्षा करते हुए कहा गया है कि न तो योजना में मजदूरों को 100 दिन का रोजगार मिल पा रहा है और न ही पूरी दिहाड़ी।

                यशवंत सिन्हा की अधयक्षता वाली इस समिति ने योजना मंत्रालय की साल 2011-12 की अनुदान मांगों पर जारी अपनी रिपोर्ट में योजना के अंदर कई खामियां गिनाई हैं। मसलन-आवंटित बजट के उपयोग में कमी, रोजगार और पारिश्रमिक अनिवार्य स्तर तक देने में अक्षमता और शुरू किए गए कार्य पूरे न होना। मनरेगा में प्रावधान है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को एक वित्त वर्ष के अंदर कम से कम 100 दिन के रोजगार के मौके मुहैया कराए जाएं। जिससे कि उनकी जीविका को सुरक्षित किया जा सके। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो पाया ? आगे की कहानी यह रिपोर्ट बतलाती है। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2006-07 में योजना के तहत 100 दिन के बरक्स 43 दिन का रोजगार और 100 रूपए के बरक्स 65 रूपए की औसतन दिहाड़ी मिल पाई। वहीं 2007-08 में 42 दिन और 75 रूपए का औसत रहा, तो 2008-09 में 48 दिन और 84 रूपए की दिहाड़ी का औसत रहा। जबकि 2009-10 में 54 दिन और 90 रूपए की दिहाड़ी मिली। यह पूरे मुल्क का औसत आंकड़ा है। राज्यों और जिलों के हिसाब से देखें तो इन आंकड़ों में कुछ फर्क हो सकता है। मगर लक्ष्य से कम दिन का काम मिलने और निधर्ाारित मजदूरी से कम मजदूरी मिलना कमोबेश सभी राज्यों पर लागू होती है। यानी, योजना की स्थिति सभी राज्यों में एक जैसी है। खास तौर पर मजदूरी वितरण में ज्यादा गड़बड़ियां हैं।

                ऐसा नहीं है कि समिति ने मनरेगा में पहली बार इस तरह की खामियां गिनाई हैं, बल्कि इससे पहले भी उसने अपनी पिछली रिपोर्टों में मनरेगा से जुड़े कई चिंताजनक मुद्दों को उठाया था। ताजा रिपोर्ट में भी समिति ने सरकार का धयान कई चिंताजनक तथ्यों की ओर खींचा है। समिति ने बजट निधि के कम उपयोग और रोजगार एवं मजदूरी तय लक्ष्यों के अनुरूप उपलब्ध नहीं करा पाने के मुद्दों को विशेष तौर पर उठाया है। योजना के राष्ट्रव्यापी अवलोकन में समिति ने पाया कि साल 2006-07 में योजना के तहत जहां कुल उपलब्ध रकम 12,073.55 करोड़ रूपए थी, वहीं खर्च 8,823.35 करोड़ रूपए ही रहा। साल 2007-08 में मनरेगा के तहत कुल उपलब्ध राशि 19,305 करोड़ रूपए थी, उसमें से महज 15,856 करोड़ रूपए ही खर्च हुए। इसी तरह 2008-09 में उपलब्ध राशि 37,397 करोड़ रूपए के बरक्स 27,250 करोड़ रूपए और 2009-10 में उपलब्ध राशि 49,579 करोड़ के मुकाबले 37,905 करोड़ रूपए खर्च हो पाए। यानी, योजना के तहत आए पैसे का भी सरकार सही तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाई।

               यदि पैसे का सही तरह से इस्तेमाल होता तो जहां और भी नए रोजगार सृजित होते, वहीं हजारों लोगों की बेरोजगारी भी दूर हो जाती। गोया कि नौकरशाही की उदासीनता और लापरवाही से हर वित्त वर्ष में करोड़ों रूपए योजना में इस्तेमाल होने की बजाय लैप्स हो जाते हैं।

               बहरहाल, जरूरतमंद ग्रामीणों से किए गए कानूनी वादे की कसौटी पर ही नहीं, बल्कि उत्पादकता के हिसाब से भी योजना का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक योजना के तहत शुरू किए गए कार्यों की तुलना में पूरे हुए काम का औसत 50 फीसदी से भी कम रहा है। जाहिर है, यह एक ऐसा सवाल है, जिसका जबाव ज्यादा मुश्किल नहीं है। इस सवाल का जबाव योजना के क्रियान्वयन में छिपा हुआ है। दरअसल, योजना के क्रियान्वयन में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा होता है। जिसमें सरपंच-सचिव से लेकर जिला कलेक्टर तक शामिल होते हैं। यह फर्जीवाड़ा कई तरह से होता है। मसलन बहुत सी जगहों पर मजदूरों को काम तो कम दिया, मगर उनकी हाजिरी ज्यादा दिनों की दर्ज कर ली। सैंकड़ों मामलों में रजिस्टर में फर्जी नाम दर्ज कर ऊपर ही ऊपर पैसे का गोल-माल कर लिया जाता है। इसके अलावा कई राज्यों में मनरेगा के तहत आई रकम का बहुत बड़ा हिस्सा निर्माण सामग्री खरीदने और दीगर सरकारी खर्च में हो रहा है। जबकि कानून साफ-साफ कहता है कि मनरेगा के ज्यादातर पैसे का इस्तेमाल मजदूरों को मजदूरी के भुगतान के रूप में होना चाहिए। ऐसे में उत्पादकता की कसौटी पर योजना के खरी उतरने की उम्मीद बेमानी है।

               समिति ने अपनी रिपोर्ट में सरकार का धयान इस बात की ओर भी दिलाया है चूंकि मनरेगा गांवों में काम की कमी के दौरान ग्रामीणों को आजीविका के अनुपूरक साधान मुहैया कराती है। ऐसे में इसे मुख्य कृषि कार्यकलापों के लिए मजदूरों की कमी की वजह नहीं बनना चाहिए। यह बात सच भी है। मनरेगा के अमल में आने के बाद कई राज्यों के अंदर गांवों में खेती के लिए काम करने वाले मजदूरों की कमी पड़ गई। मजदूर अब खेती में रात-दिन खटने की बजाय मनरेगा में काम करना ज्यादा बेहतर समझते हैं। जिसका सीधा-सीधा असर कृषि उत्पादकता पर पड़ता है। यही वजह है कि समिति ने सरकार से कृषि उत्पादकता क्षेत्र में योजना के तहत सृजित परिसंपत्तियों के बारे में समग्र अधययन करने की सिफारिश की है। जिससे सही हकीकत सरकार के सामने आ जाए।

               कुल मिलाकर, संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में मनरेगा का सच एक बार फिर मुल्क के सामने निकलकर आया है। अब सवाल यह उठता है कि किस तरह से इस योजना को भ्रष्टाचार और धांधलियों से बचाया जाए ? कैसे सरकारी अफसरों की मनमानी को रोका जाए ? दरअसल, जब तलक सरकारी अधिकारियों के स्तर पर पारदर्शिता की जबावदेही तय नहीं हो जाती,तब तक योजना सही ढंग से संचालित नहीं हो पाएगी। योजना में पारदर्शिता और अवाम की जानिब जबावदेही सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र निगरानी और शिकायत निवारण तंत्र कायम किया जाना समय की पहली दरकार है। शिकायतों के निवारण के लिए,सभी राज्यों में जिला स्तर पर ओंबडसमैन भी नियुक्त किए जा सकते हैं, जो कि स्वतंत्र रूप से अपना काम करें। इसके अलावा सौ टके की एक बात, जब तक सरकारें दोषी पाए गए लोगों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही नहीं करेंगी, तब तक मनरेगा के भ्रष्टाचार पर लगाम खामोख्याली है। कानून अमल में आने के पांच साल के अरसे में सिर्फ 9 मामलों में ही दागी अफसरों पर कार्यवाही हो पाना,योजना के जानिब सरकारों की संजीदगी को दिखलाता है। बीते कुछ सालों में मुल्क के अंदर ऐसे कई मामले सामने निकलकर आए हैं, जिनमें करोड़ों रूपए की हेरा-फेरी की गई, फिर भी उन पर कोई कार्यवाही नहीं हो पाई। उम्मीद है, सरकार इस दिशा में जल्द ही कुछ ठोस व सकारात्मक कदम उठाने का फैसला करेगी।

? जाहिद खान