संस्करण: 17मार्च -2008

सुभाष बोस के विचारों से सम्प्रदायवाद व

साम्राज्यवाद के विरुध्द अभियान

एल.एस.हरदेनिया

  दस और ग्यारह मार्च 2008 जबलपुर के इतिहास में हमेशा याद रहेगा। ठीक इन्हीं तारीखों पर 1939 में कांग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ था। उस अधिवेशन के अध्यक्ष नेताजी सुभाष चन्द्र बोस चुने गये थे। उन्होंने महात्मा गांधी के उम्मीदवार डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या को शिकस्त दी थी। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह थी कि यहाँ उन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों की रुपरेखा सामने रखी थी।

इस वर्ष दस व ग्यारह मार्च को उसी अधिवेशन स्थल पर आज के राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय संदर्भ में सुभाष चन्द्र बोस के विचारों व आदर्शों पर विस्तृत चर्चा हुई।

सुभाष चन्द्र बोस भारत को एक आदर्श, समाजवादी, धार्मनिरपेक्ष देश बनाना चाहते थे। वहीं विश्व के स्तर पर वे साम्राज्यवादियों से मुक्त दुनिया के हामी थे।

सुभाषचन्द्र बोस की स्मृति को ताज़ा करने के लिए 10 मार्च को उसी स्थान पर सभा की गई जहाँ 1939 में कांग्रेस अधिवेशन संपन्न हुआ था। यह अधिवेशन जबलपुर के पास नर्मदा नदी के किनारे स्थित त्रिपुरी गांव में संपन्न हुआ। 10 मार्च को प्रदेश व देश के विभिन्न कोनों से रवाना हुए जत्थे वहीं एकत्रित हुए और इन्हीं जत्थों में शामिल लोग एक सभा के रूप में परिवर्तित हो गए। सभा की अधयक्षता सुभाष चन्द्र बोस के भतीजे श्री सुब्रोतो बोस ने की। श्री सुब्रोतो बोस जो पश्चिमी बंगाल से सांसद हैं, सुभाष चन्द्र बोस के बड़े भाई श्री शरदचंद्र बोस के सबसे छोटे पुत्र हैं।

सभा में अनेक वक्ताओं ने याद दिलाया कि 1939 में सुभाष चन्द्र बोस ने यह सुझाव दिया था कि कांग्रेस अंग्रेजों को 6 महीने के अंदर भारत छोड़ने का नोटिस दे दे। परन्तु उस समय सुभाष चन्द्र बोस की बात नहीं मानी गई। यदि अंग्रेजों को 1939 में भारत छोड़ने को मज़बूर कर दिया जाता तो उसके दो संभावित नतीजे होते। विश्व पर युध्द के संकट छाए हुए थे। हिटलर व मुसोलिनी संपूर्ण विश्व पर अपना साम्राज्य कायम करने का सपना देख रहे थे। विश्व युध्द होगा यह स्पष्ट नज़र आ रहा था। बिना भारत व भारतीयों और विशेषकर भारतीय सैनिकों की सहायता के ब्रिटेन, हिटलर व मुसोलिनी जैसे तानाशाहों का मुकाबला युध्द में नहीं कर सकता था। इसलिए मज़बूर होकर ब्रिटेन को भारत को आज़ाद करना पड़ता। यदि ऐसा होता तो भारत आठ साल पहिले आज़ाद हो जाता। जो बात सुभाष चन्द्र बोस ने 1939 में कही थी वही बात कांग्रेस के नेतृत्व को 1942 में कहना पड़ी अर्थात ''अंगरेजों भारत छोड़ों''।यदि 1939 में भारत आज़ाद हो जाता तो शायद देश का विभाजन भी नहीं होता। क्योंकि 1939 तक जिन्ना की तरफ से पाकिस्तान की मांग उतनी जोरदार ढंग से नहीं उठाई गई थी। जनसभा में सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के बताये मार्ग पर हम चलते रहेंगे। पूंजीवाद व साम्राज्यवाद के विरुध्द हमारी जंग जारी रहेगी।

त्रिपुरी में पहुँचे जत्थों को जनक्रांति रैली कहा गया था। उसके समापन के अवसर को महासम्मेलन निरुपित किया गया। महासम्मेलन को संबोधिात करते हुए अखिल भारतीय हिन्द फारवर्ड ब्लाक के महामंत्री देवव्रतो विश्वास ने कहा कि हम आज प्रतिज्ञा करते हैं कि हम सुभाष चन्द्र बोस के सपनों को पूरा करेंगे। उन्होंने कहा कि त्रिपुरी में आयोजित यह सम्मेलन भारतीय राजनीति को एक नया मोड़ देगा। उनका कहना था कि त्रिपुरी की धारती पर ही सुभाष चन्द्र बोस ने दक्षिण पंथियों का सफाया किया था। आज भी भारतीय राजनीति व अर्थनीति पर दक्षिण पंथियों का कब्जा है। और यह एक वास्तविकता है कि जब तक दक्षिण पंथियों का वर्चस्व रहेगा देश गरीबी, भुखमरी और बेकारी के अभिशापों से मुक्त नहीं हो सकेगा। देवव्रतो विश्वास के अलावा सम्मेलन को समाजवादी पार्टी के विधायक डॉ. सुनीलम्, नेताजी सुभाष फाउंडेशन के जयंत वर्मा, राष्ट्रीय सेक्युलर मंच के संयोजक एल.एस.हरदेनिया ने भी संबोधिात किया।

सम्मेलन में विभिन्न जत्थों के नेताओं ने अपने अपने अनुभव भी सुनाए। उन्होंने बताया कि प्रदेश के गांवों में आम आदमियों की स्थिति काफी चिंताजनक है। उन्हें बुनियादी सुविधााएँ तक उपलब्धा नहीं हैं। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने के बावज़ूद उन्हें बी.पी.एल. सूची में शामिल नहीं किया गया है। प्रदेश में किसानों की हालत खस्ता है। इस कारण प्रदेश में भी हजारों किसानों ने आत्महत्या की है। बिजली की समस्या भी दिन प्रतिदिन उलझनपूर्ण होती जा रही है। गांवों में बिजली की उपलब्धाता लगभग शून्य है।

दूसरे दिन अर्थात 11 मार्च को साम्राज्यवाद विरोधी विश्व सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में अनेक देशों के प्रतिनिधिा भी शामिल हुए। इसके साथ ही वामपंथी पार्टियों के नेता भी सम्मिलित हुए। सम्मेलन में वियतनाम की कम्यूनिस्ट पार्टी के नुगदेन होन्ह सोन, श्रीलंका की पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट के बिजीथा, क्यूबा की कम्यूनिस्ट पार्टी की श्रीमती इंदिरा लोफेज, कोरिया की वर्कस पार्टी के किम चेओल सू, पांग सी ओन, नेपाल की कम्यूनिस्ट पार्टी के छबीलाल विश्वकर्मा, बंगला देश की कम्यूनिस्ट पार्टी के शहादत हुसैन, काज़ी सज्जाद जहीर एवं श्रीमती मारुआ मजहर और बांग्लादेश की वर्कर्स पार्टी के इकबाल कबीर जाहिद तथा अनिल विश्वास, बर्मा की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के डॉ. टिंट शामिल थे। भारतीय राजनीतिक दलों की ओर से माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के सांसद मोहम्मद सलीम, रिवोलूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के सांसद अबनी राय, जनता दल सेक्यूलर के सुरेन्द्र मोहन, गदर पार्टी के प्रकाश राव, समाजवादी पार्टी के सांसद उदय प्रकाश तथा भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के अरविन्द श्रीवास्तव सम्मेलन में  सम्मिलित हुए।

सभी वक्ताओं ने साम्राज्यवाद के विरुध्द एक संगठित अभियान की आवश्यकता पर जोर दिया। साम्राज्यवाद दुनिया के विकासशील देशों का सबसे बड़ा दुश्मन है। वियतनाम के प्रतिनिधि ने कहा कि हमने साम्राज्यवाद के विरुध्द मैदानी लड़ाई लड़कर उसे शिकस्त दी है। साम्राज्यवाद की ज्यादतियों को हमने एक लंबे समय तक भुगता है। क्यूबा की प्रतिनिधि ने कहा कि अमरीकी साम्राज्यवाद आज भी विश्व के नक्शे से कम्यूनिस्ट क्यूबा को गायब करने का सपना देख रहा है। नेपाल के प्रतिनिधिा ने कहा कि 10 अप्रैल को नेपाल की जनता संविधाान सभा का निर्वाचन करेगी। उसके साथ ही नेपाल राजतंत्र के अभिशाप से मुक्त हो जाएगा।

माक्र्सवादी सांसद सलीम ने कहा कि गांधी की आड़ में 1939 में इसी स्थान पर दक्षिणपंथी, वामपंथियों के विरुध्द एकजुट हो गए थे। परन्तु अब हम उन्हें सफल नहीं होने देंगे। सलीम ने साम्राज्यवादियों के साथ-साथ सम्प्रदायवादियों को भी शिकस्त देने पर जोर दिया। आपने यह भी कहा कि देश में नेता तो बहुत हैं पर नेताजी सुभाष ही हैं। हम अपने नेता ज्योति बसु को जननेता कहते हैं, क्योंकि नेताजी तो अकेले सुभाष ही हैं। सभी वक्ताओं ने कहा कि साम्राज्यवाद व सम्प्रदायवाद को वामपंथी ही शिकस्त दे सकते हैं। बर्मा के प्रतिनिधि ने इस बात पर खेद प्रगट किया कि भारत सरकार हमारे देश के सैनिक तानाशाहों की मदद करती हैं।

सम्मेलन में एक घोषणा पत्र भी स्वीकृत किया जिस में कहा गया है कि ''नई विश्व व्यवस्था के तैयार करने के नाम पर साम्राज्यवाद का जो अवशेष है वह विश्वशान्ति, लोकतन्त्र, आज़ादी और विश्व समुदाय के लिए एक खतरा बन गया है। साम्राज्यवादी शक्तियाँ आर्थिक और राजनीतिक दबाव से अविकसित और विकासशील देशों पर अपना वर्चस्व प्रदर्शित कर रहे हैं। साम्राज्यवादी शक्तियाँ पूंजीवादी शक्तियों के साथ मिलकर इन देशों की जनता, लोकतन्त्र और मानव अधिाकार पर प्रहार कर रहे हैं। जो देश इन साम्राज्यवादी घमंडियों का विरोधा करते हैं उन्हें आर्थिक और राजनीतिक रुप से दबाव देकर उनका गला घोंटने लग जाते हैं। साम्राज्यवादी शक्तियाँ इस कुकृत्य के लिए अपने तर्क इस प्रकार देते हैं: आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, व्यापक विनाशकारी हथियारों की समाप्ति, शासन सत्ताओं का लोकतांत्रिकरण। जबकि ये तर्क झूठे और आधाारहीन हैं। हमारा पूर्ण विश्वास है कि पूरे विश्व समुदाय के शान्तिप्रिय लोग साम्राज्यवाद को हमेशा के लिए परास्त करने के लक्ष्य के लिए साम्राज्यवादी विरोधी झण्डे को ऊंचा रखेंगे।

 

 

 एल.एस.हरदेनिया