संस्करण: 17मार्च -2008

पूरब का रूख करता अंतर्राष्ट्रीय शक्ति केन्द्र

 

प्रमोद भार्गव

   अपनी बौद्धिक क्षमता व लगातार मजबूत हो रही आर्थिक वृद्धि के बूते भारत कालांतर में अंतरराष्ट्रीय शक्ति का केन्द्र बनने जा रहा है ? यदि ब्रिटेन के विदेश मंत्री डेविड मिलीबैंड की टिप्पणी पर भरोसा करें तो भारत विश्व की महाशक्ति बनने के पथ पर अग्रसर है। मिलीबैंड ने अपने देश के राजनायिकों से कहा है कि वे विश्व-सदंर्भ में अपना दृष्टिकोण बदलें, क्योंकि विश्व अर्थव्यवस्था के साथ भारत और चीन के मजबूती से जुड़ जाने के कारण भविष्य में शक्ति-केन्द्र पश्चिम से हस्तांतरित होकर पूरब का रुख करने की तैयारी में है। इस अंतरराष्ट्रीय शक्ति के स्थानांतरित होने का अर्थ है कि पश्चिमी देश अपने कार्यालयीन संसाधनों को भारत-चीन व एशिया के अन्य विकासशील देशों में स्थापित करें। लेकिन यहां गौरतलब यह भी है कि पूंजीवादी विस्तार के इस कालखण्ड में कहीं ब्रिटेन और अमेरिका की मिलीजुली मंशा अपने कंपनी दफ्तरों को भारत व अन्य एशियाई देशों में प्रतिष्ठित कर नये सिरे से इन देशों की मानव व प्राकृतिक संपदा का अपने हितों के लिए दोहन कर वैश्विक पूंजीवाद को और मजबूती देना तो नहीं ? क्योंकि परिवर्तित हो रहे शक्ति केन्द्रों में घुसपैठ कर संचालन की वल्गायें थाम लेने के घातक मंसूबे तो नहीं ? नवउदारवाद और मुक्त बाजार के हस्तक्षेप के चलते भारत आर्थिक व  सामाजिक क्षेत्र में विकास के जिन विषंगतिपूर्ण मानकों को स्थापित करता हुआ आगे बढ़ा है वे जबरदस्त आत्मघाती विरोधाभासी संकट के दौर के कारक भी हैं।

 

अमेरिकी आर्थिक मंदी के दौर को यदि पश्चिमी अंतरराष्ट्रीय महाशक्तियों के विकेन्द्रीकरण के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो ब्रिटेन के विदेश मंत्री की अपने राजदूतों को नसीहत दूरदृष्टि की प्रतीक है। बदलते परिवेश में अंतरराष्ट्रीय छवि और शक्ति को मजबूत बनाए रखने के लिए जरूरी होता है कि नई वरीयताओं के साथ अनुकूल गतिशीलता बनाए रखी जाए। वैश्विक परिदृश्य के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय शक्ति-केन्द्र पूरब बनने जा रहा है तो भारत और चीन जैसे देशों में पर्याप्त हस्तक्षेप हो और विकसित देशों के पूंजीवादी विस्तार का वजूद कायम रहे। क्योंकि पश्चिमी देशों में प्रबंध, स्वास्थ्य, संचार और निर्माण के क्षेत्र में जो मेधा शक्ति लगी है उसमें भारत और पाकिस्तान के बौद्धिक ही बड़ी संख्या में हैं। ऐसे में उनके उस भौतिक वजूद का ही स्थानांतरण होगा जिनका बौद्धिक कौशल पूर्व से ही उनके नियंत्रण में है। शायद इसी नजरिए से यूरोपीय देशों ने अपने संस्थानों की इकाईयां पूरब के देशों में रोपे जाने की शुरूआत कर दी है। जिससे शक्ति केन्द्रों की धुरी के वाहक वे रहें।

भारत को एकाएक इस खुशफहमी में आकर मंत्रमुग्ध नहीं हो जाना चाहिए कि हम भविष्य के अंतरराष्ट्रीय शक्तिस्थल बनकर प्रत्यक्ष महाशक्ति बन ही जाएंगे। क्योंकि हमारे चक्रनाभि बन जाने की संभावनायें शक्ल ले रही हैं तो वे उन नीतियों का परिणाम हैं, जिन्होंने नवउदारवाद और मुक्त बाजार व्यवस्था के चलते बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए व्यापार करने के कपाट खोले। इन कंपनियों के पैर पसारने से ही विरोधाभासी स्थितियां मजबूत हुईं। एक ओर नौकरियों में आश्चर्यजनक वेतनमान व भत्ते बढ़े, वहीं गुजरे लायक सस्ते मजदूरों की संख्या भी बढ़ी। एक ओर जहां अरब-खरबपतियों की सूची बढ़ी, वहीं आम आदमी की औसत आय इतनी घट गई कि उसके समक्ष जीवनी शक्ति देने वाली खुराक का संकट भी खड़ा हो गया। समग्र व समता मूलक विकास के विपरीत इस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दौरे में रोजगार के अवसर भी तेजी से घट रहे हैं। फिर क्या पश्चिमी देश हमारी सरजमीं पर हमारे शक्ति केन्द्र बन जाने के क्रम में हमारी मदद करने आ रहे हैं अथवा हमारी विशाल मानव संसाधन का दोहन और शेष रही प्राकृतिक संपदा के रूपांतरित स्वरूप का व्यवसायीकरण कर धनार्जन करने आ रहे हैं ? बढ़ते वैश्विक आतंकवाद के चलते ब्रिटेन और अमेरिका की मिलीजुली मंशा यह भी हो सकती है कि रोजगार के लिए बड़ी तादात में एशियाई मूल के जो लोग यूरोप आते हैं, उन्हीं में प्रशिक्षित आतंकवादी भी शामिल होते हैं। जो ब्रिटेन और अमेरिका में अनेक आतंकवादी हमलों को अंजाम दे चुके हैं। ऐसे में खतरों से बचे रहने के लिए इंटरनेशनल हब के बहाने क्यों न एशियाई देशों में ही संस्थान स्थापित कर स्थानीयता के स्तर पर ही उच्च तकनीकी दिमाग का इस्तेमाल किया जाए ? इससे सुरक्षा के उपायों से भी मुक्ति मिलेगी और सस्ते में मानव संसाधन भी ! कोई बहुत बढ़ी पूंजी निवेश कर भारत को उत्पादन की ताकत बनाना पश्चिमी देशों की मंशा नहीं है। ऐसा होता है तो इससे हमारी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष आर्थिक संपन्नता और खतरे में पड़ेगी।

अमेरिका में 11 सितंबर को वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर और ब्रिटेन में भूमिगत मेट्रो रेल सेवा में श्रृंखलाबद्ध विस्फोटों के बाद संपूर्ण यूरोप के देशों में वीसा के नियम कड़े करते हुए एशियाई लोगों के लिए सोची-समझी योजनानुसार रोजगार के अवसरों में 75 फीसदी कमी लाई जा चुकी है। डेविल मिलीबैंड का शक्ति-केन्द्र बदले जाने संबंधी बयान आने से पूर्व ही ब्रिटेन ने फैसला ले लिया है कि अब केवल कुशल व उच्च प्रशिक्षित लोगों को ही यहां रोजगार के अवसर सुलभ कराए जाएंगे। अब तक ब्रिटेन व अन्य यूरोपीय देशों में भारत के करोड़ों लोग अकुशल व अप्रशिक्षित कार्यों में लगे चले आ रहे थे। ये लोग फिरंगी हुकूमत के नीचे टेक्सी चालन, नल-बिजली फिटिंग, विविध वस्तुओं के क्रय-विक्रय, आयात-निर्यात से लेकर हाथ से की जाने वाली साधारण मजदूरी के काम से भी जुड़े थे। ये लोग वहां आर्थिक रूप से सबल हुए और बचत विदेशी मुद्रा को भारत स्थानांतरित कर भारत में विदेशी मुद्रा भण्डार बढ़ाने में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। इस भण्डार को बढ़ाने में खाड़ी के देशों में काम कर रहे लोगों के श्रम का भी योगदान है। भारत में विदेशी पूंजी निवेश दर में जो 2007-2008 के दौरान 36.3 प्रतिशत का उछाल देखा गया है, वह भारत की विदेश नीति का परिणाम न होकर भारतीय परिवारों के इसी बचत-निवेश का परिणाम है। ब्रिटेन और अमेरिका में बदली जा रही नीति व नियमों के तारतम्य में यूरोप में भारतीय रोजगार के अवसर तो घटेंगे ही भारतीय आर्थिक समृद्धि भी प्रभावित होगी। कमोवेश इसी सिलसिले में वाणिज्य मंत्री कमलनाथ ने भी मंजूर किया है कि भारतीय निर्यात में कमी आने के कारण 20 लाख रोजगार घट जाने की उम्मीद है। जबकि विभिन्न भारतीय उद्योग संगठनों से जुड़े पदाधिकारी यह संख्या 80 लाख बता रहे हैं।

 

हालांकि अभी परिस्थितियां इतनी अनुकूल नहीं हुई हैं कि भारत अथवा पूरब के किसी अन्य देश को एशिया और यूरोप का शक्ति स्थल बन जाने का समर्थन मिल जाए। वैसे भी पूरब के अधिकांश देशों में अभी भी जो सामंती प्रभाव और फिरंगी-गुलामी के प्रति जो दास भाव है, उससे एकाएक इन देशों के लोगों में अहंभाव उबरने वाला नहीं है। अमेरिका आर्थिक मंदी के दौर से भले ही गुजर रहा हो लेकिन महाशक्ति बने रहने के लिए उसके पास अभी पर्याप्त आर्थिक व सामरिक ताकत तो है ही पश्चिमी देशों का समर्थन भी हासिल है। इसीलिए एशियाई मुल्कों में उसका दखल कायम है और वह उनकी प्राकृतिक संपदा के दोहन में लगा है। इराक को तेल के लिए ही बर्बादी के कगार पर पहुंचाकर कमजोर किया गया। अमेरिका अभी धन और सैन्य मोर्चे पर कम से कम एक पीढ़ी तक और छाया रहेगा। अपनी संप्रभुता बनाए रखने के लिए वह खाड़ी के एकाध देश पर और इराक की तरह सत्ता थोपकर तेल-संपदा को कब्जा सकता है। बहरहाल अंतरराष्ट्रीय शक्ति स्थल परिवर्तन की जो अटकलें पश्चिम से आ रही हैं उनकी कूटनीतिक पड़ताल होनी चाहिए जिससे पूरब व्यापारिक कुचक्रों का नये सिरे से शिकार होकर अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी न मार ले ?

 

प्रमोद भार्गव