संस्करण: 17मार्च -2008

केन्या और हम -

क्या हम वैसे ही दुष्परिणाम के लिए तैयार हैं?

वीरेन्द्र जैन

पिछले दिनों राज ठाकरे और फिर बाल ठाकरे परिवार ने उत्तर भारतीय, खासकर बिहारी और तथा उत्तरप्रदेशी लोगों के खिलाफ असमय व अकारण उत्तेजना फैलायी जिसमें दो निर्दोष लोगों की जानें गयीं तथा पुणे के एक फुटपाथ पर सोकर चने बेचने वाले बिहारी के हाथ भी काट देने जैसी घटनाएं भी घटीं। ऐसा लगता है कि जैसे हमने अपने आसपास की दुनिया में घट रही घटनाओं की तरफ से मुँह ही फेर रखा है व आजादी के नाम पर कोई भी कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है।

अफ्रीकी देश केन्या में सन 2002 में जब मिस्टर किबाकी म्वाई ने सत्ता सम्हाली थी तब उन्होंने अपने देशवासियों से वादा किया था कि वे छह महीने के अन्दर देश में संवैधानिक सुधारों की पहल करेंगे और सत्ता के विकेन्द्रीकरण की ओर सक्रिय कदम उठायेंगे। उल्लेखनीय है कि केन्या में सत्ता राष्ट्रपति पद में केन्द्रित है जिसके परिणाम स्वरूप वहाँ राजनीति व्यक्ति केन्द्रित हो गयी है व संगठनों का महत्व शून्य होकर रह गया है। राष्ट्रपति ही अपने दल का सर्वेसर्वा भी होता है (जैसे कि अपने यहाँ मायावती मुलायम सिंह बाल ठाकरे, जयललिता, चन्द्रबाबू नायडू ममता बॅनर्जी आदि हैं जो संगठन के लिए भी हैं और सरकार के लिए भी हैं तथा उनके सरकार में रहते हुये भी संगठन उनके ही पीछे घिसटता रहता है।) पर सत्ता में आने के बाद उन्होंने न केवल अपने सारे वादे भुला दिये अपितु सत्ता अपने पास ही केन्द्रित कर के उसे और अधिक केन्द्रीकृत करने के लिए कदम उठाये। न्यायपालिका से लेकर राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में अपने विश्वसनीय लोगों को नियुक्त किया। दिसम्बर 2007 के चुनाव में उन्होंने सत्ता का दुरूपयोग करते हुये सीधो चुनाव जीतने की घोषणा कर दी जो बड़े असंतोष का कारण बना। अंर्तराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने निष्पक्ष चुनाव और राष्ट्रपति किबाकी म्वाई की विजय को लोकतांत्रिक विजय नहीं माना पर उन्होंने उक्त पर्यवेक्षकों की राय को कोई महत्व नहीं दिया। चुनाव के तमाशे का नजारा यह भी था कि कुछ प्रांतों में तो कुल वोटों की संख्या से भी अधिाक वोट निकले। कई जगह प्रतिद्वंदियों के समर्थकों के नाम ही मतदाता सूची से गायब कर दिये गये थे। मुख्य चुनाव आयुक्त से बन्दूक की नोक पर किबाकी म्वाई की जीत घोषित करवायी गयी।

1963 में ग्रेट ब्रिटेन की गुलामी से आजाद हुये इस देश में पहला राष्ट्रपति गिकयू जनजाति से ही था। वे सैन्ट्रल प्रोविंस से थे और उनका नाम जोन्यो केन्याटा था। राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने अपनी गिकयू जनजाति के लोगों को 'रिफ्ट वैली' में बसाया और बड़े बड़े भूखण्ड उन्हें आंवंटित किये। तब ही से उस स्थान के मूल निवासी जो बाल ठाकरे समर्थक मुंबई वासियों की तरह वहाँ का पुश्तैनी अधिाकारी समझते थे विद्रोही हो गये थे , वह विद्रोह भी आज केन्या में मुखर होता जा रहा है।

इस चुनावी धांधाली के बाद वहाँ पर जो नया जन आक्रोश भड़का उसके परिणाम स्वरूप दिसम्बर 2007 के बाद वहाँ एक हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और हजारों लोग भयभीत होकर पड़ोस के युगांडा और रवांडा आदि देशों की ओर पलायन कर गये हैं। राष्ट्रपति की पार्टी का हाल यह है कि उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता वंगारी मथाई को धामकी दी है कि यदि उन्होंने सरकार के खिलाफ मुँह खोला तो उन्हें जान से हाथ धोना पड़ेगा। केन्या की इस कबीलाई हिंसा के मूल में वहाँ के राज नेताओं द्वारा हमारे यहॉ के शिवसैनिकों या संघपरिवारियों जैसी वैमनस्य फैलाने की राजनीति है। वहाँ भी हमारे यहाँ की तरह अलग अलग भाषाओं और परंपराओं वाली चालीस से अधिाक जन जातियाँ पायी जाती हैं, इनमें गिकयू, लुओ, लुइया, कलेंजियन और कांबा आदि प्रमुख हैं। वर्तमान राष्ट्रपति, 'गिकयू' जनजाति से हैं तो विपक्ष के नेता रोइला ओडिंगा, 'लुआ' जनजाति से हैं।यह बिल्कुल हमारे राजस्थान में गूजर-मीणाओं जैसा मामला है।

भ्रष्टाचार के मामले में भी उनकी भारत से कई समानताऐं हैं । पूरा सत्ता प्रतिष्ठान भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। स्मरणीय है कि एक समय तो विश्व समुदाय ने केन्याई सरकार को तब तक कोई नया अनुदान देने से रोक दिया था जब तक कि वहाँ की सरकार विभिन्न सरकारी विभागों में फैले भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाती। भ्रष्टाचार की लाबी इतनी मजबूत है कि केन्या के एक संसद के पूर्व सचिव को इसलिए देश छोड़ देना पड़ा था क्योंकि उन्होंने सरकार में फैले भ्रष्टाचार का भंडा फोड़ किया था। अपने देश में भी तहलका के पत्रकारों को जेल में यातनाएं भुगतना पड़ी थीं। राजनीतिक व्यवस्था ऐसी है कि किसी राजा की तरह सर्वशक्तिमान राष्ट्रपति संसद के किसी भी दल के सदस्य को मंत्री बना सकता है जिसके परिणाम स्वरूप लोग दल बदलने के अवसर की तलाश में रहते हैं व सत्तारूढ दल से संबधा खराब नहीं करना चाहते।

वैसे तो अमरीका  सारी दुनिया का स्वयंभू आका बना रहता है पर केन्या की स्थिति उसे कुछ अधिाक ही अनुकूलता प्रदान करती है। आज जब दुनिया पर युध्द थोपने के लिए सभ्यताओं के संघर्ष जैसे नये नये फार्मूले गढे जा रहे हेै तब केन्या अफ्रीका के अन्य राष्ट्रों की तुलना में सर्वाधिक ईसाई धार्माबलंबियों वाला राष्ट्र है जिसके चारों ओर इस्लामी कट्टरपंथियों को प्रश्रय मिल रहा है। अमरीका के लिए केन्या का वैसा ही महत्व है जैसा कि भारतीय उपमहाद्वीप में उसके लिए गिलगिट जैसे क्षेत्र का है। वह किसी न किसी बहाने केन्या में अपना हस्तक्षेप बढाना चाहता है ताकि उसके पड़ोस में पल रहे आतंकी अड्डों को नियंत्रित कर सके और यदि कोई प्रतिक्रिया हो तो वह केन्या के खिलाफ हो। वह उस क्षेत्र में इस्लाम बनाम ईसाई संघर्ष पैदा करने की भरपूर कोशिश में है तथा इसके लिए वहाँ के आंतरिक मामलों में भी किसी बहाने ईराक अफगानिस्तान जैसा बहाना खोज कर बैठ जाना चाहता है। स्मरणीय है कि अभी तक ना तो वह अफगानिस्तान में ना तो लादेन को खोज सका है और ना ही ईराक में जैविक हथियार खोज सका है पर पूरी व्यवस्था अमरीका के नियंत्रण में चल रही है।

कहा गया है कि जो लोग इतिहास से सबक नहीं लेते वे उसे दुहराने को अभिशप्त होते हैं।हमारे देश की तथा कथित राष्ट्रवादी शक्तियाँ उन परिस्थितियों के खिलाफ चुपचाप बैठी हैं जिनके आधार पर अमरीका जैसी विदेशी ताकतें घुसने का बहाना तलाशती हैं।

वीरेन्द्र जैन