संस्करण: 17मार्च -2008

 क्यों तय है भाजपा का डूबना ?

डॉ. दर्शना सिंह

 

मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार सत्ता में वापसी के लिए भरसक प्रयास कर रही है। इसके लिए मुख्यमंत्री ने 'मिशन 2008' कार्यक्रम बनाया है, जिसके तहत् सरकार द्वारा विभिन्न वर्गों की पंचायतें आयोजित कर घोषणाओं का अंबार लगा दिया गया है। हाल ही में सरकार ने किसानों की महापंचायत आयोजित कर 5600 करोड़ रुपयों की घोषणाएं कर डाली। इसके पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा 2600 करोड़ रुपयों की घोषणाऐं की गई थी, जिनमें से एक भी योजना को इसलिए मूर्त रूप नहीं दिया जा सका, क्योंकि सरकारी खज़ाना खाली है। इसलिए सरकार ने अपने विभिन्न विभागों की जमीनें बेचने का फैसला किया है। इसके लिए टेंडर निकाले जाएंगे, बोलियां लगेंगी और फिर सरकारी ख़जाने में धान आएगा, तब जाकर पूर्व में की गई घोषणाओं की अमली जामा पहनाने की कोशिश होगी। ज़ाहिर है कि इस सारी कवायद में दो-तीन माह लगना आम बात है और तब तक आदर्श चुनाव संहिता लागू हो जाएगी। ऐसे में इन घोषणाओं पर काम नहीं हो सकेगा। अलबत्ता सरकारी जमीन भाजपा के चहेतों के पास चली जाएगी। सवाल यह है कि जब सरकार के पास पैसा नहीं है तो जनता को घोषणाओं के झुनझुने क्यों थमाए जा रहे हैं ? क्या यह प्रदेश की जनता के साथ खुली धोखाधाड़ी नहीं है ?

जहाँ तक किसान पंचायत में की गई घोषणाओं का सवाल है तो सरकार इन्हें पूरा करने के लिए धान कहाँ से लाएगी ? वैसे भी किसानों के लिए मुख्यमंत्री ने जो आंसू बहाए हैं, वे घड़ियाली ही हैं। इसके एक नहीं अनेक कारण हैं। सत्ता में आने के लिए भाजपा ने वादा किया था कि प्रदेश का बिजली संकट एक साल में समाप्त कर दिया जाएगा, जबकि स्थिति यह है कि बिजली को लेकर हालात बद से बदतर हो गए हैं। वीरसिंहपुर विद्युत संयंत्र मामले में तो इस सरकार ने अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता को धाोखा देने से परहेज नहीं किया। गौरतलब है कि इस विद्युत संयंत्र का काम पूरा होने के पहले ही वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के हाथों इसका लोकार्पण करवा दिया गया था। जो सरकार अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता को धोखा देने से नहीं चूकी, वह आम जनता का कितना ख्याल रखेगी, यह बताने की ज़रूरत नहीं है। इसके उदाहरण सामने आ चुके हैं। पहले इस सरकार ने किसानों को खाद, बीज के लिए भटकाया और फिर बिजली के लिए खून के आंसू रोने पर मज़बूर कर दिया। स्थिति यह है कि ग्रामीण अंचलों में फिलहाल दो-तीन घंटे ही बिजली दी जा रही हैं। कर्ज लेकर फसल उगाने वाले किसानों की माली हालत इतनी खराब हो चुकी है कि उन्हें आत्महत्या करने को मज़बूर होना पड़ रहा है। विधाानसभा के बजट सत्र में यह जानकारी सदन के पटल पर आ चुकी है कि प्रदेश में किसानों द्वारा आत्महत्या करने का प्रतिशत 18.4 तक बढ़ गया है। इन हालातों में यदि सरकार किसानों के लिए घोषणाओं के अंबार लगाए, तो उन पर संदेह होना स्वाभाविक ही है। सच्चाई तो यह है कि किसानों को न सस्ती बिजली चाहिए और न ही बिलों की माफ़ी। उन्हें समय पर अच्छा बीज-खाद और भरपूर बिजली चाहिए। खेद की बात है कि इस मुद्दे पर यह सरकार बुरी तरह विफल रही हैं ऐसे में किसानों के लिए घोषणाएँ करना चुनावी शगूफे के अलावा कुछ नहीं है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि शिवराज सरकार की कई योजनाऐं बहुत कल्याणकारी हैं, किंतु इसके साथ यह भी सच है कि इन्हें अमली जामा पहनाने में यह सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। अनुभवहीन मुख्यमंत्री के कारण प्रशासन तंत्र बेलगाम हो गया है, जो सरकारी योजनाओं की भद पिटवाने पर आमादा है। भ्रष्ट अफसरों को अभयदान देकर मुख्यमंत्री ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी है। 700 करोड़ रुपयों के इंडियन कारपोरेट घोटाले में लिप्त आई.ए.एस. एस.आर. मोहंती को जेल भेजा जाना चाहिए था, उसे शिवराज सरकार ने क्लीन चिट थमा कर भाजपा के भ्रष्टाचार मुक्त शासन के दावें की धाज्जियां उड़ा दी हैं। अफसरों के भ्रष्टाचार के मामलों को दबाने में इस सरकार ने बेहद बेशर्मी का परिचय दिया है। सिंहस्थ में बनी सौ करोड़ की सड़कें तीन माह में गायब हो गई और इसकी जांच के लिए बनी समिति को शिवराज सरकार ने भंग कर दिया। क्या यह सरकार के भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है ? पत्नी मोह में डूबे शिवराज सिंह डंपर कांड में लोकायुक्त जांच के घेरे में हैं और उनकी सरकार के एक दर्ज़न से ज्यादा मंत्री भी ऐसी ही जांच का सामना कर रहे हैं। सरकार के इस भ्रष्ट आचरण के कारण ही उसे उप चुनावों में लगातार हार का मुंह देखना पड़ा है।

इन हालातों में सरकार ने 'मिशन 2008' के जरिये फिर से सत्ता पाने का ख्वाब देखा हैं। इसके लिए जनदर्शन कार्यक्रम की योजना बनाई गई है जो प्रदेश के प्रत्येक जिले में आयोजित किए जाने हैं। इसके लिए सरकार को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की दरकार है, लेकिन इसे शिवराज सरकार का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सुषमा स्वराज को छोड़कर पार्टी का कोई भी नेता इसमें भागीदारी करने को तैयार नहीं है। फरवरी माह में बैतूल में आयोजित जनदर्शन कार्यक्रम इसलिए निरस्त करना पड़ा क्योंकि, पार्टी अधयक्ष राजनाथ सिंह ने बीमारी का बहाना बनाकर इससे किनारा कर लिया था, जबकि उसी दिन वे नई दिल्ली में पार्टी के महिला मोर्चे की बैठक में शरीक हुए। इसी प्रकार अपनी संकल्प रैली की शुरूआत करने जबलपुर आए लालकृष्ण आडवाणी ने भी जनदर्शन कार्यक्रम से दूर रहने में ही भलाई समझी। वरिष्ठ नेताओं द्वारा कन्नी काटने से जनदर्शन कार्यक्रम खटाई में पड़ गया है। इसकी वज़ह यह बताई जाती है कि इस सरकार की ऐसी कोई ठोस उपलब्धि नहीं है, जिसे जनता के सामने लाकर मुख्यमंत्री की पीठ थपथपाई जा सके। ऐसी स्थिति में यदि मुख्यमंत्री भाजपा को फिर से सत्ता में लाने का संकल्प जता रहे हैं तो यह दिवास्वप्न ही है। सच्चाई यह है कि भाजपा से आम जनता का मोह भंग हो चुका है और उसे उस वक्त का इंतजार है जब भाजपा से उसकी वादाखिलाफी का बदला चुकाया जा सके। इन परिस्थितियों में ईसा मसीह का कथन इस तरह कहा जाना चाहिए कि भाजपा के सत्ता में वापस आने की अपेक्षा ऊंट का सुई के छेद में से निकल जाना कहीं आसान है। शिवराज सावधाान ! भाजपा सावधान।

डॉ. दर्शना सिंह