संस्करण: 17मार्च -2008

गिल का अहं व हॉकी की अमावस्या

अंजनी कुमार झा

फिल्म 'चक दे इंडिया' से मिली प्रेरणा भी भारतीय हॉकी को ढाई दशक से अभिशाप मुक्त नहीं कर सका। गुटबाज़ी, अहं, आलस्य, धानलोलुपता से लैस भारतीय टीम क्रिकेट के खिलाड़ियों की तरह मान-सम्मान, दौलत व लोकप्रियता चाहती है। राष्ट्रीय खेल की ऐसी शर्मनाक दुर्गति पर पूरा देश शोकमय है, किंतु भारतीय हॉकी संघ के अधयक्ष के.पी.एस. गिल को तनिक भी लज्जा नहीं है। कुतर्कों से अहं तुष्ट हो सकता है, पर स्वाभिमान की रक्षा तो पुरुषार्थ के बल पर ही संभव है। आतंकवाद के फन को पंजाब में कुचलना और नक्सलवादी गतिविधियों को रोक पाने में विफलता दो, नहीं एक पहलू है। बर्बर पुलिसिया आतंक से खिलाड़ियों में खौफ़ और राजनीतिक क्षुद्रताओं का बोलबाला बढ़ा। स्वयं गिल ने इसे खूब बढ़ावा दिया। इस्तीफा न देने का ऐलान उनके मानसिक खोखलेपन को दर्शाता है। उन्हें मालूम है कि अगर पेशकश की तो स्वीकार हो जायेगा। शर्मनाक महापराजय से मेजबानी की धूमिल संभावना से भी उन्हें कोई संताप नहीं है। नौकरशाह और नेता जब ऐसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खेलों के एसोसियेशनों के अधयक्ष बनेंगे तो खेल ताश का पत्ता सरीखा हल्की हवा में भी डोलता रहेगा। खेल एसोसियेशन के अधयक्ष अब खिलाड़ी नहीं राजनीति के धुरंधर पूंजीपति व पूर्व नौकरशाह बनते हैं। परिणामत: हमें राष्ट्रीय खेल पर गर्व के बजाय शोक मनाना पड़ता है। हॉकी फेडरेशन के उपाधयक्ष नरेंद्र बत्रा व कोच जांकिम कारवाल्हो ने आत्मा की आवाज़ पर पद छोड़ा, किंतु यह आवाज़ गिल को क्यों नहीं सुनाई दी ? स्वार्थ जब सिर पर बैठता है तो गिल सरीखे स्थिति सामने आती है। बत्रा ने भारत की विफलता के लिए गिल की तानाशाही नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। राजनीति की भेंट चढ़ा भारतीय हॉकी फेडरेशन को नयी ऊर्जा देने में खेलमंत्री असहाय हैं। मंत्री मणिशंकर अय्यर के मुताबिक उनके पास फेडरेशन के विरुध्द कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं है। सरकार के हाथ बांधाने में नेता-नौकरशाह जिम्मेदार हैं। स्वायत्तता के नाम पर सरकार चलानेवाले ही सरकार को आंख दिखाते हैं। कितना विडंबनायुक्त हमारी प्रणाली है। ओलम्पिक हॉकी के आठ बार सरताज़ रह चुके भारत की बीजिंग ओलम्पिक हॉकी में खेलने की सारी उम्मीदें क्वालीफाइंग टूर्नामेंट के फाइनल में इंग्लैंड के हाथों हार के साथ ही नेस्तनाबूद हो गई।

क्वालीफाई न होने पर कोच कारवाल्हो का इस्तीफा, पूरी टीम की काहिली व गुटबाजी को दर्शाता है। एलान के बाद अमल से स्पष्ट है कि कोच को यह आभास था कि टीम यह आसान काम भी नहीं कर सकेगी। इतनी बड़ी गिरावट के बाद भी गिल की जिद भारतीय हॉकी को लुप्त कर ही दम लेगी। नियुक्ति के तौर-तरीकों पर ऊंगली उठने के बाद भी 'वाद' का प्रकोप बढ़ता गया। इसी का परिणाम है कि पदाधिकारी व खिलाड़ी मुंह छिपाने लायक भी नहीं रहे।

राष्ट्रीय हॉकी को अपने ढंग से विगत 14 वर्षों से चला रहे गिल के कारण ऐसी दुर्गति हुई। जब न अच्छा खेल मैदान, उत्तम साजो-सामान, सुविधायें नहीं थीं तब भारत पूरी दुनिया को रौंदता हुआ स्वर्णमुकुट पहनता था। वर्ष 1928 के ओलंपिक से शुरू हमारा स्वर्णिम इतिहास स्वर्ण पदकों से लदा रहा जो लगातार 32 वर्षों तक कायम रहा। पहला ब्रेक 1960 में रजत के साथ संतोष करना पड़ा, किंतु 1964 में टोक्यों में खोई प्रतिष्ठा वापस प्राप्त कर ली। आखिरी बार 1980 में मास्को में हथेली पर रखा स्वर्ण, फिर आज तक यादें ही संतोष बनीं। गिल के नेतृत्व ने खिलाड़ियों को स्टिक से जादू कराना नहीं, सिफारिश, मनुहार, गुटबाज़ी व वाद फैलाने में उस्ताद बना दिया। बारह वर्षों में पंद्रह कोच बदले गये। इतनी जल्दी तो टीआई भी नहीं बदले जाते। क्रिकेट से तुलना कर ये हीन भावना को खुद आमंत्रित करते हैं। मान-सम्मान, धानवर्षा कर्मों से मिलता है। विज्ञापन कंपनियां, आम जन ने क्रिकेटरों के अदम्य साहस को चूमा, इसी कारण यह राष्ट्रीय गौरव न होते भी गैर सरकारी रिकार्ड में गौरव का पर्याय बन गई। बीसीसीआई भारतीय खिलाड़ियों के बल पर ही अरबों की फंडिंग करने लगी। ओलंपिक में आठ स्वर्ण पदक समेत ग्यारह पदक प्राप्त भारतीय टीम 1998 में जब 32 वर्षों बाद एशियाई खेल में स्वर्ण लेकर लौटी तो सम्मान में संघ का कोई भी अधिकारी हवाई अड्डे पर मौज़ूद नहीं था। सम्मान तो दूर गिल ने आशीष, धानराज पिल्ले समेत पांच धुरंधर खिलाड़ियों की छुट्टी कर दी। जीत का मलाल गिल को था, इसलिये उन्होंने ऐसा कदम उठाया। चैंपियंस ट्रॉफी में लगातार निराशाजनक प्रदर्शन के बावज़ूद गिल ने कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया। घरेलू हॉकी की भी कहानी ऐसी ही है। बीसीसीआई, आईपीएल सहित अन्य क्रिकेट संघ और खिलाड़ी अरबपति हो रहे हैं, जबकि हॉकी के खिलाड़ी कंगाल और इसके संघ के अधिकारी मालामाल। एक बार विदेशी पत्रकार ने लिखा था-ऐसा लगता है कि भारतीय गेंद तो गुरूत्वाकर्षण के सिध्दांत से ही अनजान है। यह मंतव्य आज ही दुर्दशा देख भले ही मिथक हो, पर 32 वर्षों तक यह करिश्मा चला। 80 साल बाद क्वालीफाइ भी न कर पाना सारे रिकार्ड पर भले ही पानी फेर दिया हो पर आत्मावलोकन की कहीं ज्यादा आवश्यकता है। स्वयं राहुल गांधी ने 'भारत की खोज' यात्रा के दौरान टिप्पणी की, राजनीतिज्ञ खेल संघों के नामों का दुरूपयोग करते हैं। चयन में धांधाली पर चिंता प्रकट की। 80 साल बाद अमावस की रात ने खेल प्रेमियों को शोकाकुल बना दिया है।

उल्लेखनीय है कि देश में राष्ट्रीय हॉकी की शुरूआत वर्ष 1928 में हुई थी। वर्ष 1944 तक इसका आयोजन हर दूसरे वर्ष होता था। 1945 से यह हर वर्ष आयोजित होने लगी। 1991 में पहली बार इसका आयोजन नहीं हुआ। वर्ष 1994 में के.पी.एस. गिल ने फेडरेशन क अध्यक्ष की संभाली और फिर इसका काला अधयाय शुरू हो गया। आश्चर्यजनक तथ्य है कि गिल के कार्यकाल के 14 वर्षों में राष्ट्रीय चैंपियन का आयोजन सात बार हुआ ही नहीं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हॉकी के प्रति कितना स्पंदन व गंभीरता हैं ?

 

 

अंजनी कुमार झा