संस्करण: 17मार्च -2008

22 मार्च-विश्व जल संरक्षण दिवस पर विशेष

''पेयजल संकट-एक विश्वव्यापी समस्या''

स्वाति शर्मा

आज भारत ही नहीं विश्व के अनेक देश जल संकट की पीड़ा से ग्रस्त हैं। पेयजल की बढ़ती समस्या विश्वव्यापी समस्या का रूप ले चुकी है। अब वह दिन दूर नहीं जब पानी से आच्छादित इस पृथ्वी पर पेयजल के लिए त्राहि-त्राहि मचेगी। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 22 मार्च को 'विश्व जल संरक्षण दिवस' घोषित किया गया व भविष्यवाणी की गई कि शुध्द जल खत्म होने वाला प्राकृतिक संसाधान है, जिसका अन्धाधुन्ध अनुचित इस्तेमाल सन् 2025 तक समस्त मानव जाति के सामने गंभीर संकट का रूप ले लेगा। आज मलेशिया जैसे पानी बाहुल्य देश में, जो कि हमेशा से अपने पड़ोसी देशों को पानी बेचता रहा है, पेयजल संकट इतना गंभीर रूप ले चुका है कि वहाँ पानी की राशनिंग शुरू कर दी गई हैं। विश्व के तमाम विकसित एवं विकासशील देशों सहित अब भारत में भी बढ़ते पेयजल संकट को नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता।

जल ही जीवन है। इसके बिना मानव जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। दुनिया के क्षेत्रफल का लगभग 70% भाग जल से भरा हुआ है, लेकिन प्रकृति में जल का वितरण असामान्य है। प्राकृतिक जल का लगभग 97 प्रतिशत जल महासागरों में पाया जाता है, जो खारा है। सिर्फ़ 3 प्रतिशत जल पीने योग्य मीठा होता है। इसमें से भी मात्र एक प्रतिशत मीठे जल का हम वास्तव में उपयोग कर पाते हैं। इसमें से 70.7 जल प्रदूषण का शिकार है। सामान्यत: मीठे जल का 52 प्रतिशत झीलों व तालाबों, 38 प्रतिशत मृदा, 8 प्रतिशत वाष्प, 1 प्रतिशत नदियों व 1 प्रतिशत वनस्पति में निहित है। विश्व में उपलब्ध कुल जल की मात्रा आज भी उतनी है जितनी 200 वर्ष पूर्व थी बस अंतर सिर्फ़ इतना ही है कि उस समय पृथ्वी की जनसंख्या आज की तुलना में मात्र 30 प्रतिशत ही थी। अब मानव के उपयोगों हेतु पेयजल की मात्रा कितनी सीमित है, उक्त विश्लेषण से अंदाजा लगाया जा सकता है।

आज क्या विकसित और क्या विकासशील सभी देश पेयजल संकट से ग्रस्त हैं। पिछले कुछ दशकों में विश्व के लगभग सभी महाद्वीपों में पेयजल की प्रति व्यक्ति उपलब्धाता में रिकार्ड गिरावट आई है, जबकि जनसंख्या, कृषि व औद्योगिक उत्पाद हेतु इसकी खपत बढ़ी हैं।भारत में ही 19.2 करोड़ परिवारों में से केवल 7.5 करोड़ परिवार ऐसे हैं, जिन्हें घर के भीतर पेयजल उपलब्ध है। 8.5 करोड़ परिवारों को परिसर के निकट व 3.2 करोड़ परिवारों को दूर से पीने का पानी लाना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ यह दूरी 500 मी. से अधिक है, वहीं शहरी क्षेत्रों में 100 मी. या उससे अधिक है। भारत में 1947 में जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धाता 6000 घन.मी. थी जो 2001 में 1829 घन मी. रह गई। 2017 तक यह घट कर 1600 घन मी. रह जाएगी। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के एक अनुमान के अनुसार एशिया, अफ्रीका सहित विश्व के तमाम देशों को 2050 तक पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ेगा। अत: जल संसाधान के प्रबंधान व संरक्षण की महती आवश्यकता है।

अब प्रश्न उठता है कि आखिर इस विश्वव्यापी समस्या का ज़िम्मेदार कौन है ? निश्चय ही इसके मूल में भौतिकवादी मानव का योगदान है, जो कहीं न कहीं किसी न किसी स्तर पर भूल करता आया है। एक ओर जहाँ जल संससाधान का अन्धाधुन्ध अनुचित दोहन हो रहा है, वहीं दूसरी ओर बढ़ती जनसंख्या, बढ़ते शहरीकरण व औद्योगीकरण ने इसकी खपत बढ़ा दी है। दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत आबादी भूमिगत जल स्रोतों पर निर्भर करती है, परंतु इनके तेज़ी से होते दोहन के कारण नदी, नाले, तालाब व कुएँ सूख रहे हैं। जो बचा जल है उसे प्रदूषण ने अपनी चपेट में ले लिया है। दुनिया में एक अरब से ज्यादा लोग सार्फ़ पानी से वंचित हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की  'वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट'  की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की सबसे ज्यादा प्रदूषित नदियाँ एशिया की हैं। विकासशील देशों में लगभग 50% जनसंख्या प्रदूषित जल का इस्तेमाल करती है। दूषित जल पिलाने के मामले में बेल्जियम का स्थान प्रथम है, जबकि मोरक्को व भारत क्रमश: द्वितीय व तृतीय स्थान पर हैं। प्रत्येक वर्ष विश्व में 1.8 मिलियन बच्चों की मौत डायरिया से होती है, जो दूषित जल व खराब सफ़ाई व्यवस्था का परिणाम है। यह बच्चों की मौत का दूसरा बड़ा कारण है। जल संकट का एक कारण वर्षा जल का उचित प्रबंधान न होना भी है। इज़राइल जैसे देशों में वर्षा का औसत 25 सेमी. से भी कम है। परन्तु वहाँ का अतिविकसित जल प्रबंधान एक बूंद भी बेकार नहीं जाने देता। वर्षा की दृष्टि से भारतीय उपमहाद्वीप एक समृध्द क्षेत्र है। यहाँ आज की औसत वर्षा 115 सेमी. के आसपास होती है, लेकिन इस वर्षा का 85% पानी नदी-नालों में बह कर समुद्र में विलीन होकर व्यर्थ चला जाता है। यदि जल संसाधानों के उपयोग व दुरूपयोग की यही स्थिति रही तो आने वाली सदी में ये पृथ्वी की विशाल जनसंख्या का बोझ नहीं उठा पाएँगे, तब क्या होगा ?

विश्व में पेयजल समस्या से निज़ात पाने के लिए समय-समय पर अनेक ठोस कदम भी उठाए गए हैं। आज विश्व के तमाम देशों व राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने कई उपाय खोजे हैं। अमेरिका व यूरोपीय देशों ने वर्षा जल के समुचित प्रबंधान के उपाय किए हैं। समुद्र के तटवर्ती इलाकों में खारापन दूर करने की तकनीक विकसित की गई हैं। कृषि रसायनों के प्रदूषण से भूगर्भीय जल की रक्षा हेतु उपाय खोजे गए हैं। लेकिन भारत की स्थिति क्या है ? 'गंगा कार्य योजना' इसी दिशा में उठाया गया कदम है। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के तहत देश-प्रदेश की कई नदियों को प्रदूषण की चपेट में आने से रोका जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। भारत में पहली जल नीति 1987 में बनी थी, परंतु जल प्रबंधान की नवीन चुनौतियों को धयान में रखते हुए 2002 में नई जल नीति बनाई गई। इसे मानवीय, सामाजिक, क्षेत्रीय व पर्यावरणीय मुद्दों को धयान में रखते हुए उपभोग योग्य जल संसाधानों के उचित विकास की दिशा में सकारात्मक कदम कहा जा सकता है। निश्चय ही उठाये गए कदम सराहनीय हैं, परंतु पर्याप्त नहीं हैं। हमें आशा करनी चाहिए कि भविष्य में ऐसे ही प्रयास जारी रहेंगे, ताकि इस महानसंकट से निबटने का स्थायी हल ढूँढ़ा जा सके।

स्वाति शर्मा