संस्करण: 17मार्च -2008

''कर्जमाफ़ी के बाद खेती''

  डॉ. सुनील शर्मा

 किसानों के कल्याण के प्रति सजग यू.पी.ए. सरकार ने अपने आखिरी बजट में किसानों के 60 हजार करोड़ रुपये कर्जमुक्ति का ऐलान किया है। वास्तव में सरकार का देश के अन्नदाता के पक्ष  में अहम् फैसला है, मरते किसान और मिटती खेती को जीवनदान इस फैसले से मिलेगा। हालांकि कर्जमाफ़ी के इस  अहम् फैसले पर नुक्साचीनी जारी है। प्रश्न किए जा रहे हैं कि सरकार बैंकों को इस रकम की भरपाई कहाँ से और कैसे करेगी ? कहाँ जा रहा है कि इससे भविष्य में भी ऋण लौटाने की आदत पर बुरा असर पड़ेगा तथा किसान बैंकों का कर्ज़ लौटाना नहीं चाहेंगे। तथा अनुमान लगाए जा रहे हैं कि जो किसान कर्ज़माफी की घोषणा से लाभान्वित होगें, भविष्य में उन्हें कर्ज़ नहीं दिया जाएगा या फिर उन्हें दी जाने वाली कर्ज सीमा में कटौती की जा सकती है। इन तमाम चर्चाओं के बीच इस विषय पर भी चर्चा की जाना चाहिए कि कर्ज़मुक्ति का लाभ किसान कैसे ले पाएं। विषय पर भी चर्चा की जाना चाहिए कि कर्जमुक्ति का लाभ किसान कैसे ले पाएं। भविष्य में ऋणजाल में फंसते से बच सकें, तथा उन्हें ज़रूरत के मुताबिक पैसे की व्यवस्था कैसे हो पाए जिससे वो अपनी खेती को जिंदा बचाए रखें।

जैसा कि बजट में सरकार ने घोषणा की है कि अधिकतम दो हेक्टेयर खेती वाले किसानों को कर्ज़ से मुक्ति दी जाएगी, तो इससे किसानों का एक बड़ा वर्ग लाभांन्वित होगा क्योंकि देश के कुल किसानों में से 61.6 प्रतिशत अधिकतम एक हेक्टेयर के मालिक है तथा 18.7 किसान इस घोषणा के लाभांवितों के दायरे में आ सकते हैं, बशर्तें उन्होंने सहकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिग संस्थाओं से कर्ज़ लिया हो। वास्तव में खेती के लिए कर्ज की सबसे ज्यादा ज़रूरत इसी वर्ग के किसानों को पड़ती है और वो सहकारी संस्थाओं और वाणिज्यिक बैंकों की अपेक्षा गांव के साहूकारों और महाजनों से कर्ज़ लेना आसान, समझते हैं, क्योंकि साहूकारों से तुरंत ऋण मिल जाता है, जबकि बैंक से कर्ज लेने में देरी होती हैं, तमाम औपचारिकताओं और चक्करों के बाद बैंक से ऋण मिल पाता है, कभी-कभी तो ''का बर्षा जब कृषि सुखाने'' वाली स्थिति भी बन जाती है। दूसरी स्थिति यह भी है कि बैंकों की निर्धारित गाइडलाइन होती है, जिसके मुताबिक किसान को कर्ज़ दिया जाता है जो कि किसानों की ऋण ज़रूरत के अनुकूल नहीं होता है, मान लीजिए कि किसी किसान को सिर्फ़ बीज के लिए ऋण की ज़रूरत है इसके लिए उसे मात्र हजार दो रुपये चाहिए परंतु इतने छोटे-ऋण बैंके नहीं देती है। कुल मिलाकर वर्तमान की बैंकिग प्रणाली इन छोटे किसानों के अनुकूल नहीं प्रतीत होती है इसमें सुधार की ज़रूरत है। कर्जमुक्ति के इस तोहफे के बाद सरकार को अपनी बैंकिंग प्रणाली को दुरूस्त करने पर विचार करना चाहिए। जिससे किसानों को ज़रूरत के मुताबिक त्वरित ऋण मिल सके तथा उन्हें साहूकार के पास जाने की ज़रूरत ही न पड़े एवं उनके ऊपर डिफाल्टर का तमगा न लग पाए।वास्तव में ग्रामीण ऋण व्यवस्था में संस्थागत सुधार की आवश्यकता है, गांवों में परम्परागत ऋण व्यवस्था में सुधार करके तथा कर्ज़ देने के नए तरीकों का सृजन करके किसानों को लाभ पहुँचाया जा सकता है।

वास्तव में बैंक और किसानों के बीच गैर सरकारी संगठन यानि एन.जी.ओ. एक अच्छा माधयम बन सकते हैं, सरकार को ग्रामीण बैंकिग के क्षेत्र में एन.जी.ओ. की भूमिका पर विचार करना चाहिए, बैंकों को कृषि ऋण वितरण्ा और पुर्ण भुगतान  का कार्य इन्हें सौंपना चाहिए। किसानों को उनकी ज़रूरत के मुताबिक ऋण देना तथा फसल उत्पादन के समय उसे वसूलने का कार्य ये एन.जी.ओ. अच्छी तरह से कर सकेगें, वास्तव में माइक्रोफायनेंस के कार्य में एन.जी.ओ. की भूमिका आज सारी दुनिया में सराही जा रही हैं। आज सूक्ष्म ऋण यानि माइक्रो फायनेंस अधिकतर भारतीय किसानों की ज़रूरत हैं। किसान क्रेडिट कार्ड जैसी व्यवस्था भी अच्छी है परंतु इसमें भी तमाम उलझने है एक तो बनना कठिन अगर बन गया तो पुर्नचालन के लिए चक्कर लगाना पड़ते है, कर्ज सीमा तय कराने में रिश्वत का खेल चलता है, सो अलग। वास्तव में सरकार गांवों में कृषि ऋण के लिए झोला एन.जी.ओ. को सौंपती है तो भविष्य के लिए अच्छा होगा। इसके साथ कृषि उत्पादन में वृध्दि के लिए भी प्रयासों की ज़रूरत है।

जहाँ तक उत्पादकता की बात है तो मौसम का साथ दो बीज और खाद की पर्याप्त व्यवस्था हो तो ये छोटे खेत औसतन अधिक उपजाऊ सिध्द हो सकते हैं, इनकी प्रबंधान करना सरल है, एकमुश्त लागत कम आती हैं, खेती के परम्परागत और वैज्ञानिक तरीकों का समन्वय बनाकर कम लागत पर अधिकतम उत्पादन लिया जा सकता है। मछली पालन, पशु पालन, बागवानी और खेती का संकल दो हेक्टेयर खेती के मालिक को भरपूर कमाई दे सकता है। इसके अलावा ये छोटे किसान जैविक खेती को अपनाकर शून्य लागत आधारित खेती कर सकते है। वास्तव में खाद्यान्नों की उत्पादकता की दृष्टि में विश्व के अनेक राष्ट्रों की तुलना में हम काफी पीछे हैं। चावल की उत्पादकता मिश्र में 9.8 मीट्रिक टन प्रति हेक्टैयर, जापान में 6.42 मी टन, संयुक्त राज्य अमरीका में 7.83 मीट्रिक टन तो हमारे देश में मात्र 2.9 मी टन प्रति हेक्टेयर है। गेहूँ की उत्पादकता चीन में 4.25 मी.टन प्रति हेक्टेयर पाकिस्तान में 6.37 मी.टन तो हमारे देश में मात्र 2.71 मी.टन प्रति हेक्टेयर उपज होती है। इसी तरह मक्का कपास और तिलहनों की उत्पादता में भी काफी पीछे है। वास्तव में अभी उत्पादकता में वृध्दि की काफी संभावनाएँ है वैसे भी राष्ट्रीय विकास परिषद की 53 वीं बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया था कि अगले चार वर्षों के दौरान गेहूँ के उत्पादन में 8 मिलियन टन, चावल के उत्पादन में 10 मिलियन टन और दालों के उत्पादन में 2 मिलियन टन की वृध्दि प्राप्त की जाएगी। यह वृध्दि देश के 80 फीसदी किसानों के सहयोग से ही संभव है, निश्चित रूप से यह ऋण मुक्ति इन किसानों को अधिाक उत्पादन के लिए प्रोत्साहन का कार्य करेगी तथा किसान निश्चिंत होकर उत्पादकता बढ़ाने का कार्य करें इस पर भी गौर करना ज़रूरी है। आज कर्जमुक्ति की इस भागीरथी घोषणा को कृषि उत्पादन और किसानों के कल्याण के लिए गंगा के अवतरण स्वरूप देखना ही उचित है तथा इसमें सततता के लिए कृषि ऋण के तरीकों पर पुर्न विचार की ज़रूरत है।

 

 

 डॉ. सुनील शर्मा