संस्करण: 17मार्च -2009

किसान रैली में सोनिया की हुंकार

'वोट-युध्द' के लिए कांग्रेस हुई तैयार

राजेन्द्र जोशी

रामलीला मैदान, नई दिल्ली में आयोजित किसान रैली ने संपूर्ण देशवासियों को स्पष्ट संदेश पहुँचा दिया है कि देश सिर्फ़ कांग्रेस के ही हाथों में सुरक्षित रह सकता है। अखिल भारतीय कांग्रेस की अधयक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने जिस तेवर के साथ यू.पी.ए. सरकार की उपलब्धियों को गिनाया और जिस हुंकार के साथ विपक्ष, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी को ललकारा उससे कांग्रेसियों के लिए जमीन तैयार हो गई है। अगले वर्ष लोकसभा और इस वर्ष कुछ बड़े राज्यों में विधानसभा के निर्वाचनों को मद्देनज़र रखते हुए कांग्रेस-अधयक्ष ने अपने कार्यकर्ताओं को एक ऐसा नक्शा पकड़ा दिया है, जिसके आधार पर वे गाँव-गाँव में पहुँचकर यू.पी.ए. सरकार की उपलब्धियों और भारतीय जनता पार्टी की सरकारों की जनविरोधी नीतियों से जन जन को अवगत करा पायेंगे।

यह देश किसान बाहुल देश है। इस देश का सबसे बड़ा आर्थिक, आधार है कृषि। कांग्रेस की नीति सदैव किसानों के हित में रहती आई है। विशेषकर छोटे और मझले किसानों तथा कृषि मज़दूरों के जीवन में खुशहाली लाने के मुद्दों को कांग्रेस ने हमेशा अपनी प्राथमिकता में रखा है। गांवों के विकास और आम लोगों के जीवन स्तर को ऊंॅचा उठाने, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने तथा उनमें आत्मसम्मान की भावना जगाने के कार्यक्रमों को जितना महत्व कांग्रेस शासित राज्यों में दिया जाता रहा है, उतना अन्य राज्यों में नहीं। सोनिया जी ने किसानों, अनुसूचित जाति, जनजातियों अल्पसंख्यकों तथा कमजोर वर्ग के लोगों के हित में यू. पी.ए. सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों की तुलना केन्द्र की विगत एन.डी.ए. सरकार से करते हुए विपक्ष के घड़ियाली आंसुओं से आमजन को सतर्क रहने का आव्हान किया। सचमुच यदि आर्थिक स्तर पर तुलना की जाय तो एन.डी.ए. की सरकार के समय की देश की आर्थिक व्यवस्था बड़ी ही लचर और अदूरदर्शितापूर्ण थी। कांग्रेस पार्टी की नीतियों और कार्यक्रमों के मुद्दों में देश के हित का व्यापक संदेश है। यह देश विभिन्न धार्मों, संप्रदायों, जातियों और संस्कृतियों का एक मज़बूत गढ़ है, जिसका संरक्षण् करना ही कांग्रेस का आदर्श, मूलमंत्र और सिध्दांत है। हालांकि व्यक्तियों में आये निहित स्वार्थों, लोभ, लालच,र् ईष्या या राग द्वेषों की वज़ह से राजनीति से जुड़े व्यक्तियों में कुछ खोट आ ही जाती है। इस तरह के आचरणों से कांग्रेस पार्टी भी अछूती नहीं रह पाई, पार्टी के भीतर अहम् के विकारों के चलते इसकी एकता और अखंडता पर भी आंच आती रही है। परिणाम स्वरूप पार्टी के भीतर खेमेबाज़ों का वर्चस्व बढ़ा और कांग्रेस टुकड़ों में बंटती चली गई। इसके दुष्प्रभाव, से पार्टी मुक्त नहीं रह पाई। उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे कांग्रेस-परम्पराओं के मज़बूत प्रदेश में कांग्रेस को बुरे से बुरे दिन देखने पड़ रहे है। खेमेबाज़ियों से मधयप्रदेश छत्तीसगढ़, राजस्थान, जैसे प्रदेश भी घिरे रहे। जनता भी राजनैतिक दलों की नीतियों को तो परखती ही है, साथ ही वह पार्टी के स्थानीय कर्ता-धार्ताओं के आचरणों और चरित्र का भी मूल्यांकन करती है। जब पार्टी की एकता में जनता को अनेकता दिखाई देने लगती है तो उस पार्टी के प्रति उसका मोहभंग हो जाता है जिसमें गुट उभरकर ऊपर आ जाते हैं।

पिछले कुछ अनुभवों के आधाार पर अब कांग्रेस पार्टी को अपने आप में सम्हलने का अवसर आया है। विभिन्न राज्यों में पार्टी के भीतर की खेमेबाजियों से हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति करने का यह वक्त है। दूसरी पार्टियों द्वारा छीन लिए गये कांग्रेस के जनाधार को पुन: हासिल करने के लिए इस समय कांग्रेस एक सोची-समझी रणनीति के तहत आगे बढ़ रही है। युवा नेता राहुल गांधी की भारत खोज यात्रा का शुरू हुआ अभियान इस दिशा में एक दूरदर्शितापूण्र् क़दम माना जा रहा है। कांग्रेस ने विभिन्न राज्यों में अपनी पार्टी को मज़बूत बनाने के लिए जिस तरह की कवायद शुरू कर दी है, उससे लगने लगा है कि पूर्व में लगी ठोकरों से घायल पार्टी की मरहम पट्टी हो चुकी है और अब वह अपनी पूर्ण शक्ति से अपने सामने उपस्थित चुनौतियों का सक्षमता के साथ मुकाबला कर सकेगी। जिन राज्यों में विधाानसभा निर्वाचन होना है उनमें मधय प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की भाजपा सत्ताओं से जनता का दिल भर गया है। इन राज्यों में विकास और जनकल्याण की बातें सिर्फ़ विज्ञापनों तक सीमित रह गई हैं। विज्ञापनों के मुद्दों और जमीनी हकीकतों से विकास और जनकल्याण के कामों की सूची मेल नहीं खा रही है। अत: इन प्रदेशों की जनता के समक्ष सरकारों और सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ताओं के चरित्र की कलई खुल चुकी है। ऐसी स्थिति में वोटबैंक की चाबी प्राप्त करने में कांग्रेस को आसानी होगी। कांग्रेस के सामने जो सबसे बड़ा माइनस पाइंट है, वह है नेताओं में परस्पर समन्वय न होना और गांव-गांव, कस्बों-कस्बों में उनके समर्थकों के बीच टकराव बना रहना। विपक्ष के पास कांग्रेस के खिलाफ़ एक यही बड़ा मुद्दा है कि कांग्रेस में बिखराव है, जितने नेता उतने गुट। किंतु अब अखिल भारतीय कांग्रेस अधयक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को जिस तरह एकता बनाये रखने के लिए प्रेरित किया है, उससे इस पार्टी को आगामी निर्वाचनों में सुखद परिणाम मिलने की उम्मीद बँधी है।

आम चुनावों की घड़ियाँ नज़दीक आती जा रही है। सभी पार्टियों ने अपनी कमर कस ली है। काँग्रेस अधयक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के आव्हान पर राज्यों में पार्टी के भीतर समन्वय बनाये रखने का दौर चल पड़ा है। नई दिल्ली में आयोजित किसान रैली ने कांग्रेस पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी है। सोनिया जी ने वोट-युध्द में उतरने के लिए अपने जवानों को हथियार पंजाने का निर्देश दे दिया है। तलवारे म्यान से बाहर निकलेगी और 'वोट-युध्द' शुरू हो जायगा। केन्द्र और राज्यों में विभिन्न दलों की सरकारों के पदारूढ़ होते रहने से कांग्रेस जिस तरह पिछड़ती चली गई है, उसे अब आगे आकर देश की तासीर के मुताबिक उसे सम्हालना होगा। इसके लिए पार्टी के भीतरी समन्वय को मज़बूत बनाना होगा तभी सोनियाजी की किसान रैली और राहुल की भारत खोज यात्रा के सुखद परिणाम मिल सकेंगे।

राजेन्द्र जोशी