संस्करण: 17 जून -2013

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दंगों के बाद मोदी को बचाने के लिए किया था अटल जी का अपमान

अब कहीं के नहीं रहे आडवाणी

       पांच दिन से भारतीय जनता पार्टी में चल रही रूठने-मनाने की नौटंकी का अंत भी बड़ा नाटकीय हुआ। किसी को पता ही नहीं चला कि आडवाणी जी माने हैं या नहीं,उनके बिना सामने आए ही पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उनके मान जाने की घोषणा भी कर दी और इस्तीफा वापस भी करवा दिया। आडवाणी जी के प्रेस के सामने न आने की पार्टी की अपनी दलीलें हैं, लेकिन शक होता है कि आडवाणी या तो गलत कदम उठाने के अपराध बोध से मुंह छिपा रहे हैं, या फिर वे माने नहीं हैं, पार्टी और संघ नेताओं ने उन्हें कुछ धमकी दी है, जिसके चलते वे कुछ न बोलने के लिए मजबूर हैं।  

? विवेकानंद


मोदी को चर्चा में

बनाये रखने की तरकीब

       दनाम भी होंगे तो क्या नाम न होगा?

       लोकप्रियतावाद के शिकार लोकतंत्र में भाजपा इसी सिध्दांत से काम करती है इसलिए हर तरह की लोकप्रियता को भुनाने के लिए विख्यात और कुख्यात दोनों तरह के चर्चित लोगों के सहारे वोटों के फल झड़ाने का जतन करती है। शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, दीपिका चिखलिया, दारा सिंह, हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र, ही नहीं अपितु अरविन्द त्रिवेदी, और नवज्योत सिंह सिध्दु, आदि से लेकर साधु-साधिवयों के भेष में रहने वाले बहुरूपिये, क्रिकेट खिलाड़ी, मंच के कवि, पूर्व राजे-महाराजे, आदि सैकडों विख्यात और कुख्यात लोगों की पूंछ पकड़ कर चुनाव की बैतरणी पार करती रही है।

? वीरेन्द्र जैन


आर.एस.एस ने आडवाणी को त्याग

मोदी का दामन क्यों थामा

          गोवा में नरेन्द्र मोदी की लालकृष्ण आडवाणी के स्तीफे और बाद में त्यागपत्र वापस लेने के घटनाक्रम से यह पुन: साफ हो गया है कि भारतीय जनता पार्टी अब ''पार्टी विथ ए डिफरेन्स'' नहीं रह गई है। एक समय था जब भारतीय जनता पार्टी और उसकी पैतृक संस्था आर.एस.एस. के आंतरिक मतभेद कम ही बाहर आते थे, परन्तु अब परिस्थितियों ने ऐसा मोड़ ले लिया है कि भाजपा की गुटबंदी की चर्चा गली गली, कूचे कूचे तक में होने लगी है। अब इस घटनाक्रम से पुन: यह सिध्द हो गया है कि आर.एस.एस. भारतीय जनता पार्टी पर अपना नियंत्रण कायम रखने का कोई अवसर नहीं चूकती है।

? एल.एस.हरदेनिया


2014 के आमचुनाव और

आर.एस.एस. का अंतिम दाँव

      पार्टी विद डिफरेंस का नारा लगाने वाली भाजपा में मची अंदरूनी घमासान को 2014 में दिल्ली पर कब्जा करने के अंतिम लक्ष्य के संदर्भ में देखना ही उचित एवं समसामयिक होगा। जो राजनीतिक विश्लेषक ऐसा समझते है कि भारतीय राजनीति आज ऊपरी सतह पर समाजवाद,राष्ट्रवाद एवं सांप्रदायिकता के नारों से बाहर निकलकर मात्र राहुल बनाम मोदी तक सिमटकर रह गई है वे एक भूल कर रहे है।

? श्रीमती अल्का गंगवार


नार्वे पहला स्वतन्त्र देश जहां महिलाओं को ठीक सौ साल पहले मताधिकार मिला

         नार्वे में महिलाओं को मताधिकार मिलने की शताब्दी  वर्ष के  जश्न मनायेजा  रहे हैं। आजकल वहाँ महिला मताधिकार सप्ताह के उत्सव चलरहे हैं । भारत के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद भी कुछ कार्यक्रमों में शामिल होने वाले हैं । आजकल वे नार्वे की सरकारी यात्रा पर हैं ।इस साल नार्वे में चुनाव भी होने वाले हैं। सरकार की कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस साल मतदान करें  । इस साल नार्वे की राजधानी ओस्लो में 14 नवंबर को महिला सशक्तीकरण और समानता के विषय पर अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन का आयोजन किया गया है ।  

 ?   शेष नारायण सिंह


भाजपा के संतरे का उतर गया छिलका साफ-साफ दिखने लगी फांके

                  भारतीय जनता पार्टी जिसके नेता अक्सर कांग्रेस पार्टी की इसलिए खिल्लियां उड़ाया करते थे कि कांग्रेस के नेताओं में एकजुटता नहीं है। कांग्रेस में फूट है और जिस पार्टी में अंतर्कलह है वह कैसे सत्ता चला सकेगी? किंतु पिछले दिनों गोवा में संपन्न हुई भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जिस तरह का तमाशा देखने में आया, उसने यह सिध्द कर दिया कि भाजपा की दरारें और फांके ऐसी साफ-साफ दिखाई दे रही है जैसे संतरे का छिलका उतर जाने पर उसके भीतर की फांके हों। भाजपा अपनी तुलना संतरे से करने में अक्सर बौखला जाया करती थी।    

? राजेन्द्र जोशी


पंचायत राज में

आगे बढती महिलाएं

      रकार ने महिलाओं के सामाजिक और राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए पंचायत राज व्यवस्था के माधयम से आरक्षण की जो व्यवस्था लागू की है उसके सकारात्मक परिणाम ग्रामीण इलाकों में सामने आने लगे है। जिन गांवों में जनता ने महिलाओं को सत्ता की बागडोर सौपीं है,वहॉ विकास खुद ब खुद बोलता नजर आता है। ग्रामीण क्षेत्रों में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि जिस लगन के साथ गॉव को बेहतर बनाने ,जनसुविधाएं बढाने के लिए काम कर रही है उसने महिलाओं की नेत्तृव क्षमता को साबित कर दिखाया है। देश प्रदेश में जहॉ भी मतदाताओं ने महिलाओं को अपना सरपंच चुना वे जनता की कसौटी पर खरी उतरी और उतरती चली जा रही है।

? अमिताभ पाण्डेय


संदर्भ : ग्रामीण आजीविका योजना के दो साल

एक योजना जिसने बदल दी,

महिलाओं की जिंदगी

      ग्रामीण आजीविका मिशन को मिली जोरदार प्रतिक्रिया से उत्साहित संप्रग सरकार अब इसे पूरे देश में खास तौर पर मध्य एवं पूर्वी क्षेत्रों में लागू करने का सोच रही है। पूर्वोत्तार के राज्यों और उत्ताराखंड एवं हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय प्रदेशों को ऐसे उपायों को आगे बढ़ाने में मदद के लिए विशेष पैकेज तैयार किये जा रहे हैं। सरकार का इरादा है कि इस योजना के मार्फत आने वाले दस वर्षो में सात करोड़ बीपीएल परिवारों को गरीबी से मुक्त किया जाये। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन यानी एनआरएलएम की दूसरी वर्षगांठ के मौके पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि ''ग्रामीण आजीविका मिशन को अपना कर कई राज्यों ने यह साबित किया है कि महिला स्वयं सहायता समूह के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक एवं सामाजिक बदलाव लाया जा सकता है।''

? जाहिद खान


प्रकृति के इस चेहरे का दोषी कौन ?

        श्चिम के एक विद्वान लेखक का मत है 'वन नष्ट होते हैं तो जल नष्ट होता है, फसलें नष्ट होती हैं, पशु नष्ट होते हैं, मत्स्य प्राणी नष्ट होते हैं, उर्वरता विदा लेती है और तब ये पुराने प्रेत नये रूप में एक के बाद एक अवतरित होने लगते हैं-बाढ़, सूखा, गर्म वातावरण, आग, अकाल और महामारी की शक्ल में'। इस संदर्भ में यदि विश्व के किसी अन्य देश की बात न कर केवल भारत की ही बात की जाए तो लेखक की उपरोक्त अवधारणाऐं लगभग सही प्रतीत होती हैं। हमारे देश की पर्यावरणीय परिस्थिति पर टेरी नामक संस्था ने व्यापक अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला है कि पहले और दूसरे दर्ज के हमारे यहां के शहर की नदियों में 2000करोड़ लीटर गंदाजल प्रतिदिन प्रवाहित किया जाता है, मेग्सेसे अवार्ड विनर हमारे जलपुरूष राजेन्द्र सिंह का कहना है कि हमारे देश की सभी नदियां घातक प्रदूषण की चपेट में हैं जबकि शहरों में आज भी पीने के पानी का आधार भी यही नदियां हैंलगभग 13 नदियां अपना अस्तित्व खो चुकी हैं।

? शब्बीर कादरी


आम आदमी की बचत

गलत राह में न जाए ?

       म भारतीय बचत करने में माहिर माने जाते है। कभी यह बचत मुश्किल के दिनों में राहत बनती है, तो कभी नए कार्यो की शुरूआत का माध्यम बन जाती है। वैसे बचत विकास का माध्यम कही जाती है और कहीं न कहीं व्यक्तियों की बचत की आदत और तरीकों का असर देश की समृद्वि पर भी पड़ता है। बचत के तौर तरीकों का मॅहगाई और मुद्रास्फीति से गहरा संबंध होता है। लोग ऐसे संसाधन की तलाश में रहते है जिस पर मॅहगाई और मुद्रास्फीति  का असर न पड़े। इस लिहाज से हमारे देश में सोना और जमीन बचत के काफी पुराने और लोकप्रिय संसाधन है। जिन्हें विपत्तिकाल का साथी मानकर हर आदमी सहेजना चाहता है।  

 

? डॉ. सुनील शर्मा


संस्कार विहीनता की ओर

बढ़ती युवा पीढ़ी

        व्यक्ति के जीवन में संस्कारों का बड़ा महत्व रहता है। संस्कारों की प्रथम पाठशाला माँ होती है। कहते है कुम्हार मिट्टी को जैसा आकार देता है, वैसा ही घड़ा बन जाता है। जितने भी महापुरूष हुए है वे संस्कारों की सीढ़ी पर चढ़कर ही जीवन के हर क्षेत्र में सफल हुए है। माँ- बाप आज बच्चे को अच्छा संस्कार देने को जागरूक नही है।

? विजय कुमार जैन


कहाँ खो रहे

सामाजिक मूल्य

       क ज़माना था, जब किसी गांव या कस्बे के निवासी परस्पर रक्ता संबंधी न होने के बावजूद ऐसे मजबूत रिश्तों की डोर में बंधे होते  थे कि उनके सुख-दु:ख, हानि-लाभ, हर्ष-विषाद सब कुछ साझा माने जाते थे। गांव/कस्बे की बहन-बेटी के साथ कोई दुराचार की सोच भी नहीं सकता था। लेकिन आज बेटियां अपने ही घर में असुरक्षित हैं। यह बहुत चिन्ताजनक है। इन दिनों यौन उत्पीड़न की जितनी भी घटनाएं घट रही है, उनमें अपराधी प्राय: निकट संबंधी या नाते रिश्तेदार ही हैं। ऐसे में बेटियों की रक्षा का प्रश्न जटिल हो गया है।  

 

? डॉ. गीता गुप्त


  17 जून -2013

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