संस्करण: 17 फरवरी-2014

उच्चशिक्षा में समय के साथ

बदलाव जरूरी!

? डॉ. सुनील शर्मा

             सोनल पटैल बीएससी की छात्रा है लेकिन अक्सर वो कक्षाओं में उपस्थित नहीं रहती है। क्योंकि वो कालेज की कक्षाओं की बजाए आईटीआई की कक्षाओं में उपस्थिति रहती है। उसका मानना है कि बीएससी तो रटकर पास हो जाएगी लेकिन आईटीआई में वर्कशाप में काम करने का फायदा मिलता है अत: वहॉ उपस्थिति जरूरी है। विवेक मालवीय भी अपनी कालेज की कक्षाओं को छोड़कर स्किल डेवलपमेंट सेंटर में ट्रेनिंग ले रहा हैं,उसका भी मानना है कि वो कालेज की पढ़ाई तो गाइडों के सहारे कर लेगा क्योंकि रोजगार पाने के लिए डिग्री तो कैसे भी मिल ही जाएगी और फिर केवल डिग्री के सहारे अब रोजगार कम ही मिलता हैं। लेकिन स्किल डेवलपमेंट सेंटर में सीखा गया काम जरूर रोजगार दिलवा सकता है। संजू महाराज एमए पास हैं नौकरी के लिए जगह जगह भटके। प्लांट में चौकीदारी की,प्रायवेट स्कूल में पढ़ाया कुछ दिनों तक फोटोग्राफी भी की लेकिन अब वो पंडिताई कर रहे हैं और अपने बच्चों का नाम सरकारी स्कूल से कटाकर संस्कृत पाठशाला में लिखवा चुके हैं उनका कहना है कि उन्हें एमए करने के बाद कोई काम नहीं मिला और पंडिताई के सहारे रोजी रोटी चलाने पड़ रही है तो फिर क्यों न बच्चों को भी इसी में पारंगत किया जाये? डॉ.वंदना विज्ञान विषय में पीएचडी की उपाधिधारी हैं और पिछले 20 सालों से कस्बे के सरकारी कालेज में बतौर अतिथि शिक्षक के तौर पर अधयापन कर रही हैं लेकिन कमाई के नाम पर उसी कालेज के चपरासी से भी आधा वेतन मिलता है और वो साल के आठ महीने! अब डॉ. वंदना कालेज में पढ़ाने के बजाए बुटीक खोल कर कमाई करना चाहती है। वास्तव में ये हालात सिर्फ डॉ. वंदना और संजु महाराज जैसे युवाओं या फिर केवल सोनल या विवेक के नहीं हैं वरन लाखों युवाओं और छात्रों के है।

             आज इन हालातों से आम धारणा बन रही है कि ये परम्परागत पाठयक्रम बेकार हो चुके है और इनसें प्राप्त की गई डिग्री सजावट के काम की है या फिर कई नौकरियों के लिए गेट पास ? और ये डिग्री कैसे भी बटोरी जा सकती है। इसी धारणा के चलते म.प्र में मेडीकल कालेजों में प्रवेश के नाम पर भारी भरकम फर्जीवाड़ा सामने आया है क्योंकि चिकित्सक बनने के लिए एमबीबीएस की डिग्री होना चाहिए और अगर ये डिग्री है तो बारे न्यारे सो इसे खरीद लो। जहॉ तक तकनीकि डिग्रियों की बात है तो उद्योग जगत भी देश भर के कालेजों से निकले डिग्रीधारियों को लगभग नकारता है और इस संदर्भ में विशेषज्ञों का कहना है कि मात्र 10 फीसदी डिग्रीधारी ही काम के हैं,बाकीं कागजी? साफ्टवेयर उद्योग भी कुछ ऐसी ही बात करता है और बाकायदा ट्रेंनिंग के बाद ही प्रोजेक्ट सौंपता है।

            अब यह विचारणीय है कि जब देश के कालेजों में जारी पाठयक्रमों पर छात्रों को ही विश्वास नहीं है कि वो इसके सहारे कुछ कर पाएॅगें? स्नातकोत्तर और पीएचडी जैसी उपाधि प्राप्त युवा बेरोजगार हैं। इंजीनियरिंग कालेज और बी स्कूलों की डिग्रियों को उद्योग जगत कागज का टुकड़ा मान रहा है और मरीज डाक्टर की बजाये दवा बेचने वाले दवा लेने फायदे का सौदा मानता हैं तो फिर देशभर में चल रहे डिग्री के कारखाने यानि विश्वविद्यालय और कालेजों की प्रासंगिकता क्या बची? क्या अब ये गैर जरूरी हो चुके हैं और इन पर हो रहा भारी खर्च फालतु है? वास्तव में कार्यक्षेत्र में दक्षता महत्तवपूर्ण होती है कागज की डिग्री नहीं। आज केवल डिग्री के सहारे क्लर्क बनना भी संभव नहीं है क्योंकि कम्प्यूटरीकरण के बाद लिपिकीय कामों का तरीका बदला है, अब इस बात की समीक्षा होनी चाहिये कि कालेजों चल रहे परम्परागत पाठयक्रमों की प्रासंगिकता कितनी है और इन्हें अब जारी रखना चाहिये या बंद करना चाहिए। कुछ समय पूर्व युजीसी की तरफ से खबर आई थी कि वो बीए और बीएससी के परम्परागत कोर्य को बंद कर देगी  है वास्तव में इन पाठयक्रमों में अभी जो पढ़ाया जा रहा है वो काफी पुराना है और उपयोगिता की दृष्टि से शुन्य से भी कमतर! और इनके रोजगार परक होने की संभावनाएॅ भी लगभग नही के बराबर हैं और इन विषयों से प्राप्त डिग्री विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में महज गेट पास का काम कर रही है।

             हमारे यहॉ कालेजों से प्राप्त डिग्री का व्यावसायिक मूल्यांकन किया जाता है  आम धारणा है कि एक इंटर पास से ज्यादा कमाई स्नातक की  और स्नातक से ज्यादा कमाई परास्नातक उपाधिधारी की होनी चाहिए लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है ये तमाम डिग्रियॉ आजीविका की गारण्टी नहीं बन पा रही हैं। अगर यही ढर्रा चलता रहा और कालेज और विश्वविद्यालयों ने अपने को नहीं बदला तो विद्यार्थी या तो कालेज छोड़ देगें या फिर विवेक और सोनल की तरह फैसला लेगें जिससे शनै: शनै कालेज खत्म हो जाएॅगें। जैसे कि खबरे हैं कि देश के कुल चार हजार से अधिक बिजनेस स्कूलों में से  लगभग 15 फीसदी ने गत वर्षों में अपना काम समेट लिया है।

? डॉ. सुनील शर्मा