संस्करण: 17 फरवरी-2014

आपरेशन एक्जाम में फेल

सरकारी स्कूल

? अमिताभ पाण्डेय

             ध्यप्रदेश के भिण्ड जिले में पिछले दिनों कलेक्टर को यह विचार आया कि सरकारी स्कूलों के हाल की जांच पड़ताल की जाना चाहिए। उन्होंने तय किया कि जिले के गांव शहरों में चल रहे सरकारी स्कूलों का अचानक निरीक्षण किया जाये। कलेक्टर ने इसके लिए विशेष कार्य योजना तैयार की जिसे आपरेशन एक्जाम का नाम दिया गया। इसके अन्तर्गत उन्होंने भिण्ड़ जिले के अनुविभागीय अधिकारियों के नेतृत्व में टीम का गठन किया। इस आपरेशन एक्जाम में न तो शिक्षा विभाग के अफसरों को शामिल किया गया और न ही उनको इसकी सूचना दी गई। कलेक्टर के निर्देश पर अपने अपने अधिकार क्षेत्र वाले विकासखण्ड मुख्यालयों पर तैनात अनुविभागीय अधिकारी सरकारी स्कूलों की जांच करने पहुंच गये। भिण्ड के अनुविभागीय अधिकारी ने आपरेशन एक्जाम के तहत प्राथमिक विद्यालय गांधी शाला का दौरा किया। उन्होंने गांधी शाला में मध्यान्ह भोजन बनाने वाली महिलाओं से चर्चा की, बच्चों की उपस्थिति का रजिस्टर चेक किया बच्चों से बातचीत की। पढाई लिखाई को लेकर सवाल किये। अनुविभागीय अधिकारी को गांधी शाला के रजिस्टर में 163 बच्चे की उपस्थिति मिली जबकि मध्यान्ह भोजन बनाने वाली महिलाओं का कहना था कि भोजन तो 40-45 बच्चों का ही बनता है। जाहिर है मध्यान्ह भोजन के लिए जितनी राशि ली जा रही उसका उपयोग आधो से भी कम बच्चों के लिए हो रहा है। अधिकारी ने खुद भी यह देखा कि स्कूल में बच्चों की उपस्थिति बहुत कम थी जबकि रजिस्टर मे आंकडे अधिकतम बच्चों की उपस्थिती बता रहे थे। गांधी शाला के प्राचार्य का कहना था कि बच्चे मध्यान्ह भोजन खाकर चले आते है। वे यह नही बता पाये कि पढाई के समय सभी बच्चों की स्कूल में उपस्थिती सुनिश्चित क्यों नही की गई यदि बच्चे स्कूल कम आते है तो रजिस्टर में उनकी उपस्थिती लगातार क्यों बताई जा रही है। गांधी शाला में कक्षा 6 में पढने वाली एक बालिका से जब देश के राष्ट्रपति का नाम पूछा गया तो यह नही बता सकी। उसे अपने जिले का नाम भी पता नही था। सामान्य ज्ञान के ऐसे ही कुछ और सवालों के जवाब बच्चे नही दे सके। इतना ही नहीं बच्चों को अपने विषय से सम्बन्धिात ज्ञान भी नही था। वे न गणित के सवाल हल कर पाये, न अंग्रेजी के शब्दों का हिन्दी अर्थ बता पाये। कुछ बच्चे तो ऐसे भी थे जो कि ठीक से हिन्दी की किताब नही पढ पा रहे थे। छटवी कक्षा के बच्चों को हिन्दी की किताब पढने में भी कठिनाई हो रही थी। इससे यह पता चला कि गांधी शाला में शिक्षक बच्चों की शिक्षा को लेकर बिलकुल गंभीर नही है। उन्हे ठीक से पढाया नही जा रहा है।

                 भिण्ड जिले में आपरेशन एक्जाम के अन्तर्गत जितने सरकारी स्कूलों की अचानक जांच की गई वहां लगभग सभी जगह बच्चों का शैक्षणिक स्तर बेहद कमजोर पाया गया। सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो आपरेशन एक्जाम की कसौटी पर सरकारी स्कूल फेल हो गये। खबर है कि कलेक्टर ने इसके लिए जिम्मेदार शिक्षकों के विरूध्द दंडात्मक कार्यवाही के निर्देश दिये हैं।

               बात अकेले भिण्ड जिले के सरकारी स्कूलों की नहीं है। सब तरफ सरकारी स्कूलों में शिक्षा की स्थिति खराब है। कुछ स्कूलों को उत्कृष्ट या मॉडल मानकर छोड दें तो ज्यादातर सरकारी स्कूल अव्यवस्था, लापरवाही, उदासीनता के माहौल में बच्चों को ऐसी शिक्षा दे रहे है जिसका कोई अर्थ नहीं है। बच्चे एक कक्षा से दूसरी कक्षा में की तरफ पास होते हुए बढ़ रहे है लेकिन उनकी सुझबूझ, उनके ज्ञान को बढ़ाने पर जोर नहीं दिया जा रहा है। इस बारे में होशंगाबाद जिले के पिपरिया शहर के आर.एन.ए. स्कूल का जिक्र सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे निर्धन, कमजोर वर्ग के है जिनकी शिक्षा पर सरकार खर्च तो खूब कर रही है लेकिन यह खर्च कहां और कैसे हो रहा है इसकी निष्पक्ष, निर्णायक, त्वरित जांच उच्च स्तर से नहीं की जा रही हैं। यही कारण है कि अधिकांश सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर गिरता जा रहा है।

              यह हाल किसी एक शहर, गांव, जिले अथवा प्रदेश का नहीं है। पूरे देश में सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर चिंताजनक है जिसे सुधारने की चिंता विभागीय संगोष्ठी बैठक, फाईलों में ज्यादा नजर आती है।

                देश में शिक्षा की स्थिति पर हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का स्तर ठीक नहीं है। ''प्रथम'' नामक स्वयंसेवी संस्था की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2009 में कक्षा पांचवी के 52.9 प्रतिशत छात्र कक्षा दो की पुस्तक पढ़ सकते थे लेकिन वर्ष 2013 में यह प्रतिशत घटकर 47 हो गया है। वर्ष 2009 में कक्षा 3 के 36.5 प्रतिशत बच्चे ही गणित के सवाल हल कर सकते थे जबकि वर्ष 2013 में यह आंकड़ा घटकर 18.9 प्रतिशत रह गया है।

                सरकारी स्कूलों में अधयापकों की कमी, कार्य संस्कृति का प्रभावी न होना, शिक्षकों में बच्चों के प्रति गंभीरता और जिम्मेदारी का अभाव जैसे अनेक कारण है जिससे शिक्षा का स्तर गिर रहा है।

                ऐसी स्थिति में सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे यदि ज्ञान और प्रतिभा के मामलों में निजी स्कूलों से कमजोर साबित हो तो इसके लिए बच्चे नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था और इससे जुड़े जिम्मेदार लोग ही दोषी है। दोषी कौन है यह सब जानते है लेकिन इन पर प्रभावी कार्यवाही कब तक संभव होगी, यह कहना मुश्किल है।


? अमिताभ पाण्डेय