संस्करण: 17 फरवरी-2014

तीन साल बाद किधर हैं हम ?

मध्य प्रदेश में शिक्षा का अधिकार कानून के क्रियान्वयन की स्थिति और चुनोतियाँ

 

? जावेद अनीस

        शिक्षा अधिकार कानून को लागू हुए तीन से ज्यादा साल बीत चुके हैं, एक अप्रैल 2010 को यह कानून पूरे देश में लागू किया गया था! इसको लागू करते समय यह दावा किया जा रहा था कि यह कानून भारत के बच्चों को उनके शिक्षा का अधिकार देने के सफर में महतवपूर्ण पड़ाव माना साबित होगा।

                हालाँकि शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक धड़े द्वारा देश के बच्चों को दिए गए इस हक में कई खामियां भी गिनाई गयी थीं,जैसे की अधिनियम में पूर्व प्राथमिक शिक्षा को स्थान नहीं दिया गया है जबकि देश के करोड़ों बच्चों को इसकी आधारभूत जरूरत है। इसी तरह भारत में बड़ी संख्या में बच्चें बाल मजदूर का काम कर रहे है, इस अधिनियम में इन बच्चों के पुर्नवास व शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। इसी प्रकार से इसमें वंचित तबकों के बच्चों के लिए प्राइवेट स्कलों में 25: आरक्षण का प्रावधान किया गया है,जो की सभी बच्चों के लिए समान शिक्षा के मूल भावना के खिलाफ है।

                 दूसरी तरफ इन सारी सीमाओं के बावजूद शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक दूसरे धड़े द्वारा शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 का स्वागत किया गया और इसे भारत में नि:शल्क, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्ति करने के सफर में एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानते हुए कहा गया कि अगर हम इसे जमीनी स्तर पर लागू कराने में कामयाब हो जाते हैं तो यह पड़ाव के अगले सफर की नीव साबित हो सकती है।

             इस सन्दर्भ में अगर हम तीन साल बाद पीछे मुड़ कर देखते हैं तो पाते हैं कि स्थितियाँ बहुत ज्यादा अनुकूल नहीं हुई हैं, दुर्भाग्यवश कई सारी शंकायें तो सही साबित हो रही है। चिंता करने की बात तो यह है कि कई मामलों में स्थितियाँ सुधारने के बजाये बिगड़ी ही है और यह हालात कमोबेश देश के सभी राज्यों में है। अगर हम मधय प्रदेश के बात करें तो यह उन राज्यों में शुमार हैं जहाँ स्थिति बदतर है और अगर अभी धयान नहीं दिया गया तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।

              मध्य प्रदेश के संदर्भ में अगर इस कानून को लागू करते समय उन लक्ष्यों के क्रिर्यान्वयन की स्थिति को देखें जिन्हें राज्यों को 3 साल में पूरा कर लेना था तो इस मामले में प्रदेश देश के सभी राज्यों में सबसे पिछले कतार में शुमार नजर आता है।

              भारत सरकार की मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 2 अप्रैल 2013 को जारी रिपोर्ट के अनुसार मधयप्रदेश में 52 प्रतिशत शिक्षक प्रशिक्षित नही है। जो कि देश में सबसे ज्यादा है। इसी तरह से शिक्षकों की कमी के मामले में यह देश में अरुणाचल प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर है। शिक्षा के अधिकार कानून के मानकों के आधार पर देखा जाये तो म.प्र. में 42.03 प्रतिशत शिक्षकों की कमी है।

              इसी तरह से अगर राष्ट्रीय शिक्षा योजना और प्रशासन विश्वविधालय (एन.यू.ई.पी.ए.) की ''स्टेट रिर्पोट कार्ड 2008-2009'' और प्रोविजनल रिर्पोट 2011-2012 को तुलनात्मक रुप से देखा जाये तो वर्ष 2008-09 में म.प्र. के 17.4 प्रतिशत प्राथमिक शालाओं तथा 11.5 प्रतिशत माधयमिक शाला में केवल एक शिक्षक थे। वही एन.यू.ई.पी.ए. की 2011-2012 की प्रोविजनल रिर्पोट देखें तो स्थिति में ज्यादा परिवर्तन देखने को नही मिलता है। 2011-12 में 16.7 प्रतिशत प्राथमिक शालाऐं तथा 16.8 प्रतिशत माधयमिक शालाऐं एक शिक्षक के भरोसे चल रही है। यानी माधयमिक शालाओं में स्थिति ओर भी बदतर हुई है।

             शिक्षा की गुणवत्ता की बात करे तो वह भी सुधारने के बजाये लगातार बिगड़ती जा रही है। अभी हाल ही में प्रथम संस्था एजुकेशन फाउंडेशन द्वारा ''एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन की नौवीं रिपोर्ट 2013 (असर- 2013 )'' जारी की गयी है, इस रिपोर्ट में मधय प्रदेश के सरकारी शालाओं में शिक्षा के गुणवत्ता की स्थिति  को पिछले रिपोर्टों से तुलना करके बताया गया है कि किस तरह से वर्ष 2009 से शालाओं में शिक्षा की गुणवत्ता लगातार कम होती जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार जहाँ 2009 में कक्षा 5 के 76% बच्चे कक्षा 2 के स्तर की किताबें पढ़ सकते थे,वहीँ 2010 में यह दर 55.2%,2011 में 33.4:, 2012 में 27.5% और 2013 में 25.9 % हो चुकी है। यह स्थिति बताती है कि हमें चिंता करने की जरूरत है। इसी रिपोर्ट के अनुसार मधयप्रदेश के शालाओं में पहली कक्षा के 54 % बच्चों को अक्षर ज्ञान तक नहीं है, कक्षा 5 के 31% छात्र दूसरी कक्षा की किताब नहीं पढ़ सकते हैं। प्रदेश में सतत व्यापक मूल्यांकन व्यस्था लागू है लेकिन प्रदेश के 18.3 % शिक्षकों को इस व्यवस्था की जानकारी ही नहीं है

              एक तरफ उपरोक्त स्थितियाँ हैं तो दूसरी तरफ मधय प्रदेश में जिस तरह से ''शिक्षा अधिकार कानून'' को लागू किया जा रहा है उनसे भी कुछ समस्याएँ निकल कर आयी हैं अगर इस समस्याओं को ही दूर किया जाए तो हालत में कुछ सुधार की उम्मीद की जा सकती है।

              पहला मुद्दा है , शिक्षा अधिकार कानून में शिक्षकों की संख्या और योग्यता के बारे में विशेष प्रावधान तय किये गये हैं किन्तु इन प्रावधानो का पालन मधयप्रदेश में नही हो पा रहा है। यहां कई स्तर के शिक्षक मौजूद है जिन्हें सहायक शिक्षक, अधयापक संवर्ग और संविदा शिक्षक के नाम से जाना जाता हैं। इस सबंध में विशेष वित्तीय प्रावधान लागू करते हुये पूर्णकालिक शिक्षकों की नियुक्ति किये जाने की जरूरत है।

             दूसरा मुद्दा है कि, मधय प्रदेश में शाला प्रबंधन समिति में सबसे ज्यादा नंबर लाने वाले बच्चे के माता और पिता दोनों को शामिल किया गया है इस कारण प्राथमिक शाला में 14 के स्थान पर केवल 7 बच्चों के और माधयमिक शाला में 12 के स्थान पर केवल 6 बच्चों के माता पिता का ही प्रतिनिधित्व हो पाता है। दूसरी तरफ मधय प्रदेश में ऐसा भी देखने में आ रहा है कि कई शाला के शिक्षक जानबूझ कर ऐसे बच्चो  को ज्यादा नंबर देते जिनके माता पिता को वे शाला प्रबन्धन समिति में देखना चाहते हैं ताकि शाला प्रबंधन उनके हिसाब से चल सके। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि शाला प्रबन्धन समिति (एस.एम.सी.) की भूमिका को लेकर शिक्षा के अधिकार के कानून की मूल भावना थी उसके साथ किस हद तक खिलवाड़ किया जा रहा है। इसलिए मधय प्रदेश के सन्दर्भ में यह जरूरी है कि एस.एम.सी. के गठन करते समय एस.एम.सी. के सदस्यों के चयन का आधार उनके बच्चों द्वारा प्राप्त किए गए अधिकतम अंक न हों। केन्द्रीय कानून की मूल भावना को धयान में रखते हुए सदस्यों के चयन का मानदंड ज्यादा लोकतांत्रिक बनाया जाए। तभी शाला प्रबन्धन समितियां सही रूप में शिक्षा अधिकार कानून के मूल भावना के अनुरूप शालाओं के निगरानी और वास्तविक भागीदारी की अपनी भूमिका को निभा सकेंगीं।

              इसी तरह से मधय प्रदेश में शाला प्रबंधन समिति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को भी कागजी बना दिया गया है, वैसे मधय प्रदेश के स्टेट रूल्स में यहाँ महिलाओं के लिए एस.एम.सी. में 50 प्रतिशत आरक्षण तो किया गया है लेकिन यह हमारे सामाजिक परिवेश को देखते हुए अव्यवहारिक है क्योंकि आरक्षण के नाम पर एक की परिवार के दंपति को सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। इस कारण बैठकों में महिला सदस्यों की भागीदारी नहीं हो पाती है। इस लिए जरूरत इस बात की है की इस व्यवस्था को तत्काल खत्म किया जाए और शाला प्रबंधन समिति में महिलाओं की आरक्षण व्यवस्था को व्यवहारिक बनाया जाए तभी उनकी वास्तिविक भागीदारी हो सकती है।

              इस तरह से स्पष्ट है कि तीन साल बीत जाने के बाद भी म.प्र. ''शिक्षा अधिकार कानून'' के क्रियान्वयन की स्थिति संतोषजनक नहीं है। तीन साल पहले इसे लागू कराते समय जो दावे किये गये थे और सपने देखे गये थे उन्हें प्राप्त करने में हम फिसव्ी साबित हुए हैं। मधय प्रदेश में शिक्षा अधिकार कानून के क्रियान्वयन आ रही कई सारी समस्यायें ''स्टेट रूल्स'' की वजह आ रही हैं।

              ''स्टेट रूल्स'' में बदलाव की जरूरत है ताकि इसकी वजह से आ रही रुकावटों को दूर किया जा सके,दूसरी तरफ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एस.सी.पी.सी.आर.) को अधिक क्रियाशील बनाये जाने की जरूरत है इसके लिए एस.सी.पी.सी.आर. में अलग से आर.टी.ई. सेल का गठन की जा सकती हैं।

               देश के सभी राज्यों की तरह मधय प्रदेश में भी शालाओं में शिक्षा की गुणवत्ता एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सामने आयी है, आगामी वर्षों में अगर इसपर विशेष धयान नहीं दिया गया तो सरकारी शालाओं पर ही सवाल खड़ा किया जाने लगेगा और यह समाज के सब से कमजोर तबकों के बच्चों के लिए मध्यान भोजन परोसने और महज ''साक्षर'' बनाने का माधयम बन कर रह जायेंगे !

? जावेद अनीस