संस्करण: 17 फरवरी-2014

बाल यौन अत्याचार

वैटिकन को मिली संयुक्त राष्ट्रसंघ की भर्त्सना

? अंजलि सिन्हा

          संयुक्त राष्ट्रसंघ पैनल ने वैटिकन - जो रोमन कैथोलिक ईसाइयों के लिए सबसे पवित्र स्थान है - की तीखी भर्त्सना करते हुए कहा है कि उसने अपने हितों एवं प्रतिष्ठा की रक्षा की खातिर उन हजारों बच्चों के हितों को दांव पर लगाया है, जिन्हें चर्च की संस्थानों में यौन अत्याचार का शिकार होना पड़ा और इस तरह उसने उन तमाम पादरियों एवं चर्च के कर्मचारियों को कानून के फंदे से बचाया है। बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनी संयुक्त राष्ट्रसंघ की उपरोक्त कमेटी के प्रस्तुत निष्कर्ष इस सन्दर्भ में सामने आए, जब पिछले माह उसने इस बात की पड़ताल की कि बच्चों के अधिकारों की रक्षा को लेकर वैटिकन ने किस तरह के कदम उठाए हैं।

                   मालूम हो कि पिछले कुछ समय से यह प्रक्रिया चल रही है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के उपरोक्त पैनल ने चर्च से यह जानना चाहा था कि धार्मिक गुरूओं द्वारा जिन हजारों बच्चों को यौन अत्याचार का शिकार बनाया गया था, उसके लिए वैटिकन सिटी ने क्या कदम उठाए हैं ? दरअसल बच्चों के खिलाफ होने वाली यौन हिंसा को लेकर हुए जिनेवा कन्वेन्शन में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने प्रस्ताव पारित किया था जिस पर 1990 में वैटिकन ने हस्ताक्षर किए थे तथा 1994 में उन्होंने उसे लागू करने का रिपोर्ट भी दिया लेकिन उन केसों का क्या हश्र हुआ इसकी कोई जानकारी सालों तक नहीं दी गयी।

                यह शायद पहली दफा हो रहा था कि किसी अन्तरराष्ट्रीय संस्थान के जरिए वैटिकन से पूछताछ की जा रही थी। वैटिकन के वकील ने अपनी सफाई में यही कहा कि उसका वैटिकन की सीमारेखा तक ही नियंत्रण चलता है, बाकी जगह के मामले सम्बन्धिात नागरिक प्रशासन को देखने होंगे। पैनल ने वैटिकन के वकील की इन बातों का प्रतिवाद किया और ऐसे मामलों को निपटाने में उसकी अपारदर्शिता की नीति को जिम्मेदार ठहराया। वैटिकन के इस कथन के बरअक्स - जिसमें उसने खुद के बेगुनाही के सबूत पेश किए थे -पैनल ने कहा कि किस तरह उसने राष्ट्रीय प्राधिकरणों के साथ बार बार असहयोग का रूख अख्तियार किया है। अपनी छीछालेदर रोकने के लिए उसने सभी को मौन रहने का भी निर्देश जारी किया था।

             जब दुनिया के पैमाने पर चर्च के अन्दर धर्मगुरूओं द्वारा बच्चों का यौन उत्पीड़न मुद्दा बना तथा 2010 में यूरोप तथा पश्चिमी जगत के कई देशों में इस मुद्दे पर दबाव बना तब जाकर 2012 में एक रिपोर्ट पेश की गयी। पीड़ितों का समूह गठित हुआ तथा मानवाधिकार के लिए काम करनेवाले संगठनों ने मिल कर यू एन कमेटी के समक्ष अपना पक्ष रखा तथा वैटिकन द्वारा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग रखी। पीड़ितों ने आपबीती सुनाई तथा तमाम साक्ष्य भी पेश किए।

             यह समस्या किसी एक चर्च या किसी एक शहर की नहीं बल्कि बच्चों का यौन उत्पीड़न चर्च के ऊपर से लेकर नीचे तक के गुरूओं एवं अधिकारियों तथा कर्मचारियों द्वारा किया जाना एक वैश्विक स्तर का मुद्दा था। यू एन कन्वेन्शन के बाद कई देशों ने - ब्रिटेन, मैक्सिको, कनाडा, आयरलेण्ड, आस्टे्रलिया, - अपने स्तर पर जांच करने पर पाया कि किस तरह वैटिकन सिटी की व्यवस्था में ऐसा अपराधा आम हो गया है तथा कैसे उनके यहां गुप्तता बरती जाती है तथा भय एवं आतंक के वातावरण में आपराधिक करतूतें चलती रहती हैं। अधिक चिन्ता का विषय खुद पीड़ित लोग सालों से न्याय मांग रहे हैं तथा दोषियों के बारे में बता रहे हैं फिर भी वैटिकन मौन रहा।

               सन 2002 में न्यूयॉर्क सिटी के युनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ क्रिमिनल जस्टिस ने एक सर्वेक्षण करवाया था। इस सर्वेक्षण में उसने पाया कि 1950 के बाद अमेरिका में 4,392 पादरी तथा चर्च के अन्य अधिकारी बच्चों के साथ यौन अपराधा के दोषी पाये गये थे, जिनके अत्याचार का शिकार  13,000 बच्चे थे और इन मामलों को सुलझाने के लिए चर्च को दो बिलियन डॉलर तक मुआवजा देना पड़ा। 21 सितम्बर 2006 को एक खबर आयी थी कि फिलाडेल्फिया की अदालत के सामने जब यौन शोषण के मामले सामने आये तब सरकार ने कानूनी सुधार की बात कही थी। शहर के दो वकीलों ने चर्च को खुला पत्रा लिखा था जिसमें पादरियों पर कार्रवाई की मांग की गयी थी। चर्च के पदाधिकारी कार्डिनल ने उत्पीड़ित बच्चों को काउन्सलिंग सुविधा देने की बात कही थी लेकिन अपराधा पर वे मौन रहे।

              कुछ साल पहले रोमन कॅथॉलिक चर्च में एक मीटिंग बुलायी गयी थी जिसमे 330 पादरी तथा कुछ अन्य लोग शामिल हुए थे। इस मीटिंग में भुक्तभोगियों ने अपनी आपबीती सुनायी। नब्बे मिनिट की सुनवाई में केस पूरा नहीं हो सका तो बचे मामले को वेबसाइट पर डाला गया। इस जनसुनवाई मीटिंग में बच्चों की पीड़ा उजागर हुई। एक मां ने उसमें बताया कि उसके दो बेटों के साथ पादरी ने यौन उत्पीड़न किया जिसे वह मरते दम तक भूल नहीं सकती। ग्रेस नामके एक व्यक्ति ने बताया कि उसके बेटे को वह गाड़ी में ले जाता था और यौन अत्याचार  करके वापस गाड़ी में छोड़ जाता था।

              कुछ साल पहले इसके पहले के पोप अमेरिका की यात्रा पर गए थे, जिन दिनों यह मामला सूर्खियों में था। उन्होंने इस प्रसंग को लेकर कुछ बातें भी कहीं। एक तरफ उन्होंने जहां कहां कि ऐसी घटनाओं को लेकर वह शर्मिन्दा हैं, जिनसे चर्च की छवि को धक्का पहुंचा है। दूसरे उन्होंने धर्मगुरूओं द्वारा बच्चों के साथ किए गए यौन अपराध के लिये अमेरिका की धर्मनिरपेक्ष एवम् उपभोक्तावादी संस्कृति को जिम्मेदार बताया था। लोगों को यह सुन कर काफी हैरत हुई कि उन्हें पीड़ितों की पीड़ा से नहीं, चर्च की छवि पर लगे धब्बों से परेशानी है। चर्च के इतिहास पर नजदीकी से नज़र रखनेवालों के लिए पोप बेनेडिक्ट के इन वक्तव्यों में कोई अजूबा नहीं लग रहा था क्योंकि वह जानते थे कि प्रस्तुत पोप पहले जब कार्डिनल के तौर पर कार्यरत थे, तब इस मसले पर उनका क्या रूख था ?

              उन दिनों वह तत्कालीन पोप जॉन पाल के बाद दूसरे नंबर पर थे। सन 2005 में अमेरिका में पादरियों द्वारा बच्चों के यौन उत्पीड़न का मसला जब बड़ा मुद्दा बना था तब कार्डिनल पद पर रहते हुए उन्होंने यौन उत्पीड़न की इन तमाम घटनाओं को खारिज किया था और कहा था कि यह सब प्रचार है तथा चर्च के खिलाफ सुनियोजित षड़यंत्रा है।

               कोई यह समझे कि यौन शोषण के बारे में बाकी धर्म एवम उनसे जुड़े संस्थान बेदाग है, तो यह बड़ी भूल होगी। दरअसल मामला केवल ईसाई चर्च का नहीं है बल्कि अन्य धार्मों के साथ भी जुड़ा है। इसीलिए बच्चों के साथ काम करने वाले कुछ समूहों तथा स्वयंसेवी संगठनों ने कई बार ऐेसे सुझाव दिये हैं कि बच्चों को समझायें कि वे धर्मगुरूओं तथा शिक्षकों से दूरी बरते क्योंकि उन्होंने पाया है कि शिष्य तथा विद्यार्थियों की आत्मीयता तथा आदर की भावना का फायदा उठाया जाता है। कुछ साल पहले भारत में चर्चित एक सन्त, जिन्हें 19 वीं सदी में सक्रिय रहे एक सूफी सन्त का अवतार माना जाता है (सत्य साई बाबा) उन पर बीबीसी ने एक डॉक्युमेण्टरी फिल्म बनायी थी जिसमें उन पीड़ितों ने अपने बयान दर्ज किये थे, जिनके साथ उपरोक्त सन्त ने यौन अत्याचार किया था। कुछ साल पहले पाकिस्तान के असेंब्ली में वहां के मदरसों में बच्चों के यौन शोषण के बारे में एक मामला उठा था। असेम्ब्ली में इस मसले पर लम्बी चर्चा चली। बाद में इसे धार्मिक मसला कह कर सरकार ने बात टाल दी और किसी भी तरह की कार्रवाई करने से इन्कार कर दिया।

               यद्यपि पूरे समाज में बच्चों के प्रति बढ़ता यौन शोषण का मुद्दा चिन्ता का विषय है इसमें समाज के कई हिस्से जैसे परिवार, शिक्षण संस्थान तथा धार्मिक संस्थानों में उत्पीड़न उजागर हुआ है। इनमें धार्मिक संस्थानों के बारे में बोलना सबसे कठिन सवाल बना हुआ है क्योंकि यहां  मामला आस्था का होता है। शिष्यगण अपने गुरूओं तथा धर्म के बचाव में आक्रामक तेवर अपनाते हैं। अक्सर चाहे वह किसी धर्म या आस्था की बात हो इनसे पंगा लेना आसान नहीं होता है। इसी दबाव में लोग चुप रह जाते हैं। बच्चे सबसे कमजोर स्थिति में होते हैं। एक तो वे अबोधा होते हैं जिसके कारण पहले तो अपराध को समझ नहीं पाते हैं, स्थिति को भाप नहीं पाते है। फिर घटना को अंजाम देने के बाद उन्हें ड़रा-धमका कर चुप कराना भी आसान होता है। कई बार घरवाले या माता-पिता भी अनभिज्ञ होते हैं। उनकी आस्था या विश्वास का भी फायदा उठाया जाता है। यह एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जिस पर पूरे समाज में अभी एहसास की भारी कमी है।

               यह सोचने का मुद्दा बनता है कि ऐसे धार्मिक लोगों के अपराधों से वाकिफ होते हुए भी लोग उसके प्रति आस्थावान कैसे हो सकते है। आखिर कब तक अपने माता-पिताओं की आस्था का खामियाजा भविष्य के निर्माता बच्चे झेलते रहेंगे। क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि ऐसे अपराधियों से बच्चों को बचा लिया जाए और इन्सानियत के भविष्य को सुरक्षित किया जाए।

   ? अंजलि सिन्हा