संस्करण: 17 फरवरी-2014

1984 की खौफनाक यादें और

सिख वोट बैंक की दावेदारी का सवाल

? शेष नारायण सिंह

        1984 के नरसंहार को एक बार फिर गंभीरता से चर्चा में ला दिया गया है। अरविन्द केजरीवाल ने सिखों के संहार की जांच को  पब्लिक डोमेन में डाल दिया है। उनको सिख राजनीति के 1984 के घटनाक्रम के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति की सलाह मिल रही है। दिल्ली के बड़े वकील एच एस फुल्का अब आम आदमी पार्टी के सदस्य हैं  जानकार बताते हैं कि अरविन्द केजरीवाल को फुल्का जी की सलाह मिल रही है और उसी सलाह का नतीजा है कि उन्होंने दिल्ली समेत देश  के कुछ इलाकों में चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने वाले सिख समुदाय की पक्षधरता की राजनीति की बिसात पर निर्णायक  दांव चल  दिया है ।आम आदमी पार्टी की इस चाल से बीजेपी के आला हलकों में खलबली मच गयी है । आम तौर पर माना जा रहा है कि अगर सिख समुदाय आम आदमी पार्टी के पक्ष में चला गया तो दिल्ली और पंजाब में एन डी ए को जबरदस्त राजनीतिक नुकसान होगा। दिल्ली की सात सीटें और पंजाब की सभी सीटों पर बीजेपी और उसके सहयोगी अकाली दल की दावेदारी को सभी स्वीकार करते हैं । अगर सिख किसी और तरफ चले गए तो इसको बीजेपी की कुल सीट संख्या में भारी झटका माना जाएगा। एच एस फुल्का की रणनीति से बीजेपी की आशंका और बढ़ गयी है । एक राजनीतिक सच्चाई यह है कि पिछले 25 वर्षों से 1984 के सिख नरसंहार में कांग्रेस के शामिल होने की बात को चला कर बीजेपी ने सिख वोटों पर अपनी दावेदारी को सुनिचित किया है लेकिन यह भी सच है की दिल्ली की सरकार के मुख्यमंत्री और केंद्र की सरकार में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रूप में बीजेपी ने नेता रह चुके हैं लेकिन उनमें से किसी ने 1984 के नरसंहार के लिए एस आई टी बनाने की बात नहीं की। एच एस फुल्का ने यह पहल कर दी है और अब बीजेपी अकाली दल के नेताओं  के सामने मुश्किल पेश आ रही है ।

                1984 के नरसंहार का राजनीतिक मुद्दा अगर बीजेपी के हाथ से निकल गया तो उसका भारी नुक्सान होगा। सिख वोटों की राजनीति में झाडू वाली पार्टी से पिछड़ जाने के अलावा भी बीजेपी को बड़ा नुक्सान होगा। अभी तक जब भी कांग्रेस वाले गुजरात नरसंहार 2002 का जिक्र करते हैं बीजेपी के नेता कांग्रेसियों के ऊपर 1984 वाला सिख नरसंहार लेकर टूट पड़ते हैं ।हालांकि यह काम अब भी जारी रह सकता है लेकिन इस से अब डबल फायदा नहीं होगा ।अब तक तो सिखों की सहानुभूति भी मिलती थी और नरसंहार की राजनीति में बीजेपी के लोग नरेंद्र मोदी और कांग्रेस को बराबर का दोषी साबित करने में कामयाब हो जाते हैं । कांग्रेस  को दोषी साबित करने में तो वे अभी भी कामयाब रहेगें लेकिन सिख वोटों की दौड़ में अब आम आदमी पार्टी वाले बीजेपी पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं क्योंकि अब उनसे यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि भाई , अगर आप सिखों के 1984 वाले घाव पर मरहम लगाने के इतने बड़े पक्षधर हैं तो अब तक आपने अपराधियों के पकडवाने के लिय एस आई टी  क्यों नहीं बनवाई ? जबकि आप की सरकार दिल्ली में थी और केंद्र में भी थी। सच्चाई यह है कि 1984 के अपराधियों के बारे में बीजेपी  का रुख केवल कांग्रेस को घेरने वाला ही रहा है । यहाँ यह भी समझ लेना जरूरी है कि कांग्रेस को घेरने की कोशिश कर रही बीजेपी  के लिए 1984 का सिख नरसंहार 2014 के लोकसभा चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाला है । बीजेपी  के नेता  टेलिविजन पर जब कांग्रेस को 1984 के लिए उसी  तरह का साबित कर रहे होते हैं जितना 2002 के लिए बीजेपी जिम्मेदार है तो कांग्रेस वालों की बहुत सारी कमजोरियां सामने आती है ।  कई बार तो हम खुद चौनल की चर्चा में शामिल होते हैं और देखते हैं कि बीजेपी के वाग्वीर प्रवक्ता कांग्रेस को कटघरे में खड़े कर  रहे होतो हैं। हमको मालूम रहता है कि अगर कांग्रेस के प्रवक्ता भी उतने ही वाग्वीर होतो जितने बीजेपी वाले हैं तो खेल बदल जाता। जाहिर है कि सब कुछ जानते हुए भी हम वह बात नहीं कह सकते जिस से कांग्रेस का लाभ होने वाला है , या बीजेपी का लाभ होने वाला है । क्योंकि सच्चाई यह है कि 1.14 में कांग्रेस के कुछ बदमाश नेता राजीव गांधी और अरुण नेहरू के प्रति अपनी भारी वफादारी साबित करने के लिए सिखों का कत्लेआम करवा रहे थे। राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गयी थी और वे अपनी माताजी के पार्थिव शरीर के पास खड़े हुए थे । दिल्ली में मैंने उस नरसंहार को देखा है । सफदरजंग इन्क्लेव के मेरे मोहल्ले में सिखों के घरों की पहचान करके उनको चुन चुन कर जलाया जा रहा था। सरोजिनी नगर थाने से आये पुलिस वाले तब तक इंतजार करते थे जब तक कि घरों में आग पूरी तरह फैल न जाए उसके बाद आग लगाने वालों के पीछे पीछे जीप दौडाते थे ।  जब अगले घर में आग लगाने का कार्यक्रम शुरू होता था तो पुलिस वाले थोड़ी दूर पर खड़े रहते थे और जब घर धू धू करके जलने लगता था तो पुलिस वाले डंडा फटकारते थे और भीड़ आगे निकल जाती थी । हमारे इलाके में जो लोग आग लगा रहे थे उनमें से ज्यादातर लोग क्षेत्र के कांग्रेसी नेता अर्जुन दास के साथी थे। उस भीड़ में बीजेपी के लोकल लड़के भी शामिल थे। सिखों से आमतौर पर नाराज रहनेवाले गैर सिख लोग आगजनी कर रहे थे। सबसे ज्यादा खून खराबा एच के एल भगत के इलाके में हुआ था । जगदीश टाइटलर ,सज्जन कुमार और ललित माकन के इलाकों में भी सिखों को खूब मारा गया था।, उनकी दुकानें जलाई गयी थीं और उनके परिवार के लोगों की निर्मम ह्त्या की गयी थी। अर्जुनदास और ललित माकन को बाद में गोलियों से भून दिया गया था ।आम तौर पर यही माना जा रहा था कि सिख नरसंहार के दौरान निर्दोष सिखों की हत्याओं का बदला लेने  के लिए इन कांग्रेसियों को किसी सिख संगठन ने मार डाला था। जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार आज तक भारी सुरक्षा के घेरे में चलते रहते हैं । उस नरसंहार में दिल्ली के वफादार कांग्रेसी , सिखों के कारोबार से जलने वाले भाजपाई और कुछ कमीने किस्म के पुलिस वाले शामिल थे लेकिन यह कोई नहीं मान सकता कि हत्याओं में राजीव गांधी का हाथ था  लेकिन गुजरात नरसंहार 2002 बिलकुल अलग बात है ।उसमें गुजरात की सरकार के बड़े अफसर शामिल थे । ऐसा कई अफसरों ने खुद कहा है । बीजेपी , विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल के लोग शामिल थे और अगर कुछ अधिकारियों की तहरीरों को देखा जाए तो राज्य के मुख्यमंत्री भी उसमें शामिल थे । यह अलग बात है कि अहमदाबाद की एक  ट्रायल कोर्ट में गुलबर्गा सोसाइटी की आगजनी और एहसान जाफरी की हत्या की जांच कर रही एस आई टी के इस बयान को सही मान लिया गया  है जिसमें कहा गया  था कि एस आई टी के पास सबूत तो हैं लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं है जिसके आधार पर नरेंद्र मोदी पर मुकदमा चलाया जा सके । ट्रायल कोर्ट के इसी आदेश को बीजेपी वाले और नरेंद्र मोदी क्लीन चिट के रूप में प्रचारित कर रहे हैं और कांग्रेस वाले यह नहीं पूछ पाते कि इस तथाकाथित क्लीन चिट का दायरा क्या है । दूसरी अहम बात यह है कि गुजरात सरकार के मंत्री 2002 के हत्याकांड के सिलसिले में सजा काट रहे हैं और यह साबित किसी भी हालत में नहीं किया जा सकता कि 2002 में गुजरात सरकार और 1984 में केंद्र सरकार की भूमिकाएं सामान हैं लेकिन कांग्रेस के प्रवक्ता लोग इतने लचर हैं कि वे अपनी सरकार का बचाव नहीं कर सकते ।1984 का सिख नरसंहार एक राजनीतिक मुद्दे के रूप में बीजेपी के हाथ से  निकलता नजर आ रहा  है लेकिन उसको वह अभी जिंदा रखना चाहती है । अब यह लगभग तय है कि अरविन्द केजेरीवाल और एच एस फुल्का की पार्टी को सिख वोट बैंक की मदद  मिलेगी । लेकिन बीजेपी 1984 के डंडे से कांग्रेस को पीटने  के लिए उसको अभी इस्तेमाल करती रहेगी । हालांकि यह भी सच  है अब इस केस में बीजेपी की गति सांप छंछूदर की हो गयी है । राजनीतिक जानकारों को साफ नजर आ रहा है कि सिख वोट बैंक की भी वही गति  होने वाली है जो भ्रष्टाचार  के मुद्दे की हुयी थी । अन्ना हजारे , किरण बेदी , बाबा रामदेव , अरविन्द केजरीवाल आदि की मदद से आर एस एस ने दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक भारी आयोजन किया जिसका मकसद कांग्रेस को भ्रष्टाचार  का पर्यायवाची साबित करना था । इस काम को अन्ना हजारे और रामदेव की जोड़ी ने बहुत खूबी से अंजाम दिया लेकिन दिल्ली में उसका राजनीतिक फायदा अन्ना हजारे के शिष्य और आम आदमी पार्टी के करता धारता  अरविन्द केजरीवाल ने ले लिया । अगर अरविन्द केजरीवाल ने पार्टी न  बनायी होती तो दिल्ली में आज बीजेपी की सरकार होती और  कांग्रेस की सीटें आठ से भी कम होतीं । आज की हालात यह हैं कि सिख वोटों का भी  वही हाल  होता दिख रहा है ॥2002 की काट एक रूप में तो बीजेपी इसका इस्तेमाल करेगी लेकिन उसकी सीटें घट सकती हैं । सूचना क्रान्ति के चलते  मीडिया के विस्तार के कारण अब राजनेताओं की करनी और उससे जुडी मंशा का भी सबको पता चल जाता है । इसलिए ऐसा नहीं लगता कि 1984 और 2002 को बराबर साबित किया जा सकता है । लेकिन यह सच  है कि आम आदमी पार्टी सिख राजनीति में जबरदस्त हस्तक्षेप  करने वाली है और लोकसभा 2014 में कुछ भी हो  सकता है ।

? शेष नारायण सिंह