संस्करण: 17 फरवरी-2014

कौन करता है जहर की खेती ?

? विवेकानंद

          भाजपा के पीएम प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने दलित समुदाय के बीच बताया कि वे भी पिछले कई वर्षों से राजनीतिक छुआछूत का शिकार हो रहे हैं। मेरे ख्याल से मोदी ने ठीक ही कहा है। वास्तव में मोदी राजनीति के सबसे बड़े अछूत हैं। लेकिन सवाल यह है कि मोदी ऐसा किस घटना को लेकर मानते हैं और इसका सेहरा किसके सिर बांधते हैं, क्योंकि इस दौरान न तो वे किसी घटना विशेष का जिक्र करते हैं और न ही किसी का नाम नहीं लेते हैं। मेरे ख्याल से मोदी के जीवन में उन्हे अछूत बना देने वाली घटना गुजरात दंगा है, और इसका श्रेय खुद उनकी ही पार्टी के अब तक के सबसे लोकप्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी को जाता है। वाजपेयी जी ही थे जिन्होंने सबसे पहले गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी की आलोचना की थी, उन्हें राजधर्म निभाने की नसीहत दी थी और यहां तक कि वे उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते थे। लेकिन लालकृष्ण आडवाणी ने उस वक्त मोदी का साथ दिया और अटलजी कामयाब नहीं हो सके। यानि मोदी को अछूत बनाने का सबसे पहला काम अटलजी ने किया था।

                   तो क्या मोदी अपने आप को अछूत करार देने के लिए अटलजी को दोषी मानते हैं? यदि नहीं, तो यह संभव नहीं है कि मोदी जिस पर हमला करें उसकी पहचान सार्वजनिक न कर दें। मोदी किसी न किसी प्रकार से उस व्यक्ति की पहचान बता देते हैं, जिस पर वे हमला करते हैं, फिर चाहे उसकी जाति या वर्ग से ही क्यों न उसे संबोधित करना पड़े। यह पहला मौका और मुद्दा है, जिस पर वे सामने वाले की पहचान नहीं बता पाए। मोदी की यह मजबूरी है कि वे अटल जी को लेकर कुछ बोल नहीं सकते, लेकिन उनकी तड़प शायद बरकरार है। गलीमत है कि अटल जी सक्रिय राजनीति में नहीं हैं, वरना हो सकता है कि उनकी स्थिति भी आज लालकृष्ण आडवाणी जैसी होती।

                मोदी की राजनीति सफलता और बढ़े हुए कद के पीछे उनकी यही जहरीली नीति काम करती है। आम आदमी हो या विशिष्ठ व्यक्ति मोदी को जब मौका मिलता है वे अपने आढ़े आने वाले हर व्यक्ति को रास्ते से हटा देते हैं। गुजरात में जिस तरह से भाजपा के कद्दावर नेताओं, बड़े स्वयं सेवकों को किनारे किया गया, वैसा किसी और राज्य में संभव नहीं हो सका। शंकर सिंह बाघेला और केसूभाई पटेल जैसे नेताओं को राजनीतिक रूप से किनारे करने वाले मोदी ने वक्त आने पर बकौल हरेन पंडया की पत्नी पंडया की हत्या करवा दी। आडवाणीजी का इस्तीफा लेने और अपने सहयोगी संजय जोशी को भी पार्टी से बाहर करवा दिया और बाद में अपनी राह में रोड़ा बनता देख लालकृष्ण्ा आडवाणी को जिस तरह हाशिए पर डाला उसका राजनीति में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। गुजरात दंगों में जिस तरह से अल्पसंख्यक आबादी को किनारे किया और हिंदू-मुस्लिमों के बीच वयमनस्यता पैदा की ऐसा भी किसी अन्य राज्य में कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलेगा। श्रीमती इंदिरा गांधी की मौत के बाद हुए दंगों में बेशक सिख समुदाय हताहत हुआ, लेकिन आज भी हिंदू और सिखों में ऐसी वैमनस्यता या अलगाव या भय देखने को नहीं मिलता, जैसा कि हिंदू और मुस्लिमों में देखने को मिलता है। जरा-जरा सी बात पर आम आदमी इस डर कांप जाता है कि कहीं दंगा न हो जाए और कई जगह तो मामूली बातों पर हो भी जाते हैं। हिंदू-मुसलमानों के बीच नफरत के इस जहर का बीज बोने का काम पहले लालकृष्ण आडवाणी ने किया और फिर उसे नरेंद्र मोदी ने गुजरात में सींचकर बढ़ा किया। मोदी जी इसे कहते हैं, जहर की खेती करना, जिसकी फसल आप पिछले दो विधानसभा चुनावों से काट रहे हैं। मोदी जानते थे कि गुजरात में मुसलमान अल्प संख्या में हैं, यदि बीजेपी को एक भी मुस्लिम वोट न दे, लेकिन अधिकांश हिंदू वोट दे देंगे तो बीजेपी जीतती रहेगी। मोदी की इस जहरीली रणनीति को कोई भांप नहीं पाया। आज गुजरात का मुसलमान मोदी को इस डर के वोट देता है कि कहीं उससे बदला न लिया जाए और हिंदू मुस्लिमों के अनावश्यक डर कर मोदी को वोट देता है। इसे कहते हैं जहर की खेती की फसल काटना।

               मोदी आजकल जहां भी बोलते हैं उनके भाषणों में विरोधियों की आलोचना कम और नफरत भरे बोले ज्यादा सुनाई देते हैं। राजनीति में आलोचना आम बात है लेकिन विपक्षी दलों के नेताओं को लेकर नफरत भरी भाषा बोलना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। लेकिन मोदी को इससे कोई परहेज नहीं है। मोदी के भाषण आम आदमी के बीच उनके विरोधियों के प्रति नफरत का प्रसार करते हैं,व्यक्ति विरोधियों के काम काज पर कम मोदी की भाषा पर ज्यादा चर्चा करता है। यह है जहर की खेती।

           जहर की इस फसल काटने के लिए मोदी के गुजरात में तो पूरे इतिहास को बदला जा रहा है, और तुर्रा यह है कि अफसर इसे बदलने के लिए भी राजी नहीं हैं। गांधी के ही गुजरात में मोदी की सरकार ने गांधी की पुण्य तिथि बदल दी और विश्वयुध्द के इतिहास को मोड़ दिया। अब तक मोदी ही इतिहास को अपने भाषणों में तोड़ा मरोड़ा करते थे, झूठ बोलते थे, लेकिन अब बाकायदा यह किताबों में पढ़ाया जा रहा है। पिछले दिनों बीबीसी ने एक खबर दी, जिसके मुताबिक गुजरात बोर्ड की कक्षा 8 की किताब में गांधीजी की पुण्यतिथि की तारीख 30 अक्टूबर 1948 पढ़ाई जा रही है। इतना ही नहीं आजादी की लड़ाई में अपना जीवन खपा देने वाले महात्मा गांधी को महज एक आधयात्मिक गुरू के तौर पर पेश करने की कोशिश की गई है। इतना ही नहीं दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और गोपाल कृष्ण गोखले को किताब में कांग्रेस का श्एक्सट्रीमिस्टय सदस्य बताया गया है, जबकि आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले इन नेताओं को हमेशा नरमपंथी माना जाता रहा है। और आगे बढ़िए तो इस किताब के अनुसार होम रूल आंदोलन आजादी के बाद 1961 में शुरू हुआ था जबकि यह आंदोलन भारत की आजादी से बहुत पहले यानि 1916 में शुरू हुआ था। बहरहाल यह पहला मौका नहीं है जब गुजरात में इतिहास के साथ यह मजाक किया जा रहा है। गुजरात सरकार पर स्कूल की किताबों के जरिए हिंदुत्व की राजनीति और सांप्रदायिक घृणा फैलाने के आरोप भी इससे पहले लगे हैं। और मोदी की मनमानी का नतीजा था कि नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशन प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन की दिसंबर, 2013 रिपोर्ट में गुजरात को देश में प्राइमरी और अपर-प्राइमरी लेवल शिक्षा में 28 वें और आठवें स्थान पर रखा गया। और मजाक देखिए यही मोदी स्किल डेव्हलपमेंट की बातें करते हुए केंद्र सरकार को गाहे-गवाहे चुनौतियां देते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि गुजरात की में बच्चों को दी जा रही गलत शिक्षा पर अचानक किसी की नजर गई है। वर्षों से किताबों की गलतियों की ओर धयान दिलाने के बावजूद मोदी सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं है। मई 2012 में गुजरात शिक्षा विभाग ने पजल मैजिक नाम की पत्रिका 35,000 स्कूलों में बांटी थी जिसमें अश्लील चुटकुल थे। सामाजिक कार्यकर्ता तो यहां तक आरोप लगाते रहते हैं कि वर्ष 2002 के बाद गुजरात की पाठयपुस्तकों में नफरत और वैमनस्यता फैलाने की शुरूआत की गई। किताबों में जो संशोधान हुए उसके बाद से किताबें महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ पूर्वाग्रहों से भरी हुई हैं। मोदी जी... यह है नफरत की खेत करना।  

? विवेकानंद